यूरोप से आते थे फल-सब्जियां…! ईरान के उस ‘इंस्टीट्यूट’ की कहानी, जहां के इंजीनियरों की रईसी की मुरीद थी दुनिया – abadan institute technology iran israel war impact history of engineers edmm


ईरान-इजरायल युद्ध के बीच आज ‘होर्मुज’ और ‘खार्ग’ जैसे नाम गूंज रहे हैं, लेकिन करियर के नजरिए से इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक नाम सबसे ऊपर चमकता है, अबादान.  1939 में बना ‘अबादान इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (AIT) सिर्फ एक कॉलेज नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे रईस प्रोफेशनल्स की ‘नर्सरी’ था.

रईसी का वो ‘गोल्डन एरा’ (1940s-1970s)
ब्रिटिश पेट्रोलियम (तब AIOC) के दौर में अबादान को ‘मिडिल ईस्ट का पेरिस’ कहा जाता था. यहां के इंजीनियरों की लाइफस्टाइल आज के सिलिकॉन वैली के दिग्गजों को भी मात देती थी.

सैलरी और ठाठ: बताते हैं कि यहां के सीनियर इंजीनियरों की सैलरी उस दौर में ब्रिटेन के टॉप अफसरों के बराबर थी. उनकी रईसी का आलम यह था कि उनके लिए ताजे फल, सब्जियां और मीट सीधे यूरोप और काहिरा से हवाई जहाजों के जरिए मंगवाए जाते थे.

लग्जरी कैंपस: इंस्टीट्यूट के पास बने ‘बरावडा’ इलाके में इंजीनियरों के लिए खास स्विमिंग पूल्स, गोल्फ कोर्स और क्लब थे. यहां हॉलीवुड की फिल्में उसी दिन रिलीज होती थीं, जिस दिन वे न्यूयॉर्क के सिनेमाघरों में लगती थीं.

‘ड्रीम जॉब’ का वो जादुई सफर
उस समय ईरान के एक युवा के लिए AIT में दाखिला लेना मतलब सात पीढ़ियों की गरीबी मिटाना था.

करियर शिफ्ट: जो युवा कल तक रेगिस्तान में खानाबदोश थे, वे इस इंस्टीट्यूट से निकलकर ‘पेट्रोलियम एक्सपर्ट’ बन रहे थे. उनकी पहचान सूट-बूट, सिगार और रॉल्स रॉयस कारों से होती थी.

ग्लोबल डिमांड: यहां के इंजीनियर्स की डिमांड इतनी थी कि उन्हें दुनिया की किसी भी बड़ी ऑयल कंपनी में हाथों-हाथ लिया जाता था.

स्रोत: विकी

वर्तमान: जंग के साये में ‘फीका’ पड़ता चार्म
1979 की इस्लामी क्रांति और फिर 1980 के दशक के ‘ईरान-इराक युद्ध’ ने इस सुनहरे दौर पर ब्रेक लगा दिया. अबादान, जो कभी सपनों का शहर था, युद्ध का पहला निशाना बना.

इंस्टीट्यूट का क्या हुआ? आज यह ‘पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी’ (PUT) के नाम से जाना जाता है. हालांकि आज भी यह ईरान का टॉप संस्थान है, लेकिन वो ‘ग्लोबल रईसी’ और ‘यूरोपीय ठाठ’ अब इतिहास की बातें हैं.

ईरान-इजरायल के मौजूदा तनाव ने इस क्षेत्र के ‘करियर ग्राफ’ को अनिश्चित बना दिया है. यहां जंग का बड़ा असर पड़ा है. मिसाइलों के साये में अब वो ‘ड्रीम जॉब’ वाला चार्म नहीं रहा, बल्कि अब चर्चा ‘सर्वाइवल’ और ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ की होती है.

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