मिजोरम पर बढ़ा घुसपैठ का खतरा, म्यांमार-बांग्लादेश से क्यों आ रहे हैं हजारों शरणार्थी? – mizoram refugees from myanmar and bangladesh ntcpmj


साल 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुआ, जिसके बाद से वहां अस्थिरता है. इस बीच वहां से चिन शरणार्थी लगातार मिजोरम आ रहे हैं. मिजो समुदाय से कल्चरल समानता के कारण स्थानीय लोगों को खास समस्या भी नहीं रही. लेकिन इस छोटे स्टेट में पहले से ही कथित तौर पर बहुत से विदेशी शरणार्थी बसे हुए हैं. ऐसे में सवाल आता है कि नॉर्थ-ईस्ट के कई राज्यों की तर्ज पर क्या यहां भी घुसपैठ पर एक्शन हो सकता है?

मिजोरम की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ये राज्य बांग्लादेश और म्यांमार की सीमाओं से जुड़ा है. म्यांमार में साल 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद से वहां गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. सेना और अलग-अलग जातीय मिलिशिया में जबरदस्त टकराव हो रहा है. खासकर चिन स्टेट में चिन नेशनल डिफेंस फोर्स और चिनलैंड डिफेंस फोर्स- एच के बीच जुलाई की शुरुआत से संघर्ष चल रहा है. इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है वहां की चिन जाति, जो मिजोरम में मिजो समुदाय की करीबी मानी जाती है. यह आबादी देश के भीतर पलायन तो कर ही रही है, साथ ही हजारों लोग मिजोरम के चंफाई की तरफ भी आ रहे हैं.

डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट में बताया गया कि इस महीने जारी हिंसा के बीच हजारों की संख्या में लोग तियाउ नदी पार करके सीमाई कस्बों तक पहुंच चुके. बता दें कि मिजोरम और म्यांमार करीब 510 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं. यह बॉर्डर मिजोरम के ईस्टर्न हिस्से में फैला हुआ है और म्यांमार के चिन राज्य से लगता है. इसका बड़ा भाग पहाड़ों और जंगलों से ढंका हुआ है, जिससे आवाजाही आसान हो जाती है. इसी सीमा के पास तियाउ नदी भी बहती है. कई गांव इसी के आरपार बसे हुए हैं. ये भी कुदरती ब्रिज का काम करती है. इसे ही पार करके लोग लगातार आ रहे हैं.

म्यांमार जातीय संघर्ष (फोटो- एपी)
म्यांमार में जातीय संघर्ष में लगातार मौतें हो रही हैं. (Photo- AP)

कब हुई शरणार्थी संकट की शुरुआत

म्यांमार और मिजोरम की सीमाओं पर पहाड़ी आदिवासी रहते हैं, जिनका आपस में करीबी रिश्ता रहा. उन्हें मिलने-जुलने या व्यापार के लिए वीजा की मुश्किलों से न गुजरना पड़े, इसके लिए भारत-म्यांमार ने मिलकर तय किया कि सीमाएं कुछ किलोमीटर तक वीजा-फ्री कर दी जाएं. साल 1968 में बीच फ्री मूवमेंट संधि हुई. इसके तहत दोनों ही तरफ के लोग 40 किलोमीटर तक बिना वीजा और बिना खास रोकटोक के सीमा पार कर सकते थे. लगभग दो दशक पहले इसे घटाकर 16 किलोमीटर किया गया और फिर कुछ ही साल पहले और कई बदलाव हुए.

भारत-म्यांमार मुक्त आवाजाही के लिए जो पास जारी होता, वो सालभर के लिए वैध होता, और एक बार सीमा पार करने वाले 2 हफ्ते तक दूसरे देश में बिना किसी परेशानी के रह सकते थे. इसके अलावा इस सीमा के भीतर स्थानीय व्यापार भी होता और पढ़ने-लिखने के लिए भी म्यांमार से लोग यहां तक आने लगे.

यहां तक तो ठीक था. लेकिन कुछ समय पहले मणिपुर हिंसा के बीच आरोप लगे कि म्यांमार सीमा का इस्तेमाल अस्थिरता लाने के लिए हो रहा है. यहां से हथियारों और ड्रग तस्करी के आरोप भी लगे. इसे रोकने के लिए केंद्र ने पिछले साल फ्री मूवमेंट को खत्म करने की बात की, लेकिन अब तक इसपर कोई आधिकारिक कागज नहीं आए. यही वजह है कि लोग अब भी वहां से यहां आ रहे हैं.

मिजो और चिन लोगों में जातीय और सांस्कृतिक समानताएं काफी ज्यादा हैं. दोनों ही सीमाओं पर  रिश्तेदारियां हैं. ऐसे में वहां से भागकर आ रहे लोगों को स्थानीय सपोर्ट भी है. कुछ अपने रिश्तेदारों के घर रहते हैं, तो बहुतों के लिए सार्वजनिक शेल्टर बनाया जा रहा है, जहां उन्हें बेसिक सुविधाएं मिल सकें. हालांकि गृह मंत्रालय ने मिजोरम समेत तमाम नॉर्थईस्टर्न राज्यों से कहा है कि वे म्यांमार से शरणार्थियों को भीतर न आने दें.

त्याओ नदी (फोटो- विकिमीडिया)
तयाउ नदी दोनों देशों के बीच प्राकृतिक बॉर्डर खींचती है. (Photo- Wikimedia)

फिलहाल जैसे हालात हैं, उसमें मुश्किल बढ़ सकती है. अब तक कल्चरल समानता की वजह से मिजोरम में चिन लोगों का स्वागत होता रहा, लेकिन इस छोटे-से राज्य में पहले से ही शरणार्थियों की भरमार है. बांग्लादेश में साल 2022 में हुई हिंसा के बाद वहां से भी लोगों ने इसी स्टेट में शरण ली. चिन तो यहां हैं ही. इसके अलावा मणिपुर में एथनिक संघर्ष के बीच बहुत से कुकी समुदाय के लोग भी यहां पहुंचे.

इतनी भीड़भाड़ और डायवर्सिटी को राज्य कैसे देख रहा

मिजोरम में मिजो समुदाय के लोग ज्यादा हैं. म्यांमार के चिन और बांग्लादेश के बॉम्स समुदाय से इनका पुराना मेलजोल रहा. तीनों ही जो एथनिक समूह से निकले हैं. पिछले साल मिजोरम के सीएम लालदुहोमा ने कहा था कि इसी समानता और मानवीय वजहों से वे शरणार्थियों को उनके देश वापस नहीं भेज पा रहे. इसके बाद केंद्र ने भी रिफ्यूजियों के लिए 8 करोड़ रुपए दिए थे.

अब तक तो सब शांत लगता रहा लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं. कुछ महीने पहले चंफाई जिले के कुछ गांवों ने कहा कि शरणार्थी अपने कैंपों से निकलना बिल्कुल बंद कर दें और व्यापार तो किसी स्थिति में नहीं करें. दरअसल शरणार्थियों के चलते स्थानीय लोग खुद को कटा हुआ महसूस करने लगे थे और बिजनेस में भी घाटा हो रहा था. इसके बाद विलेज काउंसिल ने यह आदेश दिया. इधर राज्य सरकार ने भी पुराने बयान से दूरी बनाते हुए साफ कर दिया कि फ्री मूवमेंट संधि का फायदा बहुत से असामाजिक तत्व ले रहे हैं और लगातार भीतर आ रहे हैं. राज्य ने ड्रग तस्करी की भी शिकायत करते हुए केंद्र से गुजारिश की कि वो विदेशियों की पहचान के लिए मिजोरम (मेंटेनेंस ऑफ हाउसहोल्ड रजिस्टर्स) बिल लाए.

सरकार का क्या कहना है

भारत रिफ्यूजी कन्वेंशन का हिस्सा नहीं. न ही हमारे पास कोई अलग लॉ है, जो शरणार्थियों की बात करता हो. बाहर से आए लोगों को फॉरेनर्स एक्ट के तहत देखा जाता है. भले ही हम संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर शरणार्थी पॉलिसी पर काम करते हैं, लेकिन ये उतना प्रभावी नहीं. ऐसे में ज्यादातर शरण लिए हुए लोग घुसपैठियों की तरह ही जीवन बिताते हैं, और स्थानीय लोगों का गुस्सा या अलगाव झेलते रह जाते हैं.

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