नए भारत में काम नहीं आएगी भाषा की पॉलिटिक्स! भारत का युवा रोजगार चाहता है, भाषा विवाद नहीं – Hindi English and regional language controversy in India language politics will not work in india as new india wants job not controversy ntcprk


‘इस देश में अंग्रेजी बोलने वालों को जल्द ही शर्म आएगी – ऐसे देश का निर्माण दूर नहीं है’- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह.

‘मराठी भाषियों पर हिंदी थोपने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी’- महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे.

‘हिंदी के जरिए मराठी बोलने वाले लोगों को बांटने की कोशिश कभी न करें- शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कहते हैं, ‘कुछ कट्टरपंथी लोग हमें तमिलों के लिए तमिलनाडु में उचित जगह की मांग करने के ‘अपराध’ के लिए अंधराष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी बताते हैं. असली अंधराष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी हिंदी कट्टरपंथी हैं, जो मानते हैं कि उनका अधिकार स्वाभाविक है, लेकिन हमारा विरोध देशद्रोह है.’

भाषा को लेकर यह विवाद देश के एजेंडे पर एक बार फिर हावी हो गया है और कैसे? भाषा को लेकर अंधभक्ति हमेशा से एक राजनीतिक हथियार रही है. अब यह एक बार फिर सामने है जिसने नेताओं के अंदर के पाखंड और संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे को उजागर कर दिया है जो हमारे समय के जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहते हैं.

अंग्रेजी मीडियम से पढ़े हैं अमित शाह और उनके बेटे जय शाह

चलिए गृह मंत्री से शुरू करते हैं. अंग्रेजी के खिलाफ अमित शाह की शिकायतें संघ परिवार की हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के बिलीफ सिस्टम से आती है, एक ऐसी मान्यता जो अंग्रेजी को ‘भारतीय संस्कृति’ के उलट एक औपनिवेशिक भाषा के रूप में देखती है.

विडंबना यह है कि अमित शाह ने अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स कॉलेज में बायो-केमिस्ट्री कोर्स किया है जिसे शहर में एक एलीट अंग्रेजी संस्थान माना जाता है. बाद में वे शहर के सीयू शाह साइंस कॉलेज में पढ़ाई के लिए चले गए.

उनके बेटे जय शाह, जो अब इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC के अध्यक्ष हैं, ने अहमदाबाद के लोयोला हॉल से पढ़ाई की है. यह शहर के सबसे लोकप्रिय अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में से एक है.

इसके बावजूद, अमित शाह ने अंग्रेजी के प्रति अपनी नापसंदगी कभी नहीं छिपाई. अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह एक दिलचस्प कहानी बताते हैं. राजीव उन दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया में काम करते थे और अमित शाह तब गुजरात सरकार में मंत्री थे. राजीव को अमित शाह ने बताया था कि वो देश के प्रमुख अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को इसलिए नहीं पढ़ते क्योंकि यह अंग्रेजी में है.

महीनों बाद, चुनाव प्रचार के दौरान, अमित शाह ने राजीव को एक रैली में देखा और टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर पर आपत्ति जताई. पत्रकार ने मंत्री से पूछा, ‘आप इस खबर के बारे में कैसे जानते हैं, आप तो अंग्रेजी अखबार पढ़ते ही नहीं.

उनके इस सवाल पर नाराज होते हुए अमित शाह ने कहा था, ‘मैं आपका अखबार नहीं पढ़ता, लेकिन कई लोग हैं जो मुझे बताते हैं कि उसमें क्या छपा है.’

उद्धव ठाकरे का मराठी फर्स्ट का एजेंडा

शाह की तरह ठाकरे ने भी अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में पढ़ाया है. ठाकरे हिंदी बोलते हैं और इंटरव्यू भी हिंदी में देते हैं, बावजूद इसके उनकी राजनीति ‘मराठी-फर्स्ट’ एजेंडे के इर्द-गिर्द घूमती है. शायद वो ये काम भीड़ भरे राजनीतिक बाजार में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए करते हैं.

अगर अमित शाह के लिए हिंदी के विवाद को छेड़ना भाजपा को एक ‘राष्ट्रवादी’ ताकत के रूप में स्थापित करने के लिए शुरू किया गया है तो ठाकरे के लिए भाषा के मुद्दे को फिर से हवा देना इस आंदोलन को फिर से शुरू करने की एक कोशिश है जो शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का मूल मुद्दा था.

आज जब शिवसेना प्रमुख गैर-मराठी भाषियों पर आग उगल रहे हैं तो हमें यह याद करने की जरूरत है कि कार्टूनिस्ट के रूप में उनकी पहली नौकरी अंग्रेजी अखबार फ्री प्रेस जर्नल के साथ थी. आज, जब शिवसेना पूरी तरह से विभाजित हो गई है और अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है, तो अगली पीढ़ी के ठाकरे भाषाई गौरव की आड़ में एक तरह से फिर से एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं.

एमके स्टालिन सुलगा रहे उत्तर बनाम दक्षिण की आग

एमके स्टालिन के लिए भी, तमिलनाडु के लोगों पर हिंदी को ‘थोपने’ का हौवा खड़ा करना राज्य में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले एक राजनीतिक हथियार तैयार करना है. 1960 के दशक में द्रविड़ पार्टियों का उदय एक मजबूत द्रविड़ संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए किए गए कट्टर हिंदी विरोधी आंदोलनों के इर्द-गिर्द घूमता था.

छह दशक बाद, यह दावा करके कि नई शिक्षा नीति का तीन-भाषा फॉर्मूला तमिल भाषी नागरिकों पर हिंदी थोपने की एक और कोशिश है, डीएमके के मुख्यमंत्री क्षेत्रीय पहचान के ध्वजवाहक के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उत्तर-बनाम-दक्षिण की लड़ाई को फिर से सुलगा रहे हैं.

एक तरफ तो डीएमके परिवार ‘तमिल फर्स्ट’ के नारे को बढ़ावा दे रहा है लेकिन तथ्य यह है कि परिवार की अगली पीढ़ी अपने बच्चों को विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़ने के लिए भेज रही है. यह बात भी याद रखनी जरूरी है कि चेन्नई के अधिकांश प्राइवेट स्कूल तीन भाषाओं का सिलेबल पेश करने के लिए इच्छुक हैं, जिसमें हिंदी भी एक ऑप्शन के रूप में शामिल है.

अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढ़ते हैं अंग्रेजी की खिलाफत करने वाले नेताओं के बच्चे

अंग्रेजी के खिलाफ बोलने वाले नेता, पुराने समाजवादी लोहिया से लेकर हिंदुत्ववादियों से लेकर क्षेत्रीय नेताओं तक, सभी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं.

अमित शाह अंग्रेजी के खिलाफ बोल सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल के सहयोगियों का सर्वे करके यह पता लगाना होगा कि उनमें से कितने लोगों ने अपने बच्चों को हिंदी या क्षेत्रीय भाषा मीडियम वाले स्कूल में भेजने का ऑप्शन चुना है.

कम से कम आधा दर्जन कैबिनेट मंत्रियों के बच्चे प्रतिष्ठित विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़ रहे हैं. अंग्रेजी को अब औपनिवेशिक भाषा के रूप में नहीं बल्कि आकांक्षा की भाषा के रूप में देखा जाता है. देश के किसी भी कोने में जाएं आपको दिख जाएगा कि अंग्रेजी भाषा के कोचिंग क्लासेज कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं जिनका मकसद ‘नए’ भारत को सामाजिक सीढ़ी पर चढ़ने का मौका देना है.

अंग्रेजी बोलने में ‘शर्मिंदा’ होने के बजाय, अधिकांश युवा भारतीय इसमें उत्कृष्टता हासिल करना चाहते हैं. दुख की बात है कि देश के कई हिस्सों में अंग्रेजी पढ़ाने की क्वालिटी में काफी कमी है. उदाहरण के लिए इसी वजह से गुजरात सॉफ्ट स्किल-संचालित सेवा उद्योग में पिछड़ गया है.

हिंदी बोलने वालों के बीच हिट हो रही दक्षिण भारत की फिल्में

दिलचस्प बात यह है कि हिंदी अब भारत के कई कोनों में आगे बढ़ने और महत्वाकांक्षा की भाषा भी बन गई है. दक्षिण में बनी कई फिल्मों की सफलता पर नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि वहां की कई फिल्में हिंदी में ब्लॉकबस्टर साबित हो रही हैं. पारंपरिक उत्तर-दक्षिण विभाजन बड़े पर्दे पर तेजी से गायब हो रहा है. क्रिकेट के मैदान पर भी ऐसा ही हो रहा है- ऐसा किसने सोचा होगा कि रांची में जन्मे हिंदी बोलने वाले महेंद्र सिंह धोनी चेन्नई सुपरकिंग्स के हीरो बनेंगे?

भाषा की राजनीति अब नहीं चलेगी!

मुंबई भी अब पहले से कहीं कम महाराष्ट्रीयन शहर रह गया है. हिंदी न केवल इसके प्रसिद्ध फिल्म उद्योग की भाषा है, बल्कि इसके सड़कों की आजीविका की भी भाषा है जो उत्तर भारतीय प्रवासियों के कारण फली-फूली है. लेकिन स्थानीय स्तर पर अपने भाषा पर गर्व अभी भी मायने रखता है, लेकिन अब एक भाषा को दूसरी भाषा के खिलाफ खड़ा करने की जरूरत नहीं है.

यही कारण है कि जो लोग भाषा की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि ये हारने वाली लड़ाइयां हैं, जिनसे अस्थायी राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन एक सीमा से आगे इन्हें जारी नहीं रखा जा सकता. भाषाई विविधता भारत की ताकत है, बहुभाषी होना फायदे की बात है. जिन राजनेताओं के पास कुछ कहने को नहीं है वो भाषाई कट्टरता की शरण ले सकते हैं. अधिकांश भारतीय युवाओं को नौकरी की तलाश है, वो भाषा के दीवाने नहीं हैं.

अंत में- मैंने एक बार एक वरिष्ठ नेता का इंटरव्यू लिया था जो हिंदी में बोलने पर जोर देते थे क्योंकि वो ‘जनता’ तक पहुंचना चाहते थे. इंटरव्यू खत्म होने पर उन्होंने मुझे गर्व से अपने बेटे से मिलवाया- प्लीज मेरे अमेरिका में पढ़े-लिखे यंगमैन से मिलिए!’

(राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. उनकी नई किताब है 2024: The Election That Surprised India)

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