मुहर्रम 2025: मुहर्रम का महीना सिर्फ इस्लामी वर्ष की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह न्याय, बलिदान और वफादारी की उन घटनाओं को याद दिलाता है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज है. वैसे तो कर्बला की जंग की अनेकों कहानियां हैं. इन कहानियों को जितनी बार भी पढ़ा जाए, ये कहानियां उतनी ही बार दिल को छू जाती हैं. ऐसी ही एक कहानी हजरत अब्बास की है. हजरत अब्बास हजरत इमाम हुसैन (रजियल्लाहु अन्हु) के सौतेले भाई थे.

प्यास और साजिश के बीच इंसानियत की जंग

किस्सा सन् 680 ई. की 10वीं मुहर्रम से पहले का है. उस दिन कर्बला के मैदान में यजीद की सेना ने इमाम हुसैन और उनके काफिले के लिए फरात नदी का पानी रोक दिया था, उस दिन कर्बला की तपती जमीन पर इमाम हुसैन का छोटा सा खेमा यजीद की हजारों की सेना से घिरा हुआ था और हुसैन के लोगों के लिए पानी पर रोक लगा दी गई थी. बच्चों की जुबान प्यास से चटपटा रही थीं, महिलाओं का हाल भी प्यास से बेहाल था.
सामने पानी था लेकिन पिया नहीं

हजरत अब्बास ने जब यह दृश्य देखा तो उन्होंने इमाम हुसैन से कहा- ‘भैया, मुझे इजाजत दीजिए कि मैं बच्चों के लिए पानी लेकर आऊं’. इजाजत मिली और यहीं से हजरत अब्बास का वह आखिरी लेकिन ऐतिहासिक सफर शुरू हुआ. हजरत अब्बास मश्क (पानी का चमड़े का थैला) लेकर दुश्मन की भारी संख्या को चीरते हुए फरात तक पहुंचे. बहते पानी को सामने पाकर भी उन्होंने एक घूंट तक नहीं पिया क्योंकि उनके मासूम भतीजे अब भी प्यासे थे. उन्होंने मश्क में पानी भरा और शिविर की ओर लौटने लगे. लेकिन रास्ता बहुत मुश्किल था क्योंकि यजीद की सेना ने उन्हें घेर लिया था. हजरत अब्बास ने पानी को शिविर तक पहुंचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की. दुश्मन ने उन पर तीरों और तलवारों से हमला किया. पहले उनका एक हाथ काट दिया गया और फिर दूसरा.  इसके बावजूद, उन्होंने मश्क को अपने दांतों में पकड़ा और पानी को बचाने की कोशिश की.

आखिरकार, दुश्मन के हमलों में वे शहीद हो गए और मश्क में भरा पानी जमीन पर गिर गया. यह किस्सा हजरत अब्बास की वफादारी, बहादुरी और अपने परिवार व बच्चों के लिए कुर्बानी की भावना को दर्शाता है.  मुहर्रम में उनकी शहादत को भी याद किया जाता है. आशूरा यानी 10वें मुहर्रम के दिन अब्बास न तो अपने लिए लड़ रहे थे और न सत्ता के लिए. वो सिर्फ पानी को शिविर तक पहुंचाने के लिए जान दांव पर लगा चुके थे. लेकिन, दुश्मन की तलवारें उनपर भारी पड़ीं और हजरत अब्बास शहीद हो गए.

आज भी जिंदा है ‘सक्का-ए-कर्बला’ की याद

हजरत अब्बास को इतिहास में ‘सक्का-ए-कर्बला’ कहा जाता है यानी वह जो कर्बला में प्यासों के लिए पानी लाया. उन्हें ‘बाब-उल-हवाइज’ भी कहा जाता है, इसका मतलब होता है- जरूरतमंदों का दरवाजा. हर साल मुहर्रम में जब जुलूस निकलते हैं, तो कहीं मश्क की झांकी बनती है और कहीं अलम (झंडा) उठाया जाता है.

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