गर्मियां का आगाज हो चुका है और गर्मियां आते ही लोग पहाड़ों की ट्रिप प्लॉन करने लगते हैं. पहाड़ों की खूबसूरती हर किसी को अपनी ओर खींचती है, लेकिन यहां का सफर मैदानी इलाकों से काफी अलग होता है. ऊंचाई, संकरे रास्ते और बदलता मौसम ही यहां दूर-दूर से लोग देखने आते हैं, लेकिन पहाड़ों का सुकून ही आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है.

अगर आप भी पहाड़ी इलाकों में घूमने का प्लान कर रहे हैं तो सबसे पहले यह जान लें कि वहां आपको कैसे बैग लेकर जाना चाहिए, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में लोग सबसे बड़ी गलती ही गलत बैग लेकर जाने की करते हैं, क्योंकि एक गलत बैग आपकी पूरी ट्रिप को आपके लिए सिरदर्द बना सकता है.

पहाड़ों पर कैसे बैग ले जाना सही होता है?

दिल्ली और यूपी-बिहार के लोग जब पहाड़ों पर जाने का प्लान बनाते हैं तो वो बड़े-बड़े बैग पैक कर लेते हैं, जो उनकी सबसे बड़ी गलती होती है. चलिए जानते हैं कि पहाड़ी इलाको में कैसे बैग लेकर जाना सही होता है.

पहाड़ी लोगों का कहना है कि जब वो अपने गांव अल्मोड़ा जाते हैं तो वो कभी भी ट्रॉली बैग ले जाने की गलती नहीं करते हैं, क्योंकि उनके गांव के पथरीले और संकरे रास्तों में इनको लेकर उतरने में काफी परेशानी होती है. इसलिए उनके घरों में ट्रॉली वाले बैग बहुत कम ही देखने को मिलते हैं, क्योंकि वो लोग कपड़े के मजबूत बैग या बैकपैक में ही अपना समान गांव लेकर जाते हैं.

इनकी सबसे खास यह होती है कि इनको आप आसानी से कैरी कर पाते हैं, जिसके बाद पहाड़ी रास्तों पर चढ़ाई करते समय आप चलने में दिक्कत नहीं होती है. जिन इलाकों में चढ़ाई होती है, वहां ऐसे ही बैग ले जाना सही होता है. लोकल पहाड़ी लोग आज भी कपड़ों के मजबूत बैग को ही गांव के जाने के लिए सबसे बेस्ट मानते हैं.

वो बताते हैं कि उनके गांव में उनको नीचे की तरफ 2 से 3 घंटे तक चलकर जाना होता है और ऐसे में जहां रास्ता पतला होता है तो कई बार उनके बैग हाथ से गिर भी जाते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती है, क्योंकि बैग एक खेत से दूसरे खेत में गिरने पर फटता या टूटता नहीं है.

ट्रॉली बैग क्यों बन जाते हैं परेशानी का कारण

अक्सर लोग सुविधा के नाम पर ट्रॉली बैग लेकर निकल पड़ते हैं, लेकिन पहाड़ों में यह फैसला भारी पड़ सकता है. पत्थरों वाले रास्ते, सीढ़ियां और कीचड़ भरे ट्रैक पर ट्रॉली बैग खींचना बेहद मुश्किल हो जाता है. कई बार आपको इसे उठाकर चलना पड़ता है, जिससे यात्रा थकाऊ बन जाती है और इनको लेकर चलना भी बहुत मुश्किल होता है.

जबकि पहाड़ी रास्तों के लिए बैकपैक या रक्सैक सबसे सही ऑप्शन माने जाते हैं. इन्हें आप आसानी से पीठ पर टांग सकते हैं, जिससे आपके दोनों हाथ खाली रहते हैं. इससे ट्रेकिंग या चढ़ाई करते समय बैलेंस बनाए रखना आसान होता है और आप ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान

  1. अगर आप 2-3 दिन की ट्रिप पर जा रहे हैं, तो 40 से 60 लीटर क्षमता वाला बैग सही रहता है. इसमें कपड़े, जूते, दवाइयां और जरूरी सामान आसानी से फिट हो जाता है.
  2. इसके साथ ही बैग में मल्टीपल कम्पार्टमेंट, वॉटरप्रूफ मटेरियल और रेन कवर जैसी सुविधाएं जरूर होनी चाहिए, क्योंकि पहाड़ों में मौसम अचानक बदल सकता है.
  3. सिर्फ बैग लेना ही काफी नहीं है, उसका कंफर्टेबल होना भी उतना ही जरूरी है. बैकपैक में पैडेड शोल्डर स्ट्रैप्स, मजबूत बैक सपोर्ट और कमर के साथ छाती के बेल्ट होने चाहिए. ये सभी फीचर्स वजन को बराबर बांटते हैं और लंबे समय तक बैग उठाने में थकान को कम करते हैं.
  4. पहाड़ों वाली ट्रिप में सही बैग आपकी सुविधा और सुरक्षा दोनों के लिए बेहद जरूरी है. इसलिए अगली बार जब भी आप हिल स्टेशन या ट्रेकिंग पर जाएं, ट्रॉली बैग की जगह एक मजबूत बैकपैक में ही अपना समान लेकर जाएं.

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