वकालत में ‘काले कोट’ का सफेद सच: 81% महिला वकीलों ने माना-पुरुषों से ज्यादा है संघर्ष, SCBA की रिपोर्ट – gender discrimination challenges women lawyers india scba report ntcpmm


आज जब हम हर क्षेत्र में ‘बराबरी’ की बात करते हैं, तब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की एक ताजा रिपोर्ट हमें आईना दिखा रही है. यह रिपोर्ट बताती है कि काला कोट पहनकर इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं के लिए खुद का रास्ता कितना पथरीला है.

SCBA की सर्वे रिपोर्ट ‘डॉक्यूमेंटिंग वॉयस ऑफ विमेन लीगल प्रोफेशनल्स इन इंडिया’ के मुताबिक, देश की 81.3 प्रतिशत महिला वकीलों का मानना है कि इस पेशे में उनकी यात्रा पुरुष साथियों की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन है.

ये सर्वे कोई छोटी-मोटी राय नहीं, बल्कि 2,604 महिला कानूनी पेशेवरों के अनुभवों का निचोड़ है. रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को कोर्ट रूम से लेकर पुलिस स्टेशन और चैंबर्स तक में भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

भेदभाव का अनुभव: लगभग 34% महिलाओं ने व्यक्तिगत रूप से जेंडर बायस (लिंग भेद) महसूस किया है.

संस्थागत पूर्वाग्रह: 10 में से लगभग 6 महिलाओं का मानना है कि सिस्टम में ही कहीं न कहीं भेदभाव छिपा है, जो फीस तय करने से लेकर बड़े केस मिलने तक झलकता है.

कहां-कहां झेलना पड़ता है भेदभाव?

भेदभाव का क्षेत्र प्रतिशत

फीस और पेमेंट की बातचीत

42.7%
वर्क-लाइफ बैलेंस (काम और घर का तालमेल) 39.5%
क्लाइंट का भरोसा और बड़े केस मिलना 32.8%
पैनल में नियुक्ति और पदनाम 29.1%
सीनियर या चैंबर हेड का बर्ताव 27.3%

जूनियर हो या सीनियर, संघर्ष सबके लिए एक सा है. हैरानी की बात यह है कि वकालत में अनुभव बढ़ने के बाद भी यह संघर्ष कम नहीं होता. एक सीनियर वकील जिन्हें 15 साल से अनुभव है, इनमें से 79% मानती हैं कि राह मुश्किल है. वहीं जूनियर वकील (0-5 साल) अनुभव वाली 82.3% इसी बात से इत्तेफाक रखती हैं. यानी करियर के किसी भी पड़ाव पर ‘जेंडर’ एक चुनौती बनकर सामने खड़ा रहता है.

बर्नआउट और सुरक्षा की चिंता
रिपोर्ट एक और गंभीर पहलू की ओर इशारा करती है, वो है तनाव और सुरक्षा. इनमें 84% महिला वकील काम के दबाव और तनाव से जूझ रही हैं. जूनियर वकीलों में यह आंकड़ा 94% से भी ज्यादा है.

वहीं करीब 16.1% ने यौन उत्पीड़न का अनुभव साझा किया है. दुखद यह है कि शिकायत करने वाली 57% महिलाओं को ‘बैकलैश’ यानी विरोध का सामना करना पड़ा.

इस रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू भी है. करीब 83.1% महिलाएं ऐसी हैं जो अपने परिवार की पहली वकील (First Generation Lawyers) हैं. उनके पास कोई पुराना पारिवारिक नेटवर्क नहीं है, फिर भी वे अपनी जगह बना रही हैं. साथ ही, 51.9% महिलाएं भविष्य में नेतृत्व की भूमिका (Leadership Roles) निभाने और चुनाव लड़ने का इरादा रखती हैं.

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