संसद में डिंपल यादव ने अपनी एक अलग छवि बनाई है. धीर-गंभीर-बेहद सौम्य और जरूरत होने पर अपने पति के साथ आयरन कर्टेन की तरह खड़ी रहने वाली एक पारिवारिक महिला जो देश और समाज के मुद्दों पर उतनी ही मुखर हैं जितना संसद में किसी भी नेता को होना चाहिए.

समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बेहद घुली मुली और पारिवारिक रिश्ता ऱखने वाली डिंपल के प्रति कुछ इस्लाम के स्वघोषित ठेकेदारों ने जो अपमानजनक बयानबाजी की है उससे पार्टी में नाराजगी स्वाभाविक है. पर अखिलेश यादव के लेवल पर चुप्पी होने के चलते सभी सपाई भी शांत हैं. भाजपा यही सवाल पूछ रही है कि क्या किसी मंदिर में डिंपल यादव जातीं और किसी हिंदू धर्म के स्वघोषित ठेकेदार ने कुछ ऐसा ही सवाल उठाया होता तो क्या यही चुप्पी दिखाई देती? इसका उत्तर शायद नहीं ही है .उल्टे समाजवादी पार्टी कई तरह के सवाल उठाती जिसमें सबसे मुख्य रहता कि यादव (पिछड़ा) होने के चलते इस तरह की बातें हो रही हैं. पर संसद की मस्जिद में डिंपल के परिधान के विषय में अशोभनीय सवाल उठाने वालों के खिलाफ पार्टी की चुप्पी समझ से परे है.

समाजवादी पार्टी पर आरोप लग रहा है कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में इतना गहरे तक उतर गई है कि एक मौलाना के डिंपल यादव के बारे में अभद्र भाषा का उपयोग करने के बावजूद वह चुप है. जबकि बाबर के खिलाफ बहादुरी दिखाने वाले राणा सांगा को गद्दार कहने वाले सपा के सांसद रामजी लाल समुन के साथ अखिलेश और उनकी पार्टी मुखर होकर खड़ी रही.

1- बीजेपी को डिंपल के सम्मान की फिक्र, पर सपा को नहीं?

दरअसल संसद का अधिवेशन शुरू होने के दिन संसद की मस्जिद में सांसद डिंपल यादव अपने पति और सपा के कुछ सांसदों के साथ साड़ी पहन कर गईं थीं. डिंपल यादव का साड़ी पहन के जाना इस्लाम के कुछ तथाकथित ठेकेदारों को पसंद नहीं आया. उनका मस्जिद जाना मुद्दा बन गया. ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन (AIIA) के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने एक टीवी डिबेट में संसद की मस्जिद में डिंपल यादव के पहनावे पर आपत्तिजनक टिप्पणी की.

मौलाना रशीदी ने उनके कपड़ों को इस्लामिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया था. इस बयान ने न केवल डिंपल यादव के व्यक्तिगत सम्मान को ठेस पहुंचाई, बल्कि एक राजनीतिक विवाद को भी जन्म दिया.इस्लाम के कुछ और तथाकथिक विद्वानों ने भी डिंपल के परिधान पर अशोभनीय टिप्पणियां कीं. लखनऊ में मौलाना रशीदी के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई. फिर भी आलोचना करने वालों का मुंह नहीं रुका. पर समाजवादी पार्टी की चुप्पी को देखते हुए बीजेपी ने इसे मुद्दा बना दिया.

भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सांसदों ने संसद भवन में विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने महिलाओं के सम्मान का मुद्दा उठाया. एनडीए सांसदों ने सोमवार 28 जुलाई को भी लोकसभा में प्लेकार्ड के साथ ये मुद्दा उठाया.

2-अखिलेश यादव की चुप्पी रहस्यमय

अखिलेश यादव एक परिपक्व नेता हैं. उन्हें पता है कि कब और कहां किस तरह का रिएक्शन उन्हें देना है. मंझे हुए नेता भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय सोच-समझकर कदम उठाते हैं. यही कारण है कि अखिलेश यादव की चुप्पी को एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है. ताकि इस विवाद को तूल पकड़ने से बचाया जा सके.उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दे कभी भी पूरा नरेटिव बदलने की ताकत रखते हैं.

अखिलेश यादव शायद  इसे एक बड़े विवाद में बदलने से बचना चाह रहे हैं. इसके बजाय, वह अन्य मुद्दों, जैसे कि सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, और किसान कल्याण पर फोकस्ड रहना चाहते हैं.  पर असल सवाल वोट की राजनीति ही है. समाजवादी पार्टी हो या भारतीय जनता पार्टी सभी को अपने वोट बैंक की चिंता है. राजनीतिक लाभ के लिए अब परिवार के सम्मान को तिलांजली दी जा रही है. यह केवल अखिलेश यादव ही नहीं बहुत से लोग कर रहे हैं.

समाजवादी पार्टी का मुख्य वोट बैंक यादव, मुस्लिम, और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों पर आधारित है. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है, और सपा ने हमेशा इस समुदाय के समर्थन को बनाए रखने की कोशिश की है. मौलाना रशीदी का बयान, हालांकि आपत्तिजनक था, एक धार्मिक नेता की ओर से आया था, और अखिलेश की तीखी प्रतिक्रिया इस समुदाय के एक वर्ग को नाराज कर सकती थी. अखिलेश यादव जानते हैं कि उनके पिता मुलायम सिंह यादव के जमाने से समाजवादी पार्टी का कोर वोटर मुस्लिम समुदाय रहा है. अखिलेश इस मामले को तूल न देकर अपने वोट बैंक को नाराज करने से बचने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

3-क्या डिंपल यादव को चमकाने की तैयारी है?
समाजवादी पार्टी में डिंपल यादव एक सशक्त नेता के रूप में उभरना चाहती हैं. वह पहले भी महिला मुद्दों और सामाजिक न्याय के लिए पार्टी की लाइन रखने के लिए मुखर रही हैं.  उन्होंने अपने भाषणों में महिला हेल्पलाइन, महिला सशक्तीकरण पर जोर दिया है. पर अब लगता है कि वो अब इससे और आगे जाना चाहती हैं. शायद अपने पति अखिलेश यादव की छाया से निकलना चाहती हैं.

इस विवाद में उनकी जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है  उससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपनी छवि को लेकर सजग हैं. डिंपल की इस प्रतिक्रिया से यह संदेश गया कि वह अपने सम्मान की रक्षा करने में सक्षम हैं, और अखिलेश को इस मामले में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है. अखिलेश इसके पहले अपनी पत्नी डिंपल के ऐसे मुद्दों को कभी हल्के में नहीं लेते थे.

राजनीतिक विश्लेषक अनिल पांडेय का कहना है कि हो सकता है कि अखिलेश यादव ने डिंपल को इस मुद्दे पर जानबूझकर सामने आने का मौका दिया हो. ताकि उनकी राजनीतिक छवि और चमक सके. क्योंकि जिस तरह डिंपल को अखिलेश प्रमोट करते रहे हैं वह किसी से छिपा नहीं है. 2009 में फिरोजाबाद उपचुनाव में हार के बावजूद 2012 में कन्नौज से उन्हें निर्विरोध निर्वाचित कराके अखिलेश यादव ने उन्हें सांसद बनाया. 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव में डिंपल को टिकट देने का यही संदेश था.

4-समाजवादी पार्टी क्या संतुलन बनाने में कामयाब होगी?

समाजवादी पार्टी इस मामले में एक संतुलन बनाए रखने की कोशिश में दिखाई देती है. समाजवादी पार्टी को पता है कि हिंदुओं को नाराज करने से केवल बीजेपी को फायदा होने वाला है. इसलिए पार्टी एक तरफ तो डिंपल यादव से बीजेपी पर इस मुद्दे को तूल देने का आरोप लगाकर अपनी स्थिति स्पष्ट करवा रही है.

वहीं दूसरी ओर, सपा ने मौलाना रशीदी के बयान की निंदा करने में ज्यादा आक्रामकता नहीं दिखाई.मतलब साफ है कि मुसलमानों को नाराज नहीं करना है. अखिलेश की रणनीति सपा की उस छवि को बनाए रखने की कोशिश हो जिसमें मुस्लिम समुदाय के प्रति पार्टी  संवेदनशील दिखती है.

समाजवादी पार्टी का इतिहास रहा है कि हिंदुओं के मामले में उनके फैसले अलग तरीके के रहते रहे हैं. जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस पर विवादित टिप्पणी की थी तब अखिलेश पर कई विधायकों का दबाव था कि मौर्य को पार्टी से बाहर किया जाए. पर अखिलेश ने पार्टी  से निकालने की मांग को ठुकरा दिया था.

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