बिहार के इस गांव में प्लेग महामारी से मचा था हाहाकार, श्रीकृष्ण ने किया ऐसा चमत्कार की आज भी…

ByCrank10

August 11, 2025



Krishna Janmashtami 2025: बिहार के बेगूसराय जिले में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर हर साल वृंदावन और मथुरा जैसा नजारा देखने को मिलता है. इस साल भी आयोजकों की तैयारी ऐसी चल रही है जैसे लग रहा है तेघड़ा मिनी मथुरा वृंदावन का स्वरूप लेने वाला है.

16 से 20 अगस्त तक चलेगा मेला

इस साल यहां 16 अगस्त से 20 अगस्त तक मेले का आयोजन होगा और 21 अगस्त को मूर्ति का विसर्जन होगा. इस दौरान मंडपों की आकर्षक सजावट और जय कन्हैया लाल की मदन गोपाल की के जयकारा से यहां के आठ किलोमीटर का क्षेत्र गुंजायमान रहेगा. बता दें कि साल 1927 में एक पंडाल से शुरू हुआ मेला अब 15 पंडाल मंडप तक पहुंच चुका है. मेला आयोजन के पीछे यहां फैली प्लेग महामारी में हुई भारी संख्या में लोगों की मौत से जुड़ी कहानी भी है. उस वक्त भगवान श्री कृष्ण के नाम के चमत्कार ने वहां के लोगों की जिंदगी बदल दी थी.

श्री कृष्ण ने किया था महामारी का नाश

कहा जाता है कि यहां के लोगों के रोम रोम में भागवान श्री कृष्ण बसते हैं. उनकी ही भक्ति करने से लोगों को प्लेग महामारी से छुटकारा मिला था. तब से ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर तेघरा में मेले का आयोजन होता है. पांच दिवसीय यह मेला बिहार ही नहीं देश भर में प्रसिद्ध है. हिंदू धर्म ग्रंथो में भगवान श्री कृष्ण की लीला और उनके उपदेश का प्रभाव सनातन धर्म में बहुत महत्व रखता है.

हजारों की बची थी जान

तेघरा की पहचान व्यावसायिक दृष्टिकोण से दूर-दूर तक होती है. यहां पांच दिनों तक चलने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मेला बिहार ही नहीं देश भर में प्रसिद्ध है. करीब छह किलोमीटर के दायरे में कुल 15 मंडपों में होने वाली श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा में बिहार भर के लोग यहां आते हैं.

पलायन कर रहे थे लोग

कहा जाता है कि साल 1927 में तेघड़ा इलाके में प्लेग ने महामारी का रूप ले लिया था. जिसकी वजह से यहां सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी, जबकि हजारों लोग इसकी चपेट में आ गए थे. इससे बचाव के लिए लोगों ने यज्ञ अनुष्ठान के साथ-साथ हर तरह की कोशिश की, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हो रहा था. इसके बाद लोगों में हताशा और निराशा फैलने लगी और तेघरा से लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया.

कीर्तन मंडली ने दिखाया था रास्ता

कहा जाता है कि लोगों के पलायन के वक्त यात्रा विश्राम के दौरान चैतन्य महाप्रभु की कीर्तन मंडली यहां पहुंची तो लोगों ने कीर्तन मंडली को अपनी आप बीती सुनाई. इस मंडली के सदस्यों ने यहां के लोगों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने को कहा. साल 1928 में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर यहां के कुछ लोगों ने सबसे पहले स्टेशन रोड में प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू की.

97 सालों से मनाया जा रहा उत्सव

बता दें कि पूजा अर्चना के बाद से ही तेघरा से प्लेग जड़ से खत्म हो गया. यहां तक कि फिर दोबारा कभी इस बीमारी से लोगों का सामना नहीं हुआ. इतना ही नहीं भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के बाद से यह इलाका हर दृष्टिकोण से बड़ी तेजी से आगे बढ़ता गया और लोगों में खुशहाली लौट आई. धीरे-धीरे यह परंपरा आगे बढ़ती चली गई. जिसका विस्तृत रूप आज पंद्रह मंडपो के साथ साज सज्जा और प्रसिद्धि के रूप में देखने को मिल रहा है.

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दूसरे राज्यों से आते हैं मूर्ति कलाकार

जानकारी के अनुसार यहां की आकर्षक मूर्तियां और झांकियां लोगों के आकर्षण का केंद्र होती है. मूर्ति और साज सज्जा के लिए पश्चिम बंगाल ,मुंबई, दिल्ली, झारखंड उत्तराखंड सहित अन्य जगहों से मूर्ति कलाकार आते हैं. 97 सालों से चली आ रही यह पूजा हर दृष्टिकोण से खास मायने रखती है. कुल छह किलोमीटर परिक्षेत्र में बने पंद्रह पंडाल मे भगवान श्री कृष्ण की अलग-अलग झांकी निकलती है.

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