मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग क्या अंजाम लेगी, इसका अनुमान लगाना अब मुश्किल हो गया है. इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका के हवाई हमलों और उसके जवाब में ईरान की कार्रवाई ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ते दबाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को भी प्रभावित किया है और इस जंग की आंच अब पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है. ऐसे में यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह संघर्ष सिर्फ हवाई हमलों तक सीमित रहेगा या अमेरिका “बूट्स ऑन द ग्राउंड” यानी जमीन पर सैनिक उतारने का फैसला कर सकता है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल ईरान पर कुछ बड़े हमलों को टालकर बातचीत का रास्ता खुला रखा है. हालांकि इसके साथ ही अमेरिका ने मध्य पूर्व में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती भी बढ़ा दी है, जिसमें 82वीं एयरबोर्न डिवीजन और मरीन फोर्स शामिल हैं. इससे यह साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका सभी विकल्प खुले रखे हुए है.अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर गहरी राजनीतिक बहस छिड़ गई है. कई नेता जमीनी कार्रवाई के पक्ष में हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोग इसके खिलाफ हैं.

क्या है ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’?

“बूट्स ऑन द ग्राउंड” एक ऐसा सैन्य मुहावरा है, जिसका मतलब होता है किसी विदेशी जमीन पर सैनिकों की वास्तविक तैनाती. यानी केवल एयरस्ट्राइक, मिसाइल या ड्रोन हमले नहीं, बल्कि सीधे जमीन पर उतरकर युद्ध लड़ना. आधुनिक युद्ध में इसे सबसे बड़ा और गंभीर कदम माना जाता है, क्योंकि इसके बाद संघर्ष का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है.

इतिहास और राजनीति से जुड़ा शब्द

इस शब्द की जड़ें इतिहास में जरूर मिलती हैं, लेकिन इसका आधुनिक इस्तेमाल 1980 के ईरान बंधक संकट के दौरान सामने आया, जब अमेरिकी जनरल वॉल्नी वार्नर ने इसका उपयोग किया. तब से यह शब्द अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का अहम हिस्सा बन गया है. जब भी कोई नेता कहता है ‘नो बूट्स ऑन द ग्राउंड’, तो वह संकेत देता है कि वह जमीनी युद्ध से बचना चाहता है.आज के दौर में कई देश बिना जमीन पर उतरे भी युद्ध लड़ सकते हैं. ड्रोन, मिसाइल और साइबर हमलों के जरिए दुश्मन को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन जमीन पर नियंत्रण के बिना निर्णायक जीत हासिल करना मुश्किल माना जाता है.

इतिहास की बात करें तो सैनिकों और ‘बूट’ का रिश्ता सदियों पुराना है. पहले विश्व युद्ध के समय ‘बूट’ शब्द का इस्तेमाल सैनिक के लिए भी होता था और ट्रेनिंग को ‘बूट कैंप’ कहा जाता था. लेकिन ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ जैसा सटीक वाक्यांश अपेक्षाकृत नया है.

ईरान में जमीनी जंग क्यों मुश्किल

ईरान का विशाल भूगोल, पहाड़ी इलाके और मजबूत सैन्य ढांचा किसी भी जमीनी अभियान को बेहद कठिन बना सकते हैं. इसके अलावा रूस जैसे देशों का समर्थन और क्षेत्रीय राजनीति भी इस फैसले को और पेचीदा बना देती है.

आगे क्या?

विश्लेषकों का कहना है कि हवाई हमले दबाव बना सकते हैं, लेकिन जमीन पर नियंत्रण के बिना युद्ध का परिणाम तय करना मुश्किल होता है. ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ अब इस पूरे संघर्ष की दिशा तय करने वाला संकेत बन गया है. अगर अमेरिका यह कदम उठाता है, तो यह टकराव एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है. फिलहाल दुनिया की नजर इसी सवाल पर टिकी है कि क्या अमेरिका इस आखिरी और सबसे जोखिम भरे कदम की ओर बढ़ेगा या नहीं.

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