भगवान विष्णु के दिव्य अस्त्र से प्रेरित पीएम मोदी का सुरक्षा मिशन, क्या है सुदर्शन चक्र जिससे सुरक्षित होंगे देश के हर अहम ठिकाने – sudarshan chakra lord krishna lord vishnu pm modi suraksha mission ntcpvp


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को लालकिले से संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने अपने अहम भाषण में एक महत्वपूर्ण ऐलान भी किया. पीएम मोदी ने कहा कि 10 साल में देश का हर अहम ठिकाना सुरक्षित होगा और इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कवच ‘सुदर्शन चक्र’ का ऐलान किया गया.

संपूर्ण सुरक्षा का आश्वासन है सुदर्शन
पीएम मोदी ने सुरक्षा के इस अहम फैसले और प्लान को सुदर्शन नाम दिया है, जो अपने आप में एक सुरक्षा का वादा है. सुदर्शन, भगवान विष्णु का प्रमुख अस्त्र है, जो उनके चतुर्भुज रूप में प्रमुख रूप से धारण किया हुआ दिखाई देता है. यह अस्त्र उनके कृष्णावतार में पूर्णावतार कहे जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का भी प्रमुख अस्त्र है.

विष्णु भगवान के जो चार प्रतीक चिह्न हैं, उनमें शंख, चक्र, गदा, पद्म शामिल है. इसमें शंख सकारात्मक का प्रतीक है. पद्म यानी कमल ज्ञान और अभय का प्रतीक है, गदा अस्त्र होने के कारण शत्रु रक्षा का प्रतीक है, लेकिन सुदर्शन सिर्फ अस्त्र और सुरक्षा का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह एक तरीके से खुद ही विष्णु स्वरूप भी है. यह संपूर्ण सुरक्षा का आश्वासन है और सिर्फ चक्र की मौजूदगी ही भगवान के होने की मौजूदगी का अहसास कराती है.

कहा भी गया है…
राम सिया भजु बारम्बारा।
चक्र सुदर्शन है रखवारा ।।

भगवान विष्णु का ही अंश है सुदर्शन चक्र
सुदर्शन को भगवान विष्णु का अंश इसलिए माना जाता है, क्योंकि इसका निर्माण विश्वकर्मा ने देवी त्रिपुर सुंदरी के मोहिनी अंश से किया था. इस अस्त्र में ब्रह्मा की मेधा शक्ति, विष्णु की तेज शक्ति और शिव की भैरवी शक्ति शामिल है. तीनों देवताओं की सकारात्मक तेजपुंज शक्ति से ही सुदर्शन का निर्माण हुआ, इसलिए यह सबसे शक्तिशाली अस्त्र बन गया. सुदर्शन सिर्फ धुरी पर घूमने वाला एक यंत्र नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड है, जो एक नियत गति से अपनी धुरी पर घूम रहा है.

सुदर्शन चक्र

कालचक्र भी है सुदर्शन चक्र
सुदर्शन को कालचक्र भी कहा जाता है. इसकी व्याख्या बहुत व्यापक तरीके से की गई है. विष्णु सुदर्शन के प्रयोग से जल्दी ही किसी का वध नहीं करते हैं. क्योंकि सुदर्शन से मृत्यु असल में मृत्यु नहीं मोक्ष है. क्योंकि इसके बाद जीवात्मा कालचक्र से मुक्त हो जाती है. इसीलिए सिर्फ इसकी मौजूदगी और होने का अहसास ही दुराचारियों में भय और सज्जन लोगों को निर्भय बना देता है.

शिवजी ने विष्णुजी को वरदान में दिया था चक्र
पुराण कथाओं में है कि विश्वकर्मा ने इस अस्त्र को बनाकर इसे सभी योगों और अस्त्र के स्वामी शिव को सौंप दिया था. शिव का त्रिशूल भी सत्व, रज और तमोगुण से बना हुआ है. चक्र को भगवान शिव ने अपनी कुंडलिनी शक्ति में स्थापित किया था. एक बार देवासुर संग्राम में असुर जब अधिक प्रबल हो गए और भगवान विष्णु एक साथ कई असुरों से मल्ल युद्ध करते-करते थक गए, तब उन्होंने शिव जी की आराधना की और उनसे उनकी कुंडलिनी शक्ति की मांग अस्त्र के रूप में की. शिवजी ने संसार के कल्याण के लिए ही अपनी इस कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर उसे चक्र के रूप में भगवान विष्णु को सौंपा.

सूर्यदेव भी हैं चक्र स्वरूप
चक्र लेकर जैसे भगवान विष्णु रणक्षेत्र में पहुंचे वहां भयंकर प्रकाश हुआ, जैसे करोड़ों सूर्य उग आए हों. वह चक्र एक-एक करके असुरों का संहार कर लेना. तब असुर रण छोड़ कर भाग खड़े हुए और देवता विजयी हुए. सत्य की स्थापना हुई. तब सूर्यदेव, जिन्होंने अदिति मां के गर्भ से अंड के रूप में जन्म लिया था और स्वर्ण अंड कहलाए उन्होंने सुदर्शन के तेज को धारण किया और आकाश में उसी तेज के रूप में स्थापित हो गए. इस तरह सूर्य देव भी नारायण कहलाए और सूर्य देव ही सुदर्शन चक्र की तेज शक्ति के रूप में भगवान विष्णु की उंगली में कालचक्र की तरह घूमते हैं और दिन-रात का कारण बनते हैं.

श्रीराम के छोटे भाई शत्रुघ्न थे चक्र के अवतार
जब भगवान ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया, तब सुदर्शन ने उनकी आध्यात्मिक शक्ति के रूप में शत्रुघ्न के रूप में जन्म लिया था. कुछ लोककथाएं और किवदंतियां ऐसी भी हैं कि जब हनुमान जी संजीवनी लाते हुए अयोध्या पहुंचे थे, तब शत्रुघ्न ने उनसे गुप्त बातचीत की थी. इसका आशय यह था कि शत्रुघ्न हनुमान के साथ लंका चलना चाहते थे, ताकि वह युद्ध में श्रीराम के काम आ सकें, लेकिन तब श्रीराम ने उन्हें यहकर रोक दिया कि इस जन्म में उन्हें सिर्फ मानवीय आधार पर युद्ध जीतना है, देवत्व नहीं दिखाना है. इसीलिए इस युद्ध को तीर-कमान से ही होने दो.

तब शत्रुघ्न ने उनसे यह वचन लिया कि अगले किसी भी अवतार में आप मुझे हमेशा साथ रखेंगे. शत्रुघ्न की यह इच्छा कृष्णावतार में पूरी हुई थी. हालांकि शत्रुघ्न अपने एक अंश से भगवान राम के तरकश में मौजूद थे और जिस आंजनेय अस्त्र से रावण की नाभि का अमृत सुखाया गया था, वह शत्रुघ्न ही थे.

Sudarshan Chakra

महाभारत में सुदर्शन का दिखता है मानवी स्वरूप
कृष्णावतार में सुदर्शन न सिर्फ एक अस्त्र के रूप में थे, बल्कि कई कथाओं में उनका मानवी स्वरूप भी दिखता है. इसका जिक्र महाभारत के आखिरी में बर्बरीक भी करता है. जब पांडवों को यह भ्रम हो जाता है कि यह युद्ध उन्होंने अपने पराक्रम से जीता है तब बर्बरीक उन्हें सच बताता कि असल में सुदर्शन ही हर मोर्चे पर युद्ध कर रहा था. उसने ही तीर चलाकर भीष्म को गिराया. उसने ही द्रोणाचार्य का वध किया और उसने ही कर्ण को भी मारा. वही सुदर्शन अर्जुन का गांडीव, भीम की गदा और युधिष्ठिर का भाला था.

सुदर्शन खुद ही असंख्य योद्धाओं का शरीर बनकर युद्ध लड़ रहा था. जब कर्ण ने अर्जुन पर सर्पबाण मारा तो यह सुदर्शन धरती में धंस गया था. इसके कारण अर्जुन का रथ बुरी तरह टूट गया था. तब अर्जुन कहता है कि मेरा रथ तो सुरक्षित है. बर्बरीक कहता है कि जरा अपने रथ से हनुमान ध्वजा उतारो. जैसे ही रथ से हनुमान जी की ध्वजा उतरी, रथ में भयंकर विस्फोट हो गया. यह दृश्य देखकर
पांडव हक्के-बक्के रह गए.

युद्ध, वध और रक्त का नहीं शांति का प्रतीक है सुदर्शन चक्र
इसी समय भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से सुदर्शन मानव स्वरूप में प्रकट हुआ. वह बहुत घायल था. जगह-जगह अंग भंग था. लहू बह रहा था. फिर भी उसके चेहरे पर दिव्य तेज था. भगवान श्रीकृष्ण ने उसके सारे घाव ठीक कर दिए और सुदर्शन फिर से उसी देवत्व के साथ अपनी उंगली पर धारण कर लिया, जिस गरिमा के साथ उसका अस्तित्व है.

किसी भी आनंददायी, सुकून देने वाले, शांत पहुंचाने वाले दृष्य को सुदर्शन कहते हैं. इन गुणों और व्यक्तित्व वाले पुरुष और स्त्री भी सुदर्शन कहलाते हैं. श्रीकृष्ण का यह अस्त्र अभय दान देने वाला और शांति की स्थापना का संदेश है.

जन्माष्टमी से एक दिन पहले पीएम मोदी ने इसी ‘सुदर्शन चक्र’ सुरक्षा प्लान का ऐलान करके देश को चारों ओर से सुरक्षित बनाने को लेकर कदम बढ़ाया है.

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