भारतीय जनता पार्टी स्थानीय निकाय चुनाव में भी महाराष्ट्र विधानसभा वाला प्रदर्शन दोहराना चाहती है – और महाराष्ट्र की राजनीति में हाल फिलहाल जो कुछ भी नजर आ रहा है, सारी कवायद के पीछे बीजेपी ही है.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निकाय चुनाव में ‘दोस्ताना लड़ाई’ वाले बयान के बाद तो सब कुछ साफ साफ नजर आने लगा है.

देवेंद्र फडणवीस की हाल ही में केंद्रीय मंत्री अमित शाह से मुलाकात हुई है. और ये मुलाकात देवेंद्र फडणवीस के उदधव ठाकरे और आदित्य ठाकरे से दोबारा मिलने के बाद हुई है – और MNS नेता राज ठाकरे की उद्धव ठाकरे से ताजा मुलाकात भी महाराष्ट्र की राजनीति में हर रोज बदल रहे राजनीतिक समीकरणों की ही झलक दिखा रही है.

मराठी भाषा विवाद और देवेंद्र फडणवीस की तरफ से उद्धव ठाकरे को सत्ता पक्ष की तरफ आमंत्रण से लेकर अब तक के पूरे घटनाक्रम को देखें तो बीजेपी की भूमिका रिंगमास्टर जैसी लगती है – जाहिर है, ये सब बीजेपी निकाय चुनावों के लिए ही तो कर रही है.

और जिस तरह ये सब हो रहा है, वो डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के लिए खतरे की घंटियां नहीं तो क्या हैं – और कुछ न कुछ असर तो डिप्टी सीएम अजित पवार की राजनीतिक सेहत पर भी पड़ना ही है.

महाराष्ट्र में साल के आखिर तक BMC सहित 29 नगर निगम और 34 जिला परिषदों को मिलाकर 600 से ज्यादा स्थानीय निकायों के चुनाव होने की संभावना जताई जा रही है.

बीएमसी और बाकी निकाय चुनावों के लिए बीजेपी की तैयारी

देवेंद्र फडणवीस और महाराष्ट्र बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण हाल ही में सीनियर बीजेपी नेता अमित शाह से मिले थे. बताते हैं, दोनों नेताओं ने अमित शाह को निकाय चुनावों को लेकर ग्राउंड लेवल पर मिले फीडबैक पर अपडेट
दिया है.

मुलाकात से पहले महाराष्ट्र बीजेपी ने जगह जगह से कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया था. पता चला है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने पुणे, पिंपरी-चिंचवड़, कल्याण-डोंबिवली, अमरावती, नासिक, नागपुर और सोलापुर जैसे इलाकों में अकेले चुनाव लड़ने को फायदेमंद बताया है.

और देवेंद्र फडणवीस के बयान से भी लगता है कि बीजेपी महायुति के सहयोगी दलों को लेकर पहले से ही सजग हो गई है. देवेंद्र फडणवीस ने कहा है, तीनों सत्ताधारी दल गठबंधन के साथ स्थानीय निकाय चुनावों में उतरने की कोशिश करेंगे, जहां ये संभव नहीं होगा, वहां दोस्ताना लड़ाई लड़ी जाएगी.

एक बात तो साफ है, लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तरह बीजेपी गठबंधन सहयोगियों के साथ निकाय चुनाव नहीं लड़ने जा रही है – और महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक हलचल के पीछे सबसे बड़ी वजह भी यही है.

1। बीएमसी चुनाव तो महाराष्ट्र महायुति के साथ ही लड़ना चाहती है, लेकिन बाकी निकायों में दोस्ताना मैच की संभावना बढ़ गई है.

2। एक मीडिया रिपोर्ट में एक बीजेपी नेता के हवाले से खबर दी गई है 29 निगमों में महायुति के सहयोगियों के बीच गठबंधन की कोई संभावना नहीं है. देवेंद्र फडणवीस ने अमित शाह को ये अपडेट भी दे दिया है.

जमीनी स्तर से मिले फीडबैक से बीजेपी में राय बनी है कि जिस तरह से एकनाथ शिंदे की शिवसेना और एनसीपी के कई नेता लगातार विवादों में घिर रहे हैं, निकाय चुनाव के नतीजे प्रभावित हो सकते हैं, बीजेपी को कीमत भी चुकानी पड़ सकती है – और बीजेपी उसी से निबटने की पहले से ही तैयारी कर रही है.

ठाकरे बंधुओं की मुलाकातों के पीछे बीजेपी का फायदा

बीजेपी के अकेले चुनाव लड़ने की वजह सहयोगी की तरफ से हो रहा मोलभाव भी है. मालूम हुआ है कि कोंकण और सिंधुदुर्ग जैसे इलाकों में एकनाथ शिंदे की शिवसेना 60-70 फीसदी सीटों पर दावेदारी कर रही है. और वैसे ही, अजित पवार का दावा पुणे, पिंपरी-चिंचवड और पश्चिमी महाराष्ट्र को लेकर है, जिसे उनका गढ़ माना जाता है.

शिंदे सेना और अजित पवार के नेताओं का विवादों में आ जाना बीजेपी को काफी परेशान कर रहा है. महाराष्ट्र सरकार में एकनाथ शिंदे के कोटे से मंत्री संजय शिरसाट और अजित पवार के मंत्री माणिकराव कोकाटे हाल ही में विवादों में घिरे हुए थे. संजय गायकवाड के एक कैंटीन में बवाल मचाने के कारण एकनाथ शिंदे पक्ष की काफी किरकिरी हुई थी.

मौके की नजाकत को पहले ही भांपकर देवेंद्र फडणवीस ने पहले ही उद्धव ठाकरे की तरफ गुगली फेंक दी. और, मुलाकातें शुरू हो गईं. पहले उद्धव ठाकरे बेटे आदित्य ठाकरे के साथ देवेंद्र फडणवीस से मिले, और बाद में आदित्य ठाकरे की एक होटल में भी बीजेपी नेता से मुलाकात हो चुकी है.

और अभी उद्धव ठाकरे को हैपी बर्थडे बोलने राज ठाकरे मातोश्री पहुंच गये थे. ये दोनों भाइयों की हाल फिलहाल दूसरी मुलाकात थी. बड़े दिनों बाद मुंबई के वर्ली में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक रैली में साथ देखे गये थे.

जब राज और उद्धव ठाकरे आपस में मिल रहे हों, और उद्धव ठाकरे पिता-पुत्र देवेंद्र फडणवीस से मिल रहे, तो जाहिर है, सभी के सामने टार्गेट निकाय चुनाव का ही है. हर पक्ष मुलाकातों में अपना अपना पक्ष देख रहा है.

लब्बोलुआब तो यही नजर आता है कि राज-उद्धव और फडणवीस की ताबड़तोड़ मुलाकातों में निशाने पर बीजेपी के नये सहयोगी ही हैं, जिन्हें से पीछा छुड़ाने के लिए बीजेपी पुराने पार्टनर का रुख कर चुकी है – धीरे धीरे पूरी तस्वीर साफ भी हो जाएगी.

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