ग्राउंड रिपोर्ट: ‘रोज बम गिरेंगे तब भी घर नहीं छोड़ूगी…’, जंग में सब खो चुकीं लेबनान की हाजी सलीमा की कहानी – south lebanon ground report sour city israeli military strikes war middle east crisis ntc amkr


दक्षिण लेबनान के शहर सूर (Sour) की तबाह बस्तियों में, जहां धूल अब भी हवा में तैर रही है और धमाकों की गूंज अभी तक सुनाई देती है, मलबे के बीच से हिम्मत और जिद की कहानियां उभर रही हैं. यहां इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बीच दक्षिण लेबनान में हजारों लोगों को जबरन अपने घरों से बेदखल कर दिया गया है.

पूरे के पूरे गांव खाली हो चुके हैं, और जो सड़कें कभी रोजमर्रा की जिंदगी से भरी रहती थीं, वे अब पलायन के रास्ते बन गई हैं. लेकिन यहां छोड़ कर हर कोई नहीं गया.

इन्हीं लोगों में से एक हैं हाजी सलीमा (एक बुजुर्ग महिला) जिनका घर अब सिर्फ टूटे हुए ढांचे में बदल चुका है. वह अपने हाथों से टूटे कंक्रीट और मुड़े हुए लोहे को हटाती हैं. यह सिर्फ मलबा नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की यादें हैं.

आजतक से बात करते हुए, तबाही के बीच भी उनकी आवाज में अडिगता साफ झलकती है. वह अपनी जमीन छोड़ने से इनकार करती हैं.

वह कहती हैं कि “यह मेरा जन्मस्थान है. यह मेरा घर है. मैं इसे क्यों छोड़ूं?”और फिर बिना रुके अपना काम जारी रखती हैं. हाजी सलीमा आगे कहती हैं कि “अगर हर दिन बम भी गिरें, तब भी मैं यहीं रहूंगी.”

उनकी बातें उन लोगों के गहरे डर को भी दिखाती हैं जो अब भी वहां टिके हुए हैं, कि अगर वे एक बार चले गए, तो शायद कभी लौट नहीं पाएंगे.

हाजी सलीमा के लिए इतिहास एक चेतावनी है. वह फिलिस्तीन का उदाहरण देती हैं, जहां लोग अपना घर छोड़ने के बाद पीढ़ियों तक वापस नहीं लौट पाए.

“वे आएंगे और इसे कब्जा कर लेंगे, जैसे वहां किया,” वह कहती हैं.

टूटे घरों में सोने को मजबूर लोग

दक्षिण लेबनान में कई और आवाजें भी इसी जिद को दोहराती हैं. परिवार आधे टूटे घरों में रह रहे हैं, खुले में खाना बना रहे हैं, क्षतिग्रस्त छतों के नीचे सो रहे हैं.

वे पलायन की बजाय अनिश्चितता को चुन रहे हैं. उनका विरोध शांत है, लेकिन मजबूत लग रहा है. यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि पहचान, यादों और अपनेपन से जुड़ा है. उनके लिए “जमीन” सिर्फ एक जगह नहीं है. यह उनका इतिहास है, उनकी इज्जत है, और उनका अस्तित्व है.

जैसे-जैसे संघर्ष जारी है, इन समुदायों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है. लेकिन तबाही के बीच एक सच्चाई अडिग है. हाजी सलीमा जैसे लोगों के लिए, अपना घर छोड़ना सिर्फ एक जगह छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी पूरी पहचान खो देना है.

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