Akhilesh Yadav: इटावा कथावाचक चोटी कांड के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में ब्राह्मण बनाम यादव संघर्ष ने जोर पकड़ लिया है. इस घटनाक्रम ने सूबे की जातीय राजनीति को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है. ब्राह्मण समाज और यादवों में नाराजगी के बीच राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं. इसी बीच समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का अपनी पत्नी डिंपल यादव के साथ ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखने वाले भारतीय एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला के घर जाना सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर रहा है. क्या अखिलेश यादव इस दौरे के जरिए ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश कर रहे हैं? या यह मुलाकात महज औपचारिक थी? इन सवालों के जवाब यूपी की बदलती राजनीतिक तस्वीर को समझने में अहम साबित हो सकते हैं.

सोशल मीडिया पर शेयर की पोस्ट

रविवार देर शाम अखिलेश यादव एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला के घर पर पहुंचे. इस दौरान उन्होंने शु्भांशु शुक्ला के माता-पिता से मुलाकात की, जिसके बाद उन्होंने मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शेयर की. उन्होंने लिखा कि अंतरिक्ष तक की उड़ान जिस आँगन से भरी और जो माता-पिता हौसलों की ज़मीन बने, आज उनके साथ लखनऊ में. #शुभांशुशुक्लाअंतरिक्ष

सियासत में अलग चश्मे से देखी जा रही मुलाकात

अखिलेश यादव शुभांशु शुक्ला के घर उस वक्त गए, जब प्रदेश में यादवों और ब्राह्मणों के बीच जातीय संघर्ष देखने को मिल रहा है. वहीं इस मुलाकात को सियासी गलियारे में अलग चश्मे के साथ देखा जा रहा है. दरअसल, बीजेपी और अन्य दल अखिलेश यादव पर एक जाति का राजनीति करने और सवर्ण समाज की अनदेखी का आरोप लगाती रही है. वहीं इस मुलाकात से अखिलेश जातिगत राजनीति के आरोप को गलत साबित करने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि यूपी में सवर्णों की 18 फीसदी के करीब आबादी है.

यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण बड़ा फैक्टर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण ही सबसे बड़ा फैक्टर माने जाते हैं. यहां किसी भी दल की सियासी किस्मत जातीय जोड़-तोड़ और वोट बैंक के आधार पर ही तय होती है. अगर यूपी के जातीय गणित पर नजर डालें तो सवर्णों की आबादी करीब 18 फीसदी है. दिलचस्प बात यह है कि पिछले 10-15 सालों में सवर्ण वोट बैंक पर भारतीय जनता पार्टी की लगभग एकतरफा पकड़ रही है.

ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा

वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी सबसे ज्यादा यानी करीब 42 फीसदी है, लेकिन यह वोट बैंक पूरी तरह एकजुट नहीं है. मौजूदा वक्त में समाजवादी पार्टी और एनडीए, खासतौर पर बीजेपी, इस वोट बैंक पर लगभग बराबरी की पकड़ बनाए हुए हैं. दलितों की आबादी करीब 21 फीसदी है, जबकि मुस्लिम वोट बैंक 19 फीसदी के आसपास है, जो आमतौर पर बीजेपी विरोधी खेमे में रहता है.

यादव बनाम ब्राह्मण

अब अगर बात ब्राह्मण और यादव समुदाय की करें तो दोनों की आबादी करीब 10-10 फीसदी है. जहां ब्राह्मण आमतौर पर बीजेपी का पारंपरिक समर्थक माना जाता है, वहीं यादव समाज समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक रहा है. लेकिन इटावा कथावाचक चोटी कांड के बाद जिस तरह से ब्राह्मण बनाम यादव की सियासी बहस तेज हुई है. यही वजह है कि अखिलेश यादव फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं. वह नहीं चाहते कि ब्राह्मण समाज पूरी तरह नाराज हो और सपा पर ‘एक जाति विशेष की पार्टी’ होने का ठप्पा और गहरा जाए. इसलिए हालिया घटनाओं में उनकी रणनीति काफी संतुलित और सोच-समझकर बनाई जा रही है.

PDA ने दिलाई लोकसभा चुनाव में जीत

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी ने PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की राजनीति के जरिए बीजेपी को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया था. अखिलेश यादव को उम्मीद है कि PDA कार्ड ही विधानसभा चुनाव 2027 में भी जीत दर्ज कराएगी. सपा के मुखिया अखिलेश यादव लगातार योगी सरकार पर PDA की अनदेखी करने का आरोप लगा रही है. बीते 25 जून को इटावा में यादव कथावाचक के साथ हुई बदसलूकी मामले के बाद PDA राजनीति को और ज्यादा हवा मिल रही है.





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