अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर टैरिफ की दरें 50 प्रतिशत तक बढ़ाये जाने पर चीन की मीडिया ने ट्रंप प्रशासन की तीखी आलोचना की है. चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता ने अमेरिकी दादागीरी की दीवार को जोर की टक्कर दी है.

ग्लोबल टाइम्स के संपादकीय में छपे एक लेख में दावा किया गया है कि अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों में आई नाटकीय गिरावट रूसी कच्चे की खरीद का मसला नहीं है. बल्कि यह एक आज्ञाकारी मित्र के बागी हो जाने का मसला है. ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि अमेरिकी सिद्धातों के अनुसार, ‘भारत एक ‘महान मित्र’ हो सकता है, लेकिन केवल तभी जब वह आज्ञाकारी रहे.’ ग्लोबल टाइम्स ने अमेरिकी नीतियों की धज्जियां उड़ाते हुए लिखा है कि वाशिंगटन भारत की नीतियों में तटस्थता को विश्वसासघात और कूटनीतिक आजादी को धोखा के रूप में देखता है.

ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि भारत पर दबाव बनाने का ये अभियान अमेरिकी दोगलेपन की पोल खोलता है. अखबार ने लिखा है, “अमेरिका और यूरोप भारत पर रूस के साथ बिजनेस करने का आरोप लगाते हैं लेकिन ये खुद रूस से भारी आयात करते हैं.” गौरतलब है कि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन रूस से भारी मात्रा में यूरेनियम, पैलेडियम और संशोधित तेल आयात करते हैं.

चीन के सरकारी अखबार ने लिखा है कि अमेरिका और भारत के रिश्तों में ये बदलाव अचानक हुआ लगता है. अभी फरवरी में ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया था और उन्हें “शानदार मित्र” बताया था. लेकिन कुछ ही महीनों बाद, व्यापार वार्ता विफल हो गई और भारत और अमेरिका के बीच कभी उम्मीदों की रोशनी रहे रिश्ते जल्द ही बिखर गए.

भारत-रूस संबंधों को प्रेशर प्वाइंट बना रहा अमेरिका

भारत अमेरिकी संबंधों की विवेचना करते हुए अखबार लिखता है कि अमेरिका-भारत संबंध इस मुकाम तक कैसे पहुंचा? ग्लोबल टाइम्स ने अपने ओपिनियन कॉलम में आगे लिखा है, “पर्यवेक्षकों का मानना है कि अपने स्थानीय किसानों की सुरक्षा के लिए अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजeर को और खोलने में भारत की अनिच्छा ने अमेरिका-भारत व्यापार समझौते को रोक दिया है. इसके जवाब में अमेरिकी सरकार ने रूस के साथ भारत के ऊर्जा संबंधों को प्रेशर प्वाइंट के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई है, जिसका उद्देश्य भारत को समझौता करने के लिए मजबूर करना है. साथ ही चूंकि रूस पर अमेरिका का सीधा आर्थिक दबाव उनके छोटे व्यापार के कारण सीमित है इसलिए वाशिंगटन अब दो लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नई दिल्ली के मास्को के साथ घनिष्ठ संबंधों को टारगेट कर रहा है. ये दो लक्ष्य हैं, रूस को कंट्रोल करना और भारत पर दंडात्मक कार्यवाही करना.”

गौरतलब है कि अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ की दर 50 प्रतिशत कर दिए जाने के बीच एक अहम घटनाक्रम हुआ है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगभग 6 सालों के बाद बीजिंग के दौरे पर जाएंगे.

भारत ने अमेरिकी टैरिफ नीतियों की आलोचना करते हुए इसे अन्यायपूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.

अखबार लिखता है, ‘क्या भारत की “गलती” वाकई रूसी तेल खरीदना है, या फिर अमेरिका के आदेशों का पालन न करना? इस टैरिफ विवाद के पीछे एक कठोर चेतावनी छिपी है – भारत एक “महान मित्र” हो सकता है, लेकिन सिर्फ़ इस शर्त पर कि वह आज्ञाकारी बना रहे. जिस क्षण भारत अमेरिका की रणनीतिक अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, वह तुरंत ही बेकार हो जाता है.’

ग्लोबल टाइम्स ने भारत की विदेश नीति के विविध आयामों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि, ‘हाल के वर्षों में भारत ने भू-राजनीति में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है. भारत ने ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में शामिल होकर एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पैरवी की है. साथ ही “हिंद-प्रशांत” में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सुरक्षा सहयोग को गहरा किया है. इस संतुलनकारी कार्य ने भारत को कूटनीतिक पैंतरेबाज़ी की काफी गुंजाइश दी है. लेकिन अब इस रणनीति को एक कठोर वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है.’

‘ये वास्तविकता है अमेरिका की एकतरफा आधिपत्य की स्थापना की जिद. यह एक खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है. अमेरिका शीत युद्ध के दौरान होने वाले टकराव को फिर से जिंदा कर रहा है और ‘किसी पक्ष को समर्थन न करने’ ‘गलत पक्ष को सपोर्ट’ करना बता रहा है. अमेरिका अब तटस्थता की नीति को दुश्मनी की तरह मान रहा है.’

भारत पर 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ, अगस्त के अंत तक पीएम मोदी की चीन यात्रा से इंडो-यूएस संबंधों में कई और आयाम देखने को मिल सकते हैं.

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