अखिलेश यादव और चंद्रशेखर के बीच ख‍िचड़ी तो पक रही है, लेक‍िन बीरबल वाली – chandra shekhar azad akhilesh yadav alliance possibility up election dalit politics ntcpmr


उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 में दलित वोटर की भूमिका नए सिरे से बढ़ने जा रही है. बीएसपी का जनाधार घटने के बाद बाकी सभी दलों में दलित वोट हासिल करने की अभी से होड़ मच गई है. बीएसपी के संस्थापक कांशीराम की विरासत को आगे बढ़ाते बढ़ाते मायावती यूपी की राजनीति में इतना पिछड़ चुकी हैं कि हर कोई दलित वोटर को रिझाने में जुट गया है.

अखिलेश यादव ने तो 2024 के आम चुनाव में PDA के जरिए समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें दिला दी. राहुल गांधी के साथ गठबंधन करके कांग्रेस का भी भला कर दिया. 2019 के आम चुनाव में मायावती के साथ गठबंधन में जो घाटा हुआ था, और बीएसपी के गठबंधन तोड़ देने से जो दर्द हुआ था, पांच साल बाद हिसाब बराबर हो गया.

अब तैयारी अगले साल होने जा रहे यूपी विधानसभा चुनाव की है. जब अखिलेश यादव के गठबंधन साथी राहुल गांधी भी कांशीराम को भारत रत्न दिए जाने की मांग कर रहे हैं – और यह बात सुनते ही मायावती बिफर पड़ती हैं.

कांशीराम की विरासत के एक और दावेदार खड़े हो गए हैं, भीम आर्मी वाले नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद. चंद्रशेखर आजाद का दावा है कि अगर अखिलेश यादव उनके साथ हाथ मिला लें, तो बीजेपी को यूपी की सत्ता से बेदखल किया जा सकता है – लेकिन उनकी तरफ से ऐसी शर्तें लागू हैं, जो नौ-मन तेल होने की कंडीशन जैसी हैं.

अखिलेश यादव से चंद्रशेखर आजाद क्या चाहते हैं?

2024 के आम चुनाव के नतीजों से पीछे चलकर देखें तो यूपी की राजनीति में सपा-बसपा गठबंधन अपना अलग महत्व दर्ज कराता है. सपा-बसपा गठबंधन का अखिलेश यादव को तो उतना फायदा नहीं मिला था, लेकिन मायावती को जरूर मिला था. 2019 में मायावती की बीएसपी को यूपी में 10 लोकसभा सीटें मिली थीं, और समाजवादी पार्टी को 5 सीटें. समाजवादी पार्टी को तो 2014 में भी 5 सीटें मिली थीं, लेकिन मायावती जीरो बैलेंस पर पहुंच गई थीं, और 2024 में भी बिल्कुल वैसा ही हुआ है.

चंद्रशेखर आजाद ने अपनी पार्टी में भी कांशीराम का नाम जोड़ रखा है. आजाद समाज पार्टी (कांशीराम). मुश्किल यह है कि सब कुछ के बावजूद अगर चंद्रशेखर आजाद को अब तक कहीं से ज्यादा मदद मिली है तो वह बीजेपी है. 2024 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ अपने एक विधायक को टिकट दिया था. और, चंद्रशेखर आजाद बीजेपी उम्मीदवार को करीब डेढ़ लाख वोटों से हराने में सफल रहे.

चंद्रशेखर आजाद को कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा से भी उम्मीद रही होगी, लेकिन कुछ मिला तो नहीं ही. अखिलेश यादव से भी चंद्रशेखर आजाद ने 2022 और 2024 में भी गठबंधन की कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बन पाई. सबसे पहले चंद्रशेखर आजाद ने मायावती को ही बुआ बोलकर आशीर्वाद पाने की कोशिश की थी, लेकिन मायावती ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि वह किसी की बुआ नहीं हैं.

अब सुनने में आ रहा है कि चंद्रशेखर आजाद ने एक बार फिर अखिलेश यादव से हाथ मिलाने के लिए शिगूफा छोड़ा है. चंद्रशेखर आजाद चाहते हैं कि अखिलेश यादव अपनी समाजवादी पार्टी का उनकी आजाद समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करें, और सीटों के बंटवारे में आधा हिस्सा शेयर करें.

आजतक के कार्यक्रम रिपोर्टर्स ऑफ एयर में यूपी की राजनीति पर चर्चा हो रही थी, और जब जिक्र चंद्रशेखर आजाद का आया तो पीयूष मिश्रा ने एक किस्सा सुनाया. संसद में चंद्रशेखर आजाद से हुई मुलाकात में क्या बात हुई थी, यह तो बताया ही, उसके बाद का वाकया भी बताया.

आजतक संवाददाता पीयूष मिश्रा के मुताबिक, चंद्रशेखर आजाद का मानना है कि बीजेपी को यूपी की सत्ता से वह अखिलेश यादव के साथ मिलकर आसानी से हटा सकते हैं. लेकिन, चंद्रशेखर आजाद की एक शर्त है. चंद्रशेखर आजाद गठबंधन की सूरत में यूपी विधानसभा की 200 सीटें अपने हिस्से में चाहते हैं. यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं.

पीयूष मिश्रा ने चंद्रशेखर आजाद की बात पर एक समाजवादी पार्टी के नेता की प्रतिक्रिया भी बताई. समाजवादी पार्टी के नेता ने सुनने के बाद कटाक्ष किया था कि चंद्रशेखर आजाद से जब फिर भेंट हो तो बताया जाए कि बहुत ज्यादा नहीं, बल्कि सिर्फ एक सीट अखिलेश यादव के लिए छोड़ दें.

चंद्रशेखर आजाद भी वैसी ही भाषा बोल रहे हैं, जैसी अखिलेश यादव 2024 के आम चुनाव में बोल रहे थे. अखिलेश यादव ने तब कहा था कि गठबंधन में किसी को कितनी सीटें मिलेंगी, यह समाजवादी पार्टी तय करेगी. अखिलेश यादव तब राहुल गांधी को लेकर ऐसी बात कर रहे थे. चंद्रशेखर आजाद भी 200 सीटों पर अपनी दावेदारी को वैसे ही समझाने की कोशिश करते हैं. चंद्रशेखर आजाद का कहना है कि सीटों के बंटवारे पर उनकी बात को ऐसे समझा जाना चाहिए कि आजाद समाज पार्टी अखिलेश यादव को विधानसभा की 3 सीटें ज्यादा दे रही है.

2022 में गठबंधन क्यों नहीं हो पाया था

पिछले विधानसभा चुनाव से पहले ही चंद्रशेखर आजाद की अखिलेश यादव से बातचीत टूट गई थी. बाद में चंद्रशेखर आजाद गोरखपुर जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़े, हार भी गए. अखिलेश यादव के साथ बातचीत टूटने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में चंद्रशेखर आजाद बेहद गुस्से में नजर आ रहे थे.

प्रेस कांफ्रेंस में चंद्रशेखर आजाद बार बार एक बात दोहरा रहे थे, ‘जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी.’

तब भी ज्यादा सीटों की मांग के चलते ही अखिलेश यादव से चंद्रशेखर आजाद की बातचीत खत्म हो गई थी. तब खबर ऐसी ही आई थी कि चंद्रशेखर आजाद को अखिलेश यादव कुछ सीटें देने को तैयार थे, लेकिन डिमांड पूरी करना मुश्किल हो रहा था. चंद्रशेखर आजाद चाहते थे कि अखिलेश यादव उनके साथ भी सीटों का वैसे ही बंटवारा करें, जैसे 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती के साथ हुआ था.

मीडिया के सामने आकर चंद्रशेखर आजाद ने अखिलेश यादव पर अपना अपमान करने का आरोप लगाया था. बीएसपी नेता मायावती की ही तरह चंद्रशेखर आजाद ने अपने अपमान को दलितों का अपमान भी करार दिया – और फिर ऐलान किया कि समाजवादी पार्टी के साथ उनका कोई चुनावी गठबंधन नहीं होने जा रहा.

चंद्रशेखर आजाद ने बताया कि छह महीने से चुनावों की तैयारी कर रहे थे, और करीब महीने भर से अखिलेश यादव के साथ गठबंधन को लेकर बातचीत कर रहे थे. चंद्रशेखर आजाद ने अखिलेश यादव पर अपना कीमती वक्त बर्बाद करने का आरोप भी लगाया.

ये सब तो पहले की बातें हैं. तब तो चंद्रशेखर आजाद सिर्फ संघर्ष कर रहे थे. अब तो लोकसभा सांसद भी बन चुके हैं. पहले के मुकाबले कद तो बढ़ ही गया है, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली पहले जैसी ही है.

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