Vladimir Putin : रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब अमेरिका के अलास्का में आमने-सामने बैठे तो पूरे विश्व की नजर इस बैठक पर थी. रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी टैरिफ के झगड़े का कुछ निदान निकलेगा इसकी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन यह वार्ता एक तरह से निष्फल ही रही, क्योंकि जिस मुद्दे पर सहमति की उम्मीद थी, वो नहीं हो पाई. हालांकि इस बैठक को सफल दिखाने की कोशिश की गई है और यह भी कहा गया है कि इससे आगे का रास्ता बनेगा और संभवत: रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ति पर सहमति बन जाए. उम्मीद है कि अगली बैठक मास्को में हो, ट्रंप ने बैठक को प्रोडक्टिव बताते हुए कहा है कि वे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से बात करने के बाद ही आगे की बैठक के लिए कुछ कह पाएंगे. वहीं पुतिन ने यूक्रेन को भाई देश बताया और यात्रा को उपयोगी करार दिया है. यहां सवाल यह है कि इस असफल या अधूरी बातचीत का असर भारत पर क्या पड़ेगा, वह भी तब जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ अटैक किया है.

भारत-रूस संबंध और अमेरिका की परेशानी

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. भारत में तेल की खपत इतनी ज्यादा है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल बाहर से खरीदता है. वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 35–40% तक है. इसी वजह से अमेरिका को परेशानी है और यह कहता है कि भारत, रूस से जितना तेल खरीदता है, उससे प्राप्त पैसों का उपयोग रूस यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में करता है. भारत के सामने दुविधा यह है कि अगर वह रूस से तेल लेना बंद कर दे तो ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. वहीं अगर पश्चिमी दबाव को नजरअंदाज कर रूस से खरीद जारी रखे तो टैरिफ और प्रतिबंधों का खतरा बढ़ जाएगा.

ट्रंप-पुतिन वार्ता में भारत की चर्चा

ट्रंप और पुतिन की अलास्का वार्ता का फोकस पूरी तरह यूक्रेन पर था. अमेरिका चाहता था कि रूस कुछ रियायतें दे और युद्धविराम की दिशा में आगे बढ़े, लेकिन रूस अड़ा रहा और कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के मूल कारण का अंत किया जाए. इस बातचीत में भारत का नाम सीधे तौर पर नहीं आया, लेकिन भारत से जुड़ा मुद्दा अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहा. अमेरिका यह जानता है कि रूस को सबसे बड़ी आर्थिक मदद भारत जैसे देशों से ही मिल रहा है. इस स्थिति में अगर शांति वार्ता से अमेरिका और रूस के रिश्ते सुधरते हैं, तो भारत पर लगे 25% टैरिफ में ढील की गुंजाइश बनती. लेकिन रूस और अमेरिका की वार्ता अधूरी रह गई, ऐसे हालात में भारत पर दबाव और बढ़ने की संभावना बन गई.

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भारत पर अमेरिका का टैरिफ दबाव

अमेरिका पहले ही इस बात के संकेत दे चुका है कि अगर रूस पर युद्ध रोकने का दबाव कामयाब नहीं होता, तो वह उन देशों को भी निशाने पर लेगा जो रूस को आर्थिक सहारा दे रहे हैं. इसमें भारत सबसे ऊपर है. अमेरिका भारत को घेरने की तैयारी में है, इसलिए उसने टैरिफ का खेल खेला है. अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है. भारत के लिए यह बड़ी चिंता है क्योंकि सस्ते रूसी तेल से भारत को बहुत फायदा होता है.सेकेंडरी टैरिफ वैसे टैरिफ को कहते हैं, जो किसी प्रतिबंधित देश से व्यापार करने पर लगाया जाता है.इसके साथ ही अमेरिका यह भी चाहता है भारत अपनी विदेश नीति को प्रो अमेरिका कर ले और रूस का साथ छोड़ दे, जिसके लिए भारत तैयार नहीं है, क्योंकि रूस के साथ भारत की दोस्ती बहुत पुरानी है. भारत की विदेश नीति शुरुआत से गुटनिरपेक्ष की रही है, अभी अगर भारत रूस या अमेरिका में से किसी एक को चुनता है, तो उसके लिए परेशानी बढ़ सकती है. गुटनिरपेक्ष नीति के लिए अभी बड़ा कठिन समय है, लेकिन यही मोदी सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी है. भारत की कूटनीति अगर अभी सफल हो जाती है, तो यह मोदी सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी क्योंकि ट्रप बहुत ही अनप्रिडेक्टेबल पर्सनालिटी हैं.

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