अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर अब राजनीति की एक ही राह के मुसाफिर बन चुके हैं. दोनों की हालिया राजनीतिक गतिविधियों को देखें तो मकसद भी एक ही लगता है, बस दोनों ने इलाका अलग अलग चुना है. अरविंद केजरीवाल अब जाकर गुजरात में एक्टिव हैं, तो प्रशांत किशोर लंबे समय से बिहार में जन सुराज मुहिम चला रहे हैं.

अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर में एक और कॉमन बात है, दोनों ही बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर बगैर किसी के साथ गठबंधन के ही चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं – हां, अरविंद केजरीवाल ने अभी गुजरात में आम आदमी पार्टी के चुनावी एक्शन प्लान के बारे में कुछ बताया नहीं है.

अपनी सरकार बनाने का दावा तो हर पार्टी ही चुनावों में करती है, प्रशांत किशोर भी कर रहे हैं, अरविंद केजरीवाल तो 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में ही ऐसा दावा कर चुके हैं.

दावे के दायरे की बात अलग है, लेकिन अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर दोनों ही नेताओं ने बीते उपचुनावों में अपनी अहमियत तो दर्ज कराई ही है. और, इसलिए उनके दावों को सीधे सीधे खारिज भी नहीं किया जा सकता.

अरविंद केजरीवाल ने तो अभी अभी गुजरात के विसावदर उपचुनाव में आम आदमी पार्टी को जीत दिलाई है – और, 2024 में बिहार की चार विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी को पहली बार में ही 10 फीसदी वोट दिलाकर प्रशांत किशोर ने भी सबका ध्यान खींचा ही है.

केजरीवाल का गुजरात कैंपेन

गुजरात की विसावदर सीट और पंजाब की लुधियाना वेस्ट सीट पर उपचुनाव उस दौर में हुआ, जब अरविंद केजरीवाल दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार से अंदर तक हिल चुके थे. शायद दिल्ली शराब घोटाले में जेल भेजे जाने से भी ये बड़ा झटका था. लेकिन, अरविंद केजरीवाल ने आगे का सफर बिल्कुल वैसे ही प्लान किया जैसे गूगल मैप गलत टर्न ले लेने पर री-रूट करने के बाद नया रास्ता बना देता है – और नया रास्ता अरविंद केजरीवाल को उस पड़ाव तक तो पहुंचा ही दिया, जहां वो पहुंचना चाहते थे.

विसावदर और लुधियाना वेस्ट की जीत ने अरविंद केजरीवाल को जोश से भर दिया है, और वो उसी उत्साह के साथ गुजरात के मैदान में कूद पड़े हैं, जबकि चुनाव अब भी दो साल दूर है.

सवाल है कि आने वाले गुजरात चुनाव में अरविंद केजरीवाल को क्या हासिल होने वाला है?

और अरविंद केजरीवाल की वजह से किसे और कितना नुकसान होने वाला है?

विसावदर की जीत, ऐसी बातें समझने का आधार तो हो सकती है, लेकिन मॉडल नहीं. विसावदर में, जाहिर है, आम आदमी पार्टी ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को शिकस्त दी है. लेकिन, ये भी नहीं भूलना चाहिये कि उन्हीं मानदंडों की मिसाल है, जो अरविंद केजरीवाल की कामयाबी का फॉर्मूला है.

उपचुनाव में अरविंद केजरीवाल ने अपनी ही सीट बचाई है, बीजेपी और कांग्रेस के जबड़े जीत छीनकर लाने जैसी कोई बात नहीं है. 2022 में आम आदमी पार्टी को जो 5 सीटें मिली थीं, विसावदर भी उसमें शामिल थी. और, विसावदर भी आम आदमी पार्टी से पहले कांग्रेस के हिस्से में ही थी. बीजेपी तो जीत के लिए पहले से ही जूझ रही है.
जाहिर है, आगे भी अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के ही वोट काटकर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे – जैसे पिछली बार पांच सीटें जीती थी, कई सीटों पर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया था. जैसे, दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को तबाह किया है. दिल्ली तो कांग्रेस से लेकर बीजेपी को ही हैंडओवर कर दिया है.

प्रशांत किशोर का बिहार कैंपेन

गुजरात में अरविंद केजरीवाल का रोल तो वोटकटवा जैसा ही है, और बिहार में वैसा ही प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी करने वाली है. गुजरात में तो साफ है कि अरविंद केजरीवाल कांग्रेस कांग्रेस का ही वोट काटेंगे और बीजेपी को उसका फायदा मिलेगा. नये सिरे से देखें तो जो व्यवहार दिल्ली में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ किया, बिल्कुल वैसा ही. और फायदा बीजेपी को मिलना तय है.

अब सवाल ये है कि बिहार में प्रशांत किशोर किसके वोट काटने जा रहे हैं?

जिस रास्ते प्रशांत किशोर का कैंपेन चल रहा है, उससे तो यही लगता है कि आरजेडी और कांग्रेस के साथ साथ प्रशांत किशोर के उम्मीदवार नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को भी नुकसान पहुंचाएंगे. जैसे 2020 में चिराग पासवान ने डैमेज किया था.

चिराग पासवान का निशाना साफ नजर आ रहा था, प्रशांत किशोर का छिपा हुआ एजेंडा है. ऊपर से चिराग पासवान और प्रशांत किशोर दोनों ही एक-दूसरे की जमकर तारीफ भी कर रहे हैं. कुछ न कुछ तो पक ही रहा है, अंदर
ही अंदर.

हो सकता है गुजरात में अरविंद केजरीवाल की तरह बिहार में प्रशांत किशोर को भी कुछ सीटें मिल जायें, लेकिन बड़े पैमाने पर तहस-नहस ही करने वाले हैं – निशाने पर जो भी आ जाये.

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