देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, लेकिन कांग्रेस का पूरा फोकस केरलम पर है. केरलम विधानसभा चुनाव में गांधी परिवार की साख सबसे ज्यादा दांव पर लगी है. गांधी परिवार के लिए केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की सरकार बनाना अपनी साख को बचाए रखने के लिए उम्मीद है, जिसके चलते ही राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता बंगाल और असम के बजाय केरलम पर अपना ध्यान केंद्रित कर रखे हैं.
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी केरलम के वायनाड सीट से सांसद हैं जबकि उनके भाई राहुल गांधी पहले इस सीट से सांसद रह चुके हैं. प्रियंका ने अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत केरलम से की है. इसीलिए राहुल गांधी सहित कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने सबसे ज्यादा फोकस केरल के चुनाव प्रचार पर रखा है.
केरल में 10 साल से पिनराई विजयन के नेतृत्व में वाममोर्चा की सरकार है, जहां पर कांग्रेस मुख्य मुकाबले में खड़ी नजर आ रही है. देश के जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उसमें सबसे ज्यादा कांग्रेस की उम्मीदें केरल से लगी हुई हैं, जिसके चलते ही राहुल गांधी ने असम और बंगाल में जनसभाएं करने से ज्यादा केरल के चुनावी कमान को संभाल रखा है. इसे पांच प्वाइंट में समझ सकते हैं?
केरलम में मुख्य फाइट में कांग्रेस
देश के पांच राज्य बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधी जंग है तो तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके और आईएडीएमके में मुकाबला है. असम में जरूर बीजेपी से कांग्रेस का मुकाबला है, लेकिन बदरुद्दीन अजमल की पार्टी त्रिकोणीय बनाने में जुटी है. ऐसे में केरल ही एकलौता राज्य है, जहां पर लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ में सीधी फाइट होती दिख रही है.
केरल विधानसभा चुनाव में भले ही बीजेपी अपनी ताकत लगा रही है, लेकिन अभी भी चुनाव दो ध्रुवीय बना हुआ. यूडीएफ बनाम एलडीएफ. केरल के सियासी इतिहास में सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड रहा है, जिसके चलते ही राहुल गांधी फ्रंटफुट पर उतरकर कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल बनाने में जुटे हैं. वह अपने प्रचार के तरीके को बदलकर लोगों के बीच घुलकर मिलकर संवाद कर रहे हैं. इसीलिए दूसरे राज्य में अपनी ताकत लगाने के बजाय केरल पर खास फोकस कर रखा है.
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कांग्रेस को सत्ता परिवर्तन की उम्मीद
केरल में हर पांच साल तक सत्ता बदलती रही है, लेकिन 2021 में पिनाराई विजयन इस परंपरा को तोड़ने में कामयाब रहे थे. कांग्रेस नेताओं का मानना है कि पिनाराई विजयन सरकार के 10 साल के शासन के बाद जनता बदलाव चाहती है. कांग्रेस को डर है कि अगर वे लगातार तीसरी बार 2026 में हारते है, तो राज्य में उनका सांगठनिक ढांचा पूरी तरह बिखर सकता है और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सकता है. इसीलिए राहुल गांधी सहित पूरी कांग्रेस ने केरल चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है.
कांग्रेस का मानना है कि पिनाराई विजयन सरकार के 10 साल के शासन के बाद जनता बदलाव चाहती है और राज्य में एलडीएफ को सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ रहा है. इसीलिए कांग्रेस कई मुद्दों पर लेफ्ट को घेरने में जुटी है. राज्य पर बढ़ता कर्ज और बेरोजगारी, सोने की तस्करी और अन्य घोटालों को लेकर सरकार की घेराबंदी और वायनाड भूस्खलन जैसी आपदाओं के बाद राहत कार्यों और बुनियादी ढांचे में कमियों को मुद्दा बनाया है.
दिसंबर 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने शानदार प्रदर्शन किया था. इस जीत ने कांग्रेस को यह भरोसा दिलाया है कि जमीनी स्तर पर मतदाता उनके साथ जुड़ रहे हैं. वे इस माहौल को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने की कवायद में है, जिसके लिए राहुल गांधी ने पूरी तरह केरल पर ही अपना फोकस कर रखा है.
राहुल-प्रियंका का केरल से कनेक्शन
केरल विधानसभा चुनाव पर कांग्रेस का मुख्य फोकस करने के पीछे गांधी परिवार का राज्य के साथ सियासी कनेक्शन भी है. प्रियंका गांधी वायनाड सीट से सांसद हैं तो राहुल गांधी पहले रह चुके हैं. प्रियंका इस परिवार की पहली सदस्य हैं, जिन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत किसी दक्षिणी राज्य से की. प्रियंका से पूर्व इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी दक्षिणी राज्यों से अपनी राजनीति को धार दे चुके हैं.
2019 में राहुल गांधी ने अमेठी में हार की संभावना को देखते हुए वह केरल में वायनाड से चुनाव लड़े थे. अमेठी से राहुल चुनाव हार गए और वायनाड ने उनके राजनीतिक जीवन को समाप्त होने से बचाया. प्रियंका ने अपनी चुनावी पारी का आगाज केरल से किया है, जिसके चलते केरल की चुनाव लड़ाई जीतना गांधी परिवार के साख से जुड़ा है.
राहुल गांधी खुद केरल के वायनाड से सांसद रहे हैं, जिससे इस राज्य का उनके लिए भावनात्मक और राजनीतिक महत्व बहुत अधिक है. केरल में जीत कांग्रेस की राष्ट्रीय छवि को सुधारेगी और यह संदेश देगी कि वे अभी भी क्षेत्रीय स्तर पर बीजेपी और वामपंथियों को हराने में सक्षम हैं. इसके चलते राहुल गांधी केरल चुनाव में दिन रात एक किए हुए हैं.
पिनाराई विजयन की उम्र क्या बन रही बाधा
केरल के चुनाव जंग में वाममोर्चा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन उनकी उम्र चुनावी रण में एक बाधा बन सकती है. पिनाराई विजयन का जन्म 24 मई 1945 को हुआ था, यानी 2026 के चुनावों के समय उनकी उम्र लगभग 81 वर्ष है. ऐसे में कांग्रेस के पास नए नेताओं की पूरी फौज है, पार्टी ने किसी भी चेहरे को आगे कर चुनाव नहीं लड़ रही है. राहुल गांधी ही कांग्रेस के चुनावी अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं.
केरल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव यानि जनरेशन चेंज हो रहा. कांग्रेस और अन्य दल युवा नेतृत्व को आगे बढ़ा रहे हैं (जैसे वी.डी. सतीशन या टीवीके के विजय का प्रभाव). ऐसे में विजयन की उम्र को पुराने दौर की राजनीति के रूप में पेश किया जा रहा है. कांग्रेस विजयन की 80 के पार की उम्र में मुख्यमंत्री पद की भारी जिम्मेदारियों और लगातार चुनावी दौरों को लेकर सवाल उठते हैं. जब एक ही नेता लंबे समय तक सत्ता में रहता है, तो जनता में बदलाव की इच्छा स्वाभाविक होती है. ऐसे में कांग्रेस पूरी ताकत झोंक रखी है.
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मुस्लिम-क्रिश्चियन वोट बैंक कितना मुफीद
केरल का सियासी समीकरण भी कांग्रेस को चुनाव में ताकत झोंकने के लिए मजबूर कर रहा है. केरल में भले ही 50 फीसदी से ज्यादा हिंदू वोटर हैं, पर मुस्लिम और ईसाई मतदाता किंगमेकर की भूमिका अदा करते हैं. राज्य में 27 फीसदी मुस्लिम और 18 फीसदी ईसाई समुदाय के वोट हैं, इस तरह से दोनों को मिलाकर 45 फीसदी के करीब होता है.
सूबे में पारंपरिक रूप से मुस्लिम मतदाता UDF (कांग्रेस गठबंधन) के प्रति अधिक वफादार रहे हैं और इस बार भी उनके लिए पलड़ा भारी नजर आता है. कांग्रेस का मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन होने के चलते मुस्लिम वोटरों का लाभ यूडीएफ को मिल सकता है. मुस्लिम मतदाता अक्सर उस मोर्चे को चुनते हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने में सबसे सक्षम दिखे, कांग्रेस की राष्ट्रीय उपस्थिति उन्हें UDF की ओर खींचती है.
ईसाई मतदाता, जो कभी कांग्रेस का सबसे सुरक्षित वोट बैंक थे, अब काफी हद तक LDF (वामपंथी) और यहां तक कि NDA (BJP) की ओर भी झुकते दिख रहे हैं. 2021 के चुनाव में केरल कांग्रेस (M) के जोस के मणि गुट के LDF में शामिल होने से ईसाई वोटों का एक बड़ा हिस्सा वामपंथियों के पास चला गया था, लेकिन इस बार हालात बदले हैं. कांग्रेस की कोशिश ईसाई और मुस्लिम वोटों के सियासी समीकरण को बनाकर चुनावी जंग फतह करने की स्टैटेजी है.
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