जब अपनी ही पत्नी से डर गए थे महादेव… ऐसे हुई थी दसमहाविद्या की उत्पत्ति – ten mahavidya forms origin story devi sati navratri durga puja ntc vpv


देवी पूजा में देवी के कई स्वरूप देखने को मिलते हैं. सामान्य तौर पर हम नवरात्र के दौरान उनके नौ दिव्य रूपों की पूजा करते हैं. जिनमें क्रम से शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री के नाम शामिल हैं. इस परंपरा को लेकर आगे बढ़ें तो तंत्र में देवी के 10 रहस्यभरे स्वरूपों का जिक्र मिलता है. जिन्हें देवी के दस महाविद्या स्वरूप कहा जाता है. इसी स्वरूप वर्णन में देवी के उन रहस्यों से पर्दा उठता है जिनसे सामान्य तौर पर हम अनजान रहते हैं.

सवाल है कि देवी के ये दस महाविद्या स्वरूप कैसे सामने आए और इनमें कहीं भी देवी दुर्गा, चंडी या गौरी-पार्वती का नाम क्यों नहीं है? जबकि हम अपनी रोज की पूजा में मुख्य रूप से गौरी-पार्वती या देवी दुर्गा की ही आराधना करते हैं.

देवी का सौम्य रूप
हम देवी के इन स्वरूपों की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि ये सभी देवी के सौम्य रूप हैं और इनकी पूजा करना आसान है. दूसरा ये कि इन देवियों की छवियों के साथ हम ममता भरा कनेक्शन भी महसूस करते हैं. इनसे डर नहीं लगता है, लेकिन असल में देवी के जो महाविद्या स्वरूप हैं उनका वर्णन कर पाना, उनकी पूजा कर पाना और उनके तेज को सह पाना बहुत कठिन है. बल्कि उनकी छवियां भी भयंकर हैं और तंत्र की विधियों से रोज पूजा नहीं की जा सकती है. बल्कि सामान्य आम आदमी तो कभी भी तंत्र विधि से पूजा नहीं कर सकता है.

महाविद्या के भयंकर स्वरूप
महाविद्या का स्वरूप इतना भयंकर है कि इनकी उत्पत्ति जब हुई तो खुद शिवजी उन्हें देखकर भाग खड़े हुए थे. देवी भागवत पुराण में इससे जुड़ी कहानी सामने आती है. बात तबकी है, जब शिवजी का विवाह, आदिशक्ति की अवतार सती से हुआ था. सती के पिता दक्ष प्रजापति इस विवाह के खिलाफ थे. उन्होंने शिवजी को गुस्से में आकर शाप भी दे दिया और यज्ञ की आहुति से दूर कर दिया.

नवरात्रि

इसी शाप को सिद्ध करने के लिए दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार के पास) एक विशाल यज्ञ कराया. इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया लेकिन शिवजी को जानबूझकर नहीं बुलाया. देवी सती से ये सहन नहीं हुआ. उन्होंने पिता के यज्ञ में जाने के लिए शिवजी से कहा, लेकिन शिव उन्हें जाने से रोकने लगे. इससे दोनों के बीच एक तरह से विवाद की स्थिति बन गई.

शिवजी से क्यों नाराज हो गई थीं देवी सती
सती, पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं जिसे शिवजी ने नकारने की कोशिश की. तब सती भयंकर नाराज हो गईं और इसी दौरान उनका शरीर जलने लगा और गुस्से में काला पड़ गया. महादेव शिव उनका ये रूप देखकर भागने लगे. जब वह दूसरी दिशा में दौड़े तो सती के ही अंश से निकली एक और शक्ति भयानक रूप नें उन्हें डराने लगी. शिव उससे भी डर गए और फिर तीसरी ओर भागे. वह जिस ओर भागते उधर देवी सती का एक नया ही स्वरूप सामने आ जाता था.  इस तरह देवी सती के भीतर से निकली अलग-अलग 10 शक्तियां दसों दिशाओं में फैल गईं और शिवजी ने उनसे घिर गए.

अपने पति को डरा हुआ देखकर माता सती कुछ शांत हुईं और शिवजी को भागने से रोका. लेकिन इस दौरान उन्होंने सभी दसों महाविद्या को अपने भीतर से प्रकट कर दिया था. यही दसों दिशाओं की अलग-अलग देवियां और महाविद्या हुईं. देवी सती तो दक्ष यज्ञ में भस्म हो गईं, लेकिन दसों महाविद्या अपने-अपने स्वरूप में प्रकट हो गईं. जिनमें त्रिपुर सुंदरी खुद ही प्रमुख और प्रधान देवी हैं. बाकी सभी उनका अंश और अवतार हैं. इस तरह शिवजी की पत्नी सती से दस महाविद्या उत्पन्न हुईं.

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