चीन में वोटर लिस्ट कैसे बनती है? कौन वोट दे सकता है, भारत से कितना अलग चुनावी सिस्टम – Electoral and voter registration process in China and how this different with the Indian election ntcpan


बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग की तरफ से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ड्राइव चलाई जा रही है, जिसके जरिए वोटर लिस्ट की सघन जांच हो रही है. आयोग इस मुहिम से वोटर लिस्ट में शामिल फर्जी मतदाताओं का पता लगाएगा और नए वोटरों को लिस्ट में शामिल करेगा. हालांकि यह पूरी कवायद राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुकी है, क्योंकि विपक्ष का आरोप हैं कि इसके जरिए सरकार विरोधी पार्टियों के वोटर्स के नाम लिस्ट से हटा रही है.

बिहार में SIR पर सियासी संग्राम

बिहार में SIR प्रोसेस के तहत 11 दस्तावेजों के एक लिस्ट बनाई गई है और इनके जरिए ही वोटर अपना वैरिफिकेशन करा सकते हैं. इन दस्तावेजों में आधार कार्ड को शामिल नहीं किया गया है, जो कि विवाद का विषय बन चुका है. यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र के दौरान भी इस पर सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है. इस बीच आपको बताते हैं कि आखिर पड़ोसी देश चीन में वोटर लिस्ट कैसे बनाई जाती है और वहां चुनाव कराने की प्रक्रिया क्या है?

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चीन में भारत की तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है और वहां सीपीसी यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ही सर्वेसर्वा है. चीन में वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया भारत की तरह बड़े स्तर पर और सेंट्रलाइज तरीके से नहीं होती. इसकी वजह है कि वहां सिंगल पार्टी सिस्टम के तहत कम्युनिस्ट राज है और सत्ता पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का पूरा कंट्रोल है. स्थानीय स्तर पर कुछ सीमित प्रत्यक्ष चुनाव होते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्यक्ष चुनाव कराने की कोई व्यवस्था नहीं है.

चीन में लोकल लेवल पर वोटर लिस्ट

चीन में खास तौर पर ग्रामीण और शहरी समुदायों में पीपुल्स कांग्रेस के लिए वोटर लिस्ट तैयार की जाती है. यह प्रक्रिया स्थानीय प्रशासन और CPC के अधीन होती है. चीन की वोटर लिस्ट में भी भारत की तरह 18 साल से ज्यादा उम्र के चीनी नागरिक ही शामिल हो सकते हैं, जिनकी पहचान लोकल रेजिडेंट रजिस्टर यानी हुकोउ सिस्टम के आधार पर की जाती है. हुकोउ चीन का इंटरनल पासपोर्ट सिस्टम है, जो नागरिकों की निवास स्थिति को तय करता है.

लोकल एडमिनिस्ट्रेशन जैसे कि विलेज कमेटी या शहरी निवासी समितियां, वोटर रजिस्ट्रेशन का मैनेजमेंट करती हैं. यह प्रक्रिया ज्यादातर ऑटोमेटिक होती है, क्योंकि सरकार के पास नागरिकों का डेटाबेस पहले से ही मौजूद होता है. चीन में वोटर लिस्ट को पब्लिक किया जा सकता है और नागरिकों को इसमें सुधार या आपत्ति दर्ज करने का पूरा मौका मिलता है. लेकिन फिर भी चीन में इस प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं माना जाता है.

चीन में कौन वोट दे सकता है?

चीन में वोटर लिस्ट सिर्फ स्थानीय स्तर के चुनावों के लिए प्रासंगिक है और यह भारत से तुलना में सबसे बड़ा अंतर है. चीन में राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं का चयन अप्रत्यक्ष और पार्टी के कंट्रोल में होता है, इसलिए वहां वोटर लिस्ट के ज्यादा मायने नहीं हैं. साथ ही प्रवासी नागरिकों, जो अपने हुकोउ एरिया से बाहर रहते हैं, को अक्सर वोटिंग में परेशानी होती है, क्योंकि वोटिंग सिर्फ उनके रजिस्टर्ड पते पर ही मुमकिन होती है. वहां पोस्टल बैलेट जैसी कोई व्यवस्था नहीं है.

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चीन में भी वोटिंग के लिए भारत की तरह कुछ नियम बनाए गए हैं. जैसे वोटिंग का अधिकार पाने के लिए 18 साल या उससे ज्यादा उम्र का नागरिक ही चीन में वोट कर सकता है. सिर्फ चीनी नागरिक को ही मतदान का अधिकार है, विदेशी या गैर-नागरिक चीन के वोटिंग प्रोसेस में हिस्सा नहीं ले सकते. वोटर्स सिर्फ अपने हुकोउ एरिया में ही वोट डाल सकते हैं, जिससे क्षेत्र से बाहर रहने वाले नागरिकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

कैसे चुने जाते हैं राष्ट्रपति और पीएम?

चीन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या पोलित ब्यूरो के सदस्यों के चुनाव में सीधे तौर पर जनता की भागीदारी नहीं होती है. चीन में किसी नेता का चुनाव बहुत ही सेंट्रलाइज सिस्टम के तहत होता है और उस पर CPC का पूरा कंट्रोल है. यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों से बिल्कुल अलग है. चीनी नागरिक स्थानीय स्तर पर पीपुल्स कांग्रेस के उन उम्मीदवारों को सीधे चुन सकते हैं, जिनमें से ज्यादातर को CPC की तरफ से मंजूर किया जाता है. स्वतंत्र उम्मीदवारों को वहां चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

पीपुल्स कांग्रेस सिर्फ स्थानीय स्तर पर विलेज कमेटी या शहरी स्तर के नेताओं को चुनती है. जबकि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और पोलित ब्यूरो के सदस्य, कम्युनिस्ट पार्टी की नेशनल कांग्रेस की ओर से चुने जाते हैं. एनपीसी के करीब तीन हजार प्रतिनिधि होते हैं, जो प्रांतीय और स्थानीय पीपुल्स कांग्रेस द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं.

पार्टी का सुप्रीम लीडर ही राष्ट्रपति

एनपीसी की बैठक में सीपीसी की सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो उम्मीदवारों की लिस्ट पेश की जाती है. इस लिस्ट को पहले से ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से मंजूर किया जा चुका होता है. सीपीसी की सेंट्रल कमेटी में 200 से ज्यादा सदस्य, पोलित ब्यूरो में 24 सदस्य हैं और पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी में 6 से 7 सदस्य होते हैं. सीपीसी की सेंट्रल कमेटी महासचिव को चुनती है, जो आमतौर पर देश का राष्ट्रपति होता है. चीन में जो पार्टी चलाता है, देश चलाने की जिम्मेदारी भी उसी के कंधों पर होती है.

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चीन में चुनाव की प्रक्रिया असल मायने में एक औपचारिकता मात्र है, क्योंकि उम्मीदवारों का चयन पहले ही CPC के शीर्ष नेताओं की ओर से कर लिया जाता है. मौजूदा राष्ट्रपति शि गिनपिंग को 2012 में सीपीसी का महासचिव और 2013 में राष्ट्रपति चुना गया. इसी तरह साल 2018 में चीन ने राष्ट्रपति के कार्यकाल की समयसीमा हटा दी, जिससे शी जिनपिंग आजीवन इस पद पर रह सकते हैं. ऐसे में साफ है कि वहां चुनाव का कोई मतलब नहीं है.

भारत में जिस तरह वोटर लिस्ट को लगातार अपडेट किया जाता है और इंटेंसिव रिवीजन जैसे प्रोसेस के जरिए लिस्ट की जांच की जाती है, चीन में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है. अगर वोटर लिस्ट के नाम पर थोड़े-बहुत अपडेट होते भी हैं तो उनका दायरा बहुत सीमित है.

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