कई शहरी भारतीय अभिभावकों के लिए, नर्सरी में दाखिला बच्चे के जीवन की पहली और सबसे कठिन दौड़ बन गया है. कुछ प्रतिष्ठित स्कूलों में प्रवेश की संभावनाएं अब आईआईटी-जेईई की स्वीकृति दरों से भी कम हैं. वहीं लागत एमबीए कार्यक्रमों के बराबर है और भावनात्मक रूप से भी इसका असर बहुत ज़्यादा है.

आईआईटी-जेईई (2024-25): 1.8 लाख छात्र जेईई एडवांस्ड में शामिल हुए. इनमें से 17,740 आईआईटी सीटें उपलब्ध थी. यानी 10% को दाखिले का अवसर मिला.

दिल्ली नर्सरी एलीट स्कूलों में लगभग 70-100 सामान्य सीटें उपलब्ध हैं. आवेदन हजारों में आते हैं. प्रवेश की संभावना 3-5% से भी कम है. इस तरह नर्सरी में दाखिला लेना, आईआईटी, आईआईएम या यहां तक कि आइवी लीग कॉलेजों में प्रवेश पाने से भी कठिन हो जाते हैं.

केन्द्रीय विद्यालयों में और भी ज्यादा मारामारी
2024 में के.वी. बालवाटिका-1 (नर्सरी) की सीटें सार्वजनिक ड्रॉ के माध्यम से भरी गईं. कुछ क्षेत्रों में, कुछ दर्जन सीटों के लिए हजारों आवेदकों ने प्रतिस्पर्धा की.आज दिल्ली के किसी बड़े स्कूल में सीट मिलना लॉटरी जीतने जैसा है.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक मेहरा, जो अपने बेटे के लिए नौ स्कूलों में आवेदन कर चुके एक पिता हैं, उनका कहना है कि हम नए साल का जश्न नहीं मना रहे थे. क्योंकि, हम उस वक्त एडमिशन लिस्ट के लिए वेबसाइट अपडेट कर रहे थे.

स्कूलों की बढ़ती फीस का बोझ
दिल्ली के शीर्ष स्कूलों में फीस 2.5-6 लाख प्रति वर्ष (20,000-50,000 प्रति माह) + प्रवेश शुल्क 1.5 लाख तक है. वहीं मुंबई आईबी स्कूल: 4-10 लाख प्रति वर्ष, जिसमें एडवांस “बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर” और “डेवलपमेंट” शुल्क शामिल होते हैं.

MBA करने का खर्चा, प्राइमरी एजुकेशन के कोस्ट से कम
बेंगलुरु के प्रीमियम स्कूल प्रतिवर्ष 2-4 लाख रुपये फीस लेते हैं. इसके अलावा यूनिफॉर्म, किताबें, एक्टिविटी चार्ज और ट्रांसपोर्ट का खर्च भी आता है. माता-पिता बताते हैं कि प्रीमियम सेटअप में पहले साल का बिल 7-8 लाख रुपये तक पहुंच जाता है. गुड़गांव के एक माता-पिता ने बेबाकी से बताया कि मेरे एमबीए की फीस मेरी बेटी की नर्सरी से कक्षा 5 तक की पढ़ाई के खर्च से भी कम है.

माता-पिता शिकायत करते हैं कि अगर बच्चे का भाई-बहन किसी बड़े स्कूल का पूर्व छात्र या छात्रा नहीं हो तो पहली बार कुलीन स्कूलों में दाखिला लगभग नामुमकिन हो जाता है.

नेहा कपूर, जिनके बेटे को उनके द्वारा आवेदन किए गए सभी छह स्कूलों से खारिज कर दिया गया था, कहती हैं कि जब तक आपका एक बच्चा पहले से ही अंदर न हो, तब तक यह एक बंद क्लब जैसा लगता है.

योग्यता को लेकर माता-पिता का बढ़ता तनाव
इतनी सारी मुश्किलों के बाद माता-पिता की शिक्षा और नौकरी जैसी चीजों को भी दाखिला के वक्त देखा जाता है. हालांकि, दिल्ली ने सालों पहले मां की शिक्षा या माता-पिता की नौकरी जैसे अनुचित मानदंडों पर प्रतिबंध लगा दिया था, फिर भी कई फॉर्म अभी भी विवरण मांगते हैं.

आईटी प्रोफेशनल राहुल खन्ना कहते हैं कि मुझसे तीन स्कूलों में मेरे काम के बारे में पूछा गया. भले ही वे कहें कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. एक अभिभावक के तौर पर आप लगातार यही सोचते रहते हैं कि क्या मैं पर्याप्त शिक्षित हूं? क्या मैं इतना कमाता हूं कि वे मुझ पर विचार करें?

पूरे परिवार के लिए बड़ा प्रोजेक्ट
नर्सरी में दाखिले सिर्फ़ बच्चों के लिए नहीं होते, बल्कि यह एक पूरे परिवार का प्रोजेक्ट बन जाता है. माता-पिता दूरी के मानदंड के तहत योग्यता प्राप्त करने के लिए घर बदलते रहते हैं. माताएं आवेदन की तैयारी में ज़्यादा समय बिताने के लिए नौकरी छोड़ रही हैं. दंपत्ति फ़ायदा उठाने के लिए दूसरे बच्चे के जन्म को टाल रहे हैं या समय पर करवा रहे हैं.

मनोवैज्ञानिक एक गहरी समस्या की चेतावनी देते हैं. बाल परामर्शदाता डॉ. अंजलि वर्मा कहती हैं कि हम बच्चों में प्रतिस्पर्धात्मक चिंता डाल रहे हैं. माता-पिता मेरे पास ऐसी समस्या लेकर आते हैं. क्योंकि उनके तीन साल के बच्चे का किसी खास स्कूल में दाखिला नहीं हो पाया. क्योंकि उन्हें अस्वस्थ बताया गया. यह बात बच्चों तक भी पहुंचती है. इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.

क्या करें माता-पिता
इन दिनों सरकारी मॉडल स्कूल मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए लाइफलाइन बन रहे हैं. इन स्कूलों में कुछ हजार सीटों के लिए दस हजार से ज्यादा आवेदन आ रहे हैं. इसके अलावा माता-पिता 8-10 स्कूलों में आवेदन करें और अस्वीकृति से न डरें. कई स्कूलों में ड्रॉ के माध्यम से एडमिशन हो रहा है, जिसके परिणाम अप्रत्याशित होते हैं.

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