यह बात बार-बार कही जाती है कि दुनिया में बेहद असमानता है. अमीर और दौलतमंद हो रहे हैं, जबकि गरीब और गरीब हो रहे हैं. बीच-बीच में कई बार डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ वेल्थ जैसा फलसफा भी सुनाई पड़ा. मतलब, अमीरों की दौलत लेकर सबमें बराबरी से बांट दी जाए. साथ ही काम पर सबको बराबर की तनख्वाह मिले. हाल में न्यूयॉर्क से मेयर पद के उम्मीदवार जोहरान ममदानी ने भी अरबपतियों को लेकर नाराजगी दिखाई.

तो क्या पैसों के समान बंटवारे से दुनिया बेहतर हो सकती है? क्या किसी देश ने पहले ऐसी कोशिश की?

पचास का दशक. क्यूबा की राजधानी हवाना में लोग सड़कों पर उतरे हुए थे. नारा लगा रहे थे कि अमीर-गरीब सब बराबर होंगे. तब तक ये देश दो हिस्सों में बंटा हुआ था, एक तरफ थे अमीर और दूसरी तरफ गरीब. एक रोज फिदेल कास्त्रो की लीडरशिप में बगावत हो गई.

कास्त्रो साल 1959 में सत्ता में आए. जैसा कि वादा था, अमल शुरू हो गया. प्रशासन ने बड़ी जमीनें जब्त कर गरीबों में बांट दी. स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, फैक्ट्रिया और होटल, सब सरकार के हाथ में आ गए. कोई सेक्टर निजी नहीं रहा. दौलतमंदों से प्रॉपर्टी लेकर बांटी गई, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. नियम बन गया कि सबको एक बराबर वेतन मिलेगा. डॉक्टर हो, मजदूर या टीचर, सबको बराबर-बराबर तनख्वाह मिलने लगी, चाहे कोई कितना ही पढ़ा-लिखा हो, या कितनी ही चुनौती वाली नौकरी करता हो.

शुरुआत में लगा कि देश बदल रहा है. बराबरी के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन जी-तोड़ मेहनत करके और खूब पढ़े-लिखे लोग भी जब बाकियों जितनी तनख्वाह पाने लगे तो हताशा बढ़ी. मेहनत से बड़ा बिजनेस बना चुके लोग भी अब बाकियों की तरह जिंदगी बिता रहे थे. फिर शुरू हुआ पलायन. अस्सी के दशक में जब निराशा एक्सट्रीम पर थी, लाखों क्यूबन नागरिक अमेरिका की तरफ जाने लगे. ये सामूहिक पलायन छोटी नावों और मछली पकड़ने वाली बोट्स से किया जा रहा था ताकि सरकार को भनक न लगे.

क्यूबा माइग्रेशन फोटो एपी

जो लोग फंस गए थे, वो हवाना स्थिति विदेशी दूतावासों में शरण के लिए पहुंचने लगे. कास्त्रो सरकार नाराज हो गई. उसने एलान किया कि जिसे जाना हो चला जाए. मेरिअल बंदरगाह खोल दिया गया और लोग भागने लगे. इस घटना को मेरिअल बोटलिफ्ट क्या गया. लेकिन यहां एक और चीज भी हुई. शुरुआत में तो पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल लोग भागे, लेकिन फिर कास्त्रो प्रशासन ने एक अजीब काम किया. कैदियों और मानसिक रोगियों  भी बोट्स में बैठा दिया गया. तब अमेरिका क्यूबाई सरकार का विरोध करने लगा. स्थिति और बिगड़ गई. भाग रहे लोग अटककर रास्ता भटकने लगे.

इधर क्यूबा की भीतरी हालत और खराब हो गई. नब्बे की शुरुआत में उसका मित्र सोवियत संघ टूट गया. इससे क्यूबा को कम कीमत पर मिलने वाली बिजली, दवाएं जैसी सुविधाएं भी रुक गईं. स्थिति इतनी बिगड़ी कि लोग मामूली चीजें भी ब्लैक मार्केट से लेने लगे. पढ़े-लिखे और अपढ़ तबके में लड़ाइयां बढ़ने लगीं. मान लिया गया कि जब सबको बराबर ही मिलना है, तो मेहनत क्यों की जाए. तब से क्यूबा की इकनॉमिक स्थिति लगातार खराब होती चली गई.

अब जाकर इस देश में कुछ बदलाव आया है

छोटे प्राइवेट बिजनेस चलाने की इजाजत है. कुछ चीजों का प्राइवेटाइजेशन भी हो चुका. हालांकि सरकारी तनख्वाह अब भी बहुत कम है. एक डॉक्टर की सैलरी भी महज कुछ हजार है और एक सरकारी क्लर्क की भी. देश से माइग्रेशन अब भी जारी है. कोविड का दौर याद होगा, जब इस देश ने पूरी दुनिया में अपने डॉक्टर भेजे थे. ये एक मौका था, जब वहां के लोग डॉलर में पैसे कमा सकें, जो कि उनके यहां मुमकिन नहीं.

क्यूबा फोटो unsplash

माइग्रेशन अब भी चल रहा है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2022 में यहां से तीन लाख से ज्यादा क्यूबन अमेरिकी सीमा के भीतर आए. ये उस देश की कुल आबादी का 3 फीसदी है. इसमें भी प्रोडक्टिव उम्र वाले और शिक्षित लोग ही जा रहे हैं. यानी एक नीति के चलते क्यूबा लगातार कमजोर देश बनता चला गया.

क्या अमेरिका में भी क्यूबन मॉडल की डिमांड हुई

इसकी मांग कई बार उठी लेकिन क्यूबा की तरह नहीं, बल्कि कुछ रिफॉर्म की तरह. जैसे, ग्रेट डिप्रेशन के दौर में कुछ अमेरिकी सीनेटरों ने शेयर अवर वेल्थ की मांग की. उन्होंने कहा कि कोई भी शख्स करोड़पति न बने बल्कि हर परिवार को घर और इनकम मिले. उन्हें सपोर्ट तो मिला लेकिन पॉलिसी लागू नहीं हो सकी. फिर गारंटीड इनकम की बात आई. कुछ दशकों से अमीरों पर टैक्स बढ़ाने की बात हो रही है ताकि बाकियों को उसका फायदा मिल सके. पिछले साल की एक डेमोक्रेटिक नेता बर्नी सैंडर्स ने कह दिया था कि एक ऐसा अमेरिका बनाते हैं, जहां अरबपति न हों. हालांकि पार्टी ने इसके बाद उनसे दूरी बना ली. अब यही बात जोहरान ने की है.

क्या ये मॉडल आ सकता है
तकनीकी तौर पर, नहीं. यूएस संविधान निजी संपत्ति की गारंटी देता है. कैपिटलिज्म यहां की राजनीतिक-आर्थिक नींव है. तो जाहिर है कि खून-पसीना लगाकर पैसे कमा चुके लोग इसका विरोध करेंगे. हां, ये जरूर है कि पूंजीवाद के बाद भी आंशिक तौर पर कुछ कोशिश जरूर हुई. मसलन , यहां सोशल सिक्योरिटी सिस्टम है, जो हेल्थ, खाने-पीने की न्यूनतम सुविधा पक्की करता है.



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