बेहद अनोखा इतिहास समेटे है खगड़िया, जानिए क्यों अकबर के दीवान ने रखा गया ये नाम


Khagaria Vidhaanasabha: बिहार के खगड़िया का इतिहास बेहद दिलचस्प है. कभी यह मुंगेर का हिस्सा था, तो कभी इसे फरकिया कहा गया. राजा अकबर के दीवान टोडरमल ने इसे नापने की कोशिश की, लेकिन सात नदियों और उनकी अनगिनत धाराओं ने इसे अनुपयोगी बना दिया. तभी इसका नाम पड़ा फरकिया. बाद में यहां उगने वाली ‘खगड़ा घास’ ने इसे नया नाम दिया—खगड़िया. 1981 में यह आधिकारिक रूप से जिला बना और अपनी अलग पहचान बनाई.

खगड़िया नाम की कहानी

आज जिसे हम खगड़िया कहते हैं, उसका नाम समय के साथ कई बार बदला. पहले इसे फरकिया कहा गया. वजह थी—अकबर के दीवान टोडरमल. जब वे यहां पहुंचे, तो सात नदियों और उनकी 56 धाराओं-उपधाराओं के कारण यहां की नपाई पूरी नहीं कर पाए. उन्होंने इसे अनुपयोगी मानते हुए ‘फरक कर दिया’. तभी से यह जगह फरकिया नाम से जानी जाने लगी. बाद में यहां खूब उगने वाली खगड़ा घास ने इसे नया नाम दिया—खागड़ का एरिया, यानी खगड़िया.

डाउनलोड 4
अकबर के दीवान टोडरमल

नदियों का संगम

खगड़िया को ‘सात नदियों की धरती’ कहा जाता है. यहां कोसी, कमला, करेह, काली कोसी, बागमती, बूढ़ी गंडक और गंगा बहती हैं. इसके अलावा मालती, खर्रा, भगीरथी और मंदरा जैसी धाराएं भी इसे सींचती हैं. नदियों से घिरा यह इलाका कभी उपजाऊ जमीन और कभी बाढ़ की तबाही—दोनों ही रूपों के लिए जाना जाता रहा है.

प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास

खगड़िया पहले मुंगेर जिले का हिस्सा था. महाभारत काल में इसका संबंध मोदगिरि से जोड़ा जाता है, जो वंगा और ताम्रलिप्त के पास एक राज्य की राजधानी थी. यह भूभाग प्राचीन अंग राज्य का हिस्सा रहा, जिसकी राजधानी चंपा (भागलपुर के पास) थी. सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस इलाके का जिक्र किया. बाद में यह पाल शासकों, मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों के अधीन रहा.

अंग्रेजी हुकूमत और विद्रोह

1762 में मीर कासिम ने मुर्शिदाबाद छोड़कर मुंगेर को राजधानी बनाया और अंग्रेजों से टकराव किया. ब्रिटिश दौर में खगड़िया अनुमंडल के रूप में 1943-44 में अस्तित्व में आया. अंततः 1981 में यह पूर्ण जिला बन गया.

आज़ादी की लड़ाई और बलिदान

B9CBD0EE 3C21 4D02 ACCA 2275D99EE29B 1755168922963
बलदेव दास

खगड़िया की मिट्टी ने आज़ादी की लड़ाई में भी अपने सपूत दिए. गोगरी प्रखंड के सोंडिहा गांव के बलदेव दास का नाम इतिहास में अमर है. 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जान बचाई. अंग्रेज सिपाहियों ने बेरहमी से उन पर लाठियां बरसाईं और कान में हवा भर दी, लेकिन उनकी वीरता ने उन्हें इतिहास का नायक बना दिया. बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया.

जातीय संघर्ष और चर्चित घटनाएं

80 के दशक में खगड़िया जातीय संघर्षों और नरसंहारों के कारण भी सुर्खियों में रहा. 1985 का तौफिर दियारा कांड पूरे देश में चर्चा का विषय बना. इस घटना ने रणवीर यादव जैसे नामों को कुख्यात कर दिया

खगड़िया सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और साहस की कहानी है. कभी फरकिया, कभी खगड़ा घास और अब खगड़िया—नाम बदलता रहा, लेकिन यहां की पहचान बनी रही. नदियों की धरती, स्वतंत्रता सेनानियों का गौरव और सामाजिक टकराव का इतिहास—खगड़िया सचमुच बिहार की अनोखी मिट्टी का हिस्सा है.

यह भी पढ़ें: Asia Cup 2025: टीम इंडिया में खुशी की लहर, इस खिलाड़ी ने पास किया फिटनेस टेस्ट



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *