भारत में 50% तक बढ़ गई दिल की बीमारियों की दवा की बिक्री! क्या है कारण, डॉक्टर्स से जानिए – Heart disease tsunami in India sale of heart medicines increased by 50% in 5 years tvisp


भारत दुनिया भर के उन देशों में एक है जहां दिल की बीमारियों (कार्डियोवस्कुलर डिसीस) से पीड़ित मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है. खराब लाइफस्टाइल, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसे रिक्स फैक्टर्स की वजह से भी भारतीयों में हृदय रोग का जोखिम बढ़ा है. लेकिन पिछले कुछ सालों में हृदय रोगियों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ी है, इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में पिछले पांच सालों के बीच हार्ट संबंधित दवाओं की बिक्री में 50 प्रतिशत का उछाल आया है.

क्या कहती है रिपोर्ट

मुंबई बेस्ड दवा कंपनी फार्मारैक की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 2021 और 2025 के बीच दिल से जुड़ी दवाओं की बिक्री 50 फीसदी बढ़ी है जो दिल के रोगियों की बढ़ी हुई संख्या की तरफ भी इशारा करता है. भारत में दिल की दवाओं की बिक्री साल 2021 के जून महीने में साल 2025 के जून महीने तक 1,761 करोड़ से बढ़कर 2,645 डॉलर करोड़ हो गई. यह आंकड़ा हर साल 10.7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. इस रिपोर्ट के बाद हेल्थ एक्सपर्ट्स भारत में दिल से जुड़े खतरों के प्रति बिना देरी के सख्त कदम उठाने की बात कर रहे हैं.

क्या बढ़ी दवाओं की बिक्री?

दवाओं की बिक्री में बढ़ोत्तरी अलग-अलग उम्र के लोगों को हो रही हार्ट समस्याओं की ओर इशारा करती है जिसमें लिपिड्स कम करने, हृदय गति रुकने और एंटी एंजाइनल ट्रीटमेंट में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की बिक्री में भारी वृद्धि देखी गई है. आपको बता दें कि एंटी एंजाइनल से मतलब ऐसी दवाओं और ट्रीटमेंट से है जिनका इस्तेमाल हार्ट डिसीज से जुड़े दर्द से आराम दिलाने या उसे रोकने के लिए किया जाता है.

क्या बताते हैं आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ‘Accidental Deaths and Suicides’ रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में दिल के दौरे से 32,457 लोगों की मौत हुई जबकि 2021 में यह संख्या 28,413 थी.

अमेरिकन लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की 2024 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के शहरी इलाकों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD) का ट्रेंड जो 1960 के दशक में 1-2 प्रतिशत था वो बढ़कर हाल ही के वर्षों में 10-12 प्रतिशत हो गया है. ग्रामीण इलाकों में यह 2-3 प्रतिशत से बढ़कर 4-6 प्रतिशत हो गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 40-69 वर्ष की आयु के लोगों में होने वाली 45 प्रतिशत मौतों के लिए हार्ट की बीमारियां जिम्मेदार हैं. 2016 में भारत में हुई कुल मौतों में से 27 प्रतिशत मौतें दिल के रोगों के कारण हुईं.

हार्ट संबंधित बीमारियों से मौतों वृद्धि का कारण क्या है?

विशेषज्ञों का कहना कि इस तेज वृद्धि के कारण कुछ कारण हो सकते हैं. इस बारे में बात करते हुए चाइल्ड हार्ट फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. विकास कोहली ने कहा, ‘हृदय की दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन इसलिए बढ़ गए हैं क्योंकि डॉक्टर बीमारियों का जल्द पता लगा रहे हैं. अब काफी शुरुआत में ही दवाएं और हार्ट फेलियर के ट्रीटमेंट्स शुरू कर देते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘सैकुबिट्रिल और एप्लेरेनोन जैसी दवाओं की बिक्री में पिछले पांच वर्षों में 83 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. हमने एम्ब्रिसेंटन, सेलेक्सिपैग और टैडालाफिल जैसी पीडिएट्रिक (बच्चों से जुड़ी) दिल की दवाओं की मांग में भी वृद्धि देखी है जो पल्मोनरी हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों से पीड़ित बच्चों के लिए जीवन रक्षक हैं तो इसलिए बिक्री के आंकड़े बढ़े हैं. लेकिन ये वास्तव में इस बात की ओर इशारा भी करते हैं कि देश दिल से जुड़े स्वास्थ्य संकट के पैमाने को समझ रहा है.’

युवाओं को घेर रही बीमारी

इस सबके साथ ही हृदय रोग विशेषज्ञ एक चिंताजनक बदलाव की चेतावनी भी दे रहे हैं. हृदय रोग अब केवल बुजुर्गों तक ही सीमित नहीं रह गया है. 30 और 40 की उम्र के रोगियों में भी इसका निदान (डायग्नॉस) तेजी से हो रहा है.

डॉ. कोहली ने कहा, ‘दो में एक भारतीय किसी न किसी प्रकार की जीवनशैली से जुड़ी दिक्कत जैसे हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा या डायबिटीज से ग्रस्त है.  ये अब बुजुर्गों या शहरी लाइफस्टाइल वाले लोगों की समस्या नहीं रह गई है.’

‘कॉलेज के छात्रों में भी एक तिहाई अधिक वजन वाले हैं. 2019 और 2022 के बीच मोटापे में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. कोलेस्ट्रॉल और हाई ब्लडप्रेशर की समस्याएं बढ़ रही हैं. यहां तक कि युवाओं में भी ये तेजी से बढ़ी हैं.’

कंट्रोल है जरूरी

ऐसे चिंताजनक आंकड़ों को देखते हुए पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स इस बात पर जोर दे रहे हैं कि रोकथाम (बीमारी को रोकने का प्रयास) पर फोकस रखना चाहिए. दिल की सेहत और जीवनशैली में बदलाव के बारे में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ नीतियां बनाने की तुरंत जरूरत है.

डॉ. कोहली ने कहा, ‘हम इस संकट से दवाओं के सहारे नहीं निकल सकते. रोकथाम को ही प्राथमिकता देनी होगी.’

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