भगवान महावीर के आध्यात्मिक शांति से नक्सल आंदोलन की लाल क्रांति तक


sikandara vidhaanasabha: सिकंदरा के लछुआड़ और जन्मस्थान, जैन समाज के लिए श्रद्धा के प्रमुख केंद्र हैं. हर साल यहां हजारों श्रद्धालु भगवान महावीर के जीवन और शिक्षाओं को नमन करने आते हैं. तीन ओर से पहाड़ों से घिरे जैन मंदिर परिसर की शांति, मन को गहरे सुकून से भर देती है.

पास का कुंडघाट, अपनी रमणीयता और बन रहे डैम के कारण, भविष्य में ग्रामीण पर्यटन और सिंचाई का केंद्र बनने जा रहा है.

सिकंदरा के आध्यात्मिक शांति से लाल क्रांति तक का सफर

इन पहाड़ियों और घुमावदार रास्तों का एक दूसरा इतिहास भी है—वह इतिहास जो 1980 और 90 के दशक में सिकंदरा को नक्सल प्रभावित इलाकों की सूची में ले आया. उस दौर में यह इलाका उग्रवादियों की गतिविधियों का गढ़ माना जाता था. दिन में शांत और साधारण दिखने वाले ये जंगल, रात होते ही बंदूकों और फुसफुसाहटों के अड्डे बन जाते थे.

स्थानीय लोग आज भी 1987 के लछुआड़ मुठभेड़ को याद करते हैं, जब पहाड़ी की तलहटी में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच घंटों गोलीबारी चली थी. कई ग्रामीणों ने उस रात घरों के दरवाजे-खिड़कियां बंद कर दी थीं और मिट्टी के तेल के दीये बुझा दिए थे, ताकि रोशनी देखकर कोई निशाना न साध ले.

1992 में कुंडघाट डकैती की घटना भी लोगों की जुबान पर है, जब नक्सलियों ने एक व्यापारी के घर से राशन और अनाज लूटकर उसे पहाड़ों में छिपा दिया था. कहते हैं कि यह लूट “जन अदालत” के आदेश पर की गई थी, ताकि गरीब परिवारों में बांटा जा सके.

1995 में बरहट-सिकंदरा मार्ग पर हुई बस रोककर प्रचार करने की घटना भी चर्चित रही. माओवादी दस्ते ने बस यात्रियों को उतारकर खुले मैदान में बैठाया और कई घंटे तक ‘क्रांति’ और ‘जमींदारी उन्मूलन’ पर भाषण दिए.

गांवों के किनारे रात में टिमटिमाती मशालें, पहाड़ियों से आती कदमों की आहट, और दूर से सुनाई देने वाली सीटी की आवाज—ये सब संकेत होते थे कि कहीं न कहीं कोई गुप्त बैठक चल रही है. माओवादियों के पोस्टर गांव की दीवारों पर चिपके रहते और खेतों की पगडंडियों पर उनके पैरों के निशान सुबह-सुबह मिल जाते.

आज ये किस्से गांव के बुजुर्ग धीमी आवाज में सुनाते हैं—मानो इतिहास की एक परत खोल रहे हों, जिसमें डर, संघर्ष और बदलाव—तीनों की गंध बसी हो.

आध्‍यात्‍म के साथ मनाली जैसा फील देता है सिकंदरा

धीरे-धीरे, सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों, स्थानीय पहल और विकास कार्यों के चलते हालात बदले. आज वही पहाड़, जो कभी माओवादियों की पनाहगाह थे, अब ट्रेकिंग और तीर्थयात्रा के रास्ते बन रहे हैं.जैन धर्म के श्वेताम्बर सोसाइटी के अनुसार रजला गांव का क्षत्रिय कुंडग्राम 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मस्थली है, जहां करोड़ो रूपये की लागत से गुजरात के दिलवाड़ा मंदिर की तर्ज पर भव्य और विशाल मंदिर का निर्माण करवाया गया है. यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है.

सिकंदरा की यही दोहरी पहचान इसे अनोखा बनाती है—एक ओर यह भगवान महावीर की जन्मभूमि की आध्यात्मिक आभा में नहाया है और दूसरी ओर यह उस जुझारू संघर्ष की गवाही देता है जिसने हिंसा से शांति की ओर लंबा सफर तय किया. यहां आकर लगता है जैसे इतिहास, आस्था और प्रकृति एक साथ सांस ले रहे हों—और हर सांस में एक नई कहानी है.

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