डेड इकोनॉमी का मतलब क्या? वेनेजुएला-जिम्बाब्वे और अफगानिस्तान तक तो ठीक है, लेकिन भारत पर कैसे गलत हैं ट्रंप? – what is dead economy how us president Trump is wrong by calling Indian economy dead ntcppl


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ टैरिफ की लड़ाई में अपनी खीज और भड़ास को भी जाहिर कर दिया है. उन्होंने भारत के साथ-साथ रूस की अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ बताया. ट्रंप ने अपनी झुंझलाहट जाहिर करते हुए कहा कि भारत और रूस क्या करते हैं इससे उनको मतलब नहीं है. दोनों देश चाहें तो अपनी डेड इकोनॉमी को गर्त में ले जा सकते हैं.

बता दें कि ‘डेड इकोनॉमी’ एक गैर-तकनीकी शब्द है. आम तौर पर आर्थिक विशेषज्ञ ‘डेड इकोनॉमी’ शब्द का उपयोग किसी अर्थव्यवस्था को निष्क्रिय, गतिहीन या पूरी तरह से फेल हो जाने पर करते हैं. यह आर्थिक विकास की कमी, उच्च बेरोजगारी, न्यूनतम उत्पादन, कमजोर व्यापार गतिविधियों या वित्तीय अस्थिरता को दर्शाता है.

गौरतलब है कि यह शब्द औपचारिक रूप से आर्थिक विश्लेषण में प्रयोग में नहीं लाया जाता है. इसे अक्सर पॉलिटिक्ल स्टेटमेंट के लिए इस्तेमाल किया जाता है. डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत को “डेड इकोनॉमी” कहना एक ऐसा ही बयान है, जो भारत के रूस के साथ व्यापार और टैरिफ नीतियों पर उनकी आलोचना का हिस्सा था.

लेकिन भारत की इकोनॉमी को ‘डेड’ बताने वाले ट्रंप को 1.9% का ग्रोथ हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही अमेरिकी इकोनॉमी नहीं दिखी.

ट्रंप अगर ये बात वेनेजुएला, जिम्बाब्वे, अफगानिस्तान और मिस्र की अर्थव्यवस्था को कहते तो कुछ हद तक समझ में भी आती लेकिन दुनिया की चौथी बड़ी इकोनॉमी और कुछ ही सालों में तीसरे पायदान पर आने वाली भारत की अर्थव्यवस्था को डेड कहकर ट्रंप ने अपना ही भद्द पिटवाया है.

आइए वेनेजुएला, जिम्ब्बावे और अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था का हाल समझते हैं?

वेनेजुएला

वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को “डेड इकोनॉमी” कहा जा सकता है. हालांकि किसी भी संदर्भ में इसका मतलब इस देश के इकोनॉमिक सिस्टम को अपमानजनक बताना नहीं है. लेकिन यह सच है कि वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही है. 2013 से तेल की कीमतों में गिरावट और सरकारी कुप्रबंधन ने यहां अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया. वेनेजुएला जो तेल निर्यात पर निर्भर है ने राजस्व में भारी कमी देखी.

यह देश हाइपर इन्फ्लेशन से गुजर रहा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार 2019 के अंत में  वेनेजुएला में महंगाई दर 1 करोड़ प्रतिशत बढ़ गई थी.

इस अनियंत्रित महंगाई ने वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवर को बेकार कर दिया था. नागरिकों की क्रय शक्ति खत्म हो गई थी. वे रोज बोरे में पैसा लेकर जाते थे औऱ छोटे छोटे पॉलिथिन की थैलियों में सामान लेकर आते थे.

बेरोजगारी और खाद्य संकट ने 70 लाख से अधिक लोगों को पलायन के लिए मजबूर किया था. सरकारी नीतियों, जैसे मूल्य नियंत्रण और निजीकरण की कमी ने उत्पादन को ठप कर दिया.

बुनियादी ढांचे का पतन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने स्थिति को और बदतर किया. ये सभी कारक मिलकर वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को निष्क्रिय और “मृत” बनाते हैं.

जिम्बाब्वे

जिम्बाब्वे की आर्थिक स्थिति को देखते हुए इस देश की अर्थ प्रणाली को भी “डेड इकोनॉमी” कहा जा सकता है. 2000 के दशक में राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की भूमि सुधार नीतियों ने कृषि उत्पादन, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, को नष्ट कर दिया.

हाइपरइन्फ्लेशन (2008 में 231 मिलियन%) ने जिम्बाब्वे के डॉलर को बेकार कर दिया. आखिरकार 2009 में इस मुद्रा को ही छोड़ना पड़ा.

जिम्बाब्वे में चरम भ्रष्टाचार, सरकारी कुप्रबंधन और विदेशी निवेश में घोर कमी ने औद्योगिक और खनन क्षेत्रों को कमजोर किया. 2025 में यहां प्रति व्यक्ति आय मात्र 1,500 डॉलर है. यहां की 70% से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे है. जिम्बाब्वे  बेरोजगारी और व्यापक खाद्य असुरक्षा से जूझ रहा है. बुनियादी ढांचे का अभाव और बिजली संकट ने उत्पादन को और सीमित किया है.

ये कारक जिम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था को गतिहीन और “मृत” बनाते हैं.

अफगानिस्तान

अफगानिस्तान की अर्थव्यस्था भी कमोबेश निष्क्रिय इकोनॉमी की कैटेगरी में आती है. क्योंकि यह गंभीर संकट और स्थिरता की कमी से जूझ रही है. अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था 27% सिकुड़ गई.  2023 में यहां की जीडीपी केवल 17.33 बिलियन डॉलर थी. अमेरिका समेत कई विदेशी संस्थाओं ने अफगानिस्तान पर प्रतिबंध लगाए. अफगानिस्तान को मिलने वाली विदेशी सहायता जो पहले जीडीपी का 40% थी रुक गई.

विदेशी एजेंसियों ने दूसरे देशों में मौजूद अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक की 9 बिलियन डॉलर की रकम को फ्रीज कर दिया, जिससे यहां का बैंकिंग सिस्टम ध्वस्त हो गया और भयानक नगदी का संकट पैदा हो गया. अफगानिस्तान में अभी 15 मिलियन लोग खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं. बेरोजगारी 20% के करीब है, और महिलाओं पर तालिबान की पाबंदियों ने आर्थिक भागीदारी को और भी सीमित किया है. कृषि जो 40% रोजगार देती है सूखे और संसाधनों की कमी से प्रभावित है. हालांकि 2024 में यहां 2.5 प्रतिशत की जीडीपी बढ़ी.

इन तीन देशों के उदाहरण से समझा जा सकता है कि डेड इकोनॉमी कैसी होती है. कुछ वर्ष पहले मिस्र और श्रीलंका की अर्थव्यवस्था भी ऐसी ही गलतियों और लापरवाहियों का शिकार हुई थी. हालांकि इन देशों ने सक्रिय हस्तक्षेप और ईमानदार कोशिशों से अपनी स्थिति ठीक की है.

इसलिए कहा जा सकता है कि जब किसी देश में व्यापार, उत्पादन और निवेश लगभग बंद या बहुत कम हो जाता है.

नौकरियां बहुत कम हो जाती हैं या बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो जाते हैं.

जनता की कमाई और खर्च करने की ताकत बहुत घट जाती है.

नए कारोबार नहीं खुलते, पुरानी कंपनियां भी बंद होने लगती हैं.

बाजार में मांग और आपूर्ति दोनों कमजोर हो जाती हैं.

खाद्यान्न संकट पैदा हो जाता है. तो ऐसी स्थिति किसी देश के लिए डेड इकोनॉमी का संकेत हो सकती है.

भारत पर क्यों गलत हैं ट्रंप?

मजबूत आर्थिक विकास

ट्रंप अपनी छटपटाहट में भले ही भारत को डेड इकोनॉमी बताते हों लेकिन वह भूल जाते हैं 2025 में भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की है और यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. कुछ ही महीनों में इंडिया की इकोनॉमी तीसरे नंबर की होने वाली है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 2022-2025 के बीच 6-7% की औसत वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत 3% से कहीं अधिक है.

राष्ट्रपति ट्रंप भारत की इकोनॉमी को डेड बताते वक्त भूल जाते हैं कि 2024-25 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 131.84 बिलियन डॉलर का था. जिसमें भारत का निर्यात 86.51 बिलियन डॉलर और आयात 45.33 बिलियन डॉलर रहा. भारत अमेरिका का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. ये संकेत किसी डेड इकोनॉमी के नहीं है.

विश्व बैंक, S&P, और मूडीज जैसी एजेंसियों ने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बताया है.

भारत से पढ़े-लिखे कई CEO अमेरिका की दिग्गज कंपनियों का लीडरशिप संभाल रहे हैं. इनमें गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला, आईबीएम के सीईओ अरविंद कृष्णा कुछ चुनिंदा नाम हैं. किसी भी डेड या मृतप्राय इकोनॉमी से ऐसे वर्ल्ड क्लास टैलेंट नहीं निकलते हैं.

स्थिर और बुलंद हैं आर्थिक संकेतक

इस वक्त भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 2025 में 700 बिलियन डॉलर से अधिक है. भारत की ये मजबूत स्थिति इसे वैश्विक आर्थिक झटकों का सामना करने में सक्षम बनाती है.

भारत की मुद्रास्फीति दर लगभग 4-5% है. बेरोजगारी दर 7-8% है और नियंत्रण में हैं. सरकार विनिर्माण पर भारी खर्च कर रही है. भारत में सड़कें, रेलवे नेटवर्क, मेट्रो नेटवर्क, हवाई अड्डों का तेजी से विस्तार हो रहा है. इससे न सिर्फ रोजगार सृजन हो रहा है बल्कि इकोनॉमी की तस्वीर भी बदल रही है. यह एक गतिशील अर्थव्यवस्था का संकेत है.

खाद्य सुरक्षा

2025 में भारत की खाद्यान्न सुरक्षा और अन्न भंडार की स्थिति मजबूत है, अनुकूल मॉनसून और रिकॉर्ड खरीद के कारण 1 जुलाई 2025 तक भारत का गेहूं भंडार () चार साल के उच्चतम स्तर पर है. और चावल भंडार भी रिकॉर्ड स्तर पर है. यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली और बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से मूल्य स्थिरता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है.

दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था 2025 में न केवल जीवंत है और तेजी से बढ़ रही है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर रही है. भारत वर्ल्ड प्लेटफॉर्म पर मजबूती से खड़ा एक ऐसा खिलाड़ी है जो दुनिया की भू-राजनीतिक हलचलों को प्रभावित करने और बदलने की क्षमता रखता है. 6-7% की GDP वृद्धि, लबालब विदेशी मुद्रा भंडार, कई प्लेटफॉर्म पर साझेदारियां, स्वदेशी रक्षा उद्योग, सर्विस सेक्टर का उभार भारत की आर्थिक ताकत को दर्शाते हैं. ऐसे में ट्रंप का बयान महज उनकी कूटनीति और रणनीति का हिस्सा मालूम पड़ते हैं.

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