Jwala Devi Mandir: चैत्र नवरात्र अब अपने समापन की ओर है. देशभर में इस दौरान भक्ति और शक्ति की आराधना का माहौल बन रहता है. नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है और श्रद्धालु देवी की कृपा पाने के लिए व्रत, पूजन और दर्शन करते हैं. इसी खास मौके पर हम आपको शक्ति के एक ऐसे दिव्य धाम के दर्शन कराएंगे, जहां आस्था सिर्फ मान्यता नहीं, बल्कि साक्षात चमत्कार के रूप में दिखाई देती है.

जी हां, हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है मां ज्वाला देवी मंदिर. इस मंदिर में मां ज्वाला के रूप में सदियों से अखंड ज्योति जल रही है. मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि अखंड ज्योति स्वयं देवी के रूप में प्रज्वलित है. यह ज्वाला बिना घी, तेल या बाती के चौबीसों घंटे जलती रहती है. जो कि आज तक न कभी बुझी है और न ही इसकी लौ में कोई कमी आई है.

यहां ज्वाला ही है मां का दिव्य स्वरूप

नवरात्र के पावन अवसर पर यह दरबार और भी भव्य रूप में सजता है. लाखों-करोड़ों भक्त यहां आकर इस दिव्य ज्योति के दर्शन करते हैं. यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था का वह केंद्र है, जहां विश्वास और चमत्कार साथ-साथ दिखाई देते हैं.

यह धाम मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि जब देवी सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए, जिनमें से उनकी जीभ यहां गिरी थी. उसी का प्रतीक यह ज्वाला मानी जाती है, जिसकी पूजा आज भी की जाती है.

नहीं सुलझ पाया आजतक ज्वाला का रहस्य

मंदिर में कुल 9 ज्वालाएं हैं, जो सदियों से लगातार जल रही हैं. इन्हें देवी के नौ रूपों- महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, हिंगलाज भवानी, विंध्यवासिनी, अन्नपूर्णा, चंडी देवी, अंजना देवी और अंबिका देवी, के रूप में पूजा जाता है. भक्तों का मानना है कि ये ज्वालाएं स्वयं देवी का मुख हैं, इसलिए इस स्थान को ज्वालामुखी कहा जाता है. यहां की एक और विशेषता यह है कि जब प्रसाद चढ़ाया जाता है, तो वह जलता नहीं, केवल ज्वाला ही प्रज्वलित रहती है. पूजा के बाद दिए जाने वाले चरणामृत में भी कई बार लौ के दर्शन होने की बात कही जाती है, जिसे भक्त चमत्कार मानते हैं.

अकबर भी नहीं बुझा सका था मां की ज्वाला

इतिहास में भी इस मंदिर के रहस्य को समझने की कई कोशिशें हुईं. मुगल बादशाह अकबर ने इसे अंधविश्वास मानते हुए मंदिर के पास बहने वाली नदी का पानी ज्वाला की ओर मोड़ दिया, लेकिन तेज प्रवाह के बावजूद यह लौ नहीं बुझी थी. इसके बाद उन्होंने नंगे पांव चलकर सोने का छत्र चढ़ाया, जो आज भी मंदिर में मौजूद है. हालांकि, वह अब सोने का नहीं रहा, बल्कि किसी अज्ञात धातु में परिवर्तित हो चुका है. समय बदला, राजवंश बदले, मुगल और अंग्रेजी हुकूमत आई और गई, लेकिन इस ज्योति का रहस्य आज भी अनसुलझा है. वैज्ञानिक भी इसके पीछे के कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है.

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