मिडिल ईस्ट की जंग अब एक नए और ज्यादा खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है. इजरायल ने पहली बार कैस्पियन सागर में हमला कर रूस और ईरान के बीच चल रही अहम हथियार सप्लाई लाइन को निशाना बनाया है. यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक मैसेज भी है. अब जंग सीमाओं और क्षेत्रों की दीवारें तोड़ रही है.
कैस्पियन सागर, जो दुनिया का सबसे बड़ा इनलैंड वाटर बॉडी माना जाता है, रूस और ईरान के बीच एक सुरक्षित कॉरिडोर की तरह इस्तेमाल हो रहा था. यहां से दोनों देश ड्रोन, गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरणों की एक-दूसरे को सप्लाई कर रहे थे.
खास तौर पर ईरान के “शाहेद ड्रोन” इस रूट की सबसे बड़ी कड़ी थे. रूस इन ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के शहरों पर हमले में कर रहा है, जबकि ईरान इन्हें खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर पर निशाना साधने के लिए इस्तेमाल कर रहा है.
सूत्रों के मुताबिक, जंग के दौरान रूस और ईरान के बीच सैन्य सहयोग तेजी से बढ़ा है. रूस ने ईरान को सैटेलाइट इमेजरी और एडवांस ड्रोन टेक्नोलॉजी भी मुहैया कराई है, जिससे हमलों की सटीकता और ताकत दोनों बढ़ी.
इसी नेटवर्क को तोड़ने के लिए इजराइल ने ईरान के कैस्पियन तट पर स्थित बंदरगाह बंदर अंजली को निशाना बनाया. इस हमले में वॉरशिप, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, कमांड सेंटर और शिपयार्ड जैसे कई अहम ठिकानों को नुकसान पहुंचा.
वॉर स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली नेवी के पूर्व कमांडर एलियेजर मारुम के अनुसार, इस ऑपरेशन का मुख्य मकसद रूस की सप्लाई चेन को कमजोर करना और ईरान को यह दिखाना था कि उसकी समुद्री सुरक्षा में भी बड़ी कमजोरियां हैं.
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