जब देशभर में पति-पत्नी जैसे पवित्र रिश्तों को कलंकित करने वाली घटनाएं सामने आ रही हैं, उसी समय उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मोदीनगर से एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने रिश्तों की मर्यादा, आस्था और समर्पण को नई ऊंचाई दी है. बखरवा गांव की रहने वाली आशा देवी ने अपने लाचार पति को 9 दिन तक पीठ पर बैठाकर करीब 180 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा पूरी की और यह दिखा दिया कि असली साथ वही होता है, जो हर हाल में निभाया जाए.

श्रद्धा और समर्पण की अनोखी यात्रा

दरअसल, 14 जुलाई को आशा देवी ने हरिद्वार की हर की पौड़ी से अपने पति सचिन कुमार को पीठ पर बैठाकर कांवड़ यात्रा की शुरुआत की. सचिन कुमार एक समय कॉन्ट्रैक्टर थे, लेकिन पिछले एक साल से रीढ़ की हड्डी की सर्जरी के बाद चलने-फिरने में असमर्थ हैं. परिवार की सारी जिम्मेदारी अब आशा देवी के कंधों पर है, जो सिलाई और थैला बनाने का छोटा सा काम करके घर चलाती हैं.

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हरिद्वार में स्नान करते समय आशा देवी के मन में यह विचार आया कि वे इस बार की कांवड़ यात्रा अपने पति को पीठ पर बिठाकर पूरी करेंगी. उन्होंने इसे व्रत की तरह लिया और बिना थके, बिना रुके लगातार 9 दिनों तक यात्रा कर मोदीनगर पहुंचीं. उनके समर्पण को देखकर राह चलते लोगों ने नमन किया, कुछ की आंखें नम हो गईं और हर किसी ने इस जोड़े को श्रद्धा से प्रणाम किया.

गाजियाबाद

पति की भावुक प्रतिक्रिया

सचिन कुमार खुद इस यात्रा को लेकर बेहद भावुक हैं. उनका कहना है कि जब वे एक साल से चलने में असमर्थ हो गए हैं, तब पत्नी आशा ने उनके लिए वो किया जो शायद कोई कल्पना भी न कर सके.  पति हमेशा पत्नी की जिम्मेदारी उठाता है, लेकिन आज मेरी पत्नी मेरी जिम्मेदारी उठा रही है. मैं उसके समर्पण को जीवन भर नहीं भूल सकता, ये कहते हुए सचिन की आंखें भर आईं.

कठिनाइयों से भरी, लेकिन आस्था से मजबूत राह

इस यात्रा में आशा देवी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. कभी तेज धूप, कभी बारिश, कभी शरीर की थकावट और पीठ पर एक वयस्क व्यक्ति का भार. लेकिन उन्होंने शिव भक्ति और मन की शक्ति से हर कठिनाई को पार किया. वे कहती हैं, अगर मन में श्रद्धा हो और रिश्तों में विश्वास हो, तो कोई भी राह कठिन नहीं होती.

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समाज के लिए एक संदेश

बुधवार को जब आशा देवी अपने गांव के शिव मंदिर में हरिद्वार से लाया गया पवित्र गंगाजल चढ़ाकर अपनी यात्रा पूर्ण करेंगी, तब सिर्फ एक व्रत नहीं, एक उदाहरण पूरा होगा. उन्होंने अपनी पीठ पर सिर्फ अपने पति को नहीं उठाया, बल्कि पूरे समाज को यह याद दिलाया कि जब रिश्ते सच्चे हों, तो उनका बोझ नहीं, गर्व महसूस होता है.

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