होर्मुज में सैन्य कार्रवाई की मांग को लेकर UN पहुंचे अरब देश, प्रस्ताव पर रूस-चीन और फ्रांस ने लगाया वीटो – Russia China France prevent Arab push UN Security Council Strait of Hormuz ntc ksrj


मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच रूस, चीन और फ्रांस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अरब देशों के एक अहम प्रस्ताव को रोक दिया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रस्ताव में होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई की अनुमति देने की मांग की गई थी. इन देशों के वीटो की वजह से बहरीन और अन्य खाड़ी देशों द्वारा समर्थित इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

अधिकारियों के अनुसार, सुरक्षा परिषद के कई स्थायी सदस्यों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, जिसे बहरीन ने अपने खाड़ी पड़ोसी देशों के साथ मिलकर तैयार किया था.  बहरीन द्वारा तैयार किए गए इस प्रस्ताव में सदस्य देशों और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक बलों को “सभी आवश्यक साधनों” का उपयोग करने की अनुमति मांगी गई थी ताकि समुद्र में अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को बाधित होने से बचाया जा सके. हालांकि, सुरक्षा परिषद के तीन स्थायी सदस्यों (रूस, चीन और फ्रांस) ने स्पष्ट कर दिया है कि वे सैन्य बल के उपयोग की अनुमति देने वाली किसी भी शब्दावली के पक्ष में नहीं हैं.

इस प्रस्ताव पर शुक्रवार को वोटिंग होने की संभावना है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कूटनीतिक प्रयासों से इन तीन वीटो पावर वाले देशों को मनाया जा सकेगा या नहीं. रूसचीन और फ्रांस सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल हैं, जिनके पास वीटो पावर है. राजनयिकों के अनुसार, इस प्रस्ताव को लेकर 10 अस्थायी सदस्यों के बीच भी मतभेद थे.

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प्रस्ताव में कही थी ये बात
कई हफ्तों की बंद कमरे में हुई बातचीत के बाद भी प्रस्ताव में चार संशोधन ही हो पाए हैं. प्रस्ताव के जिस हिस्से पर गतिरोध बना हुआ है, उसमें कहा गया है कि सुरक्षा परिषद सदस्य देशों को, राष्ट्रीय स्तर पर या स्वैच्छिक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक साझेदारियों के माध्यम से सभी आवश्यक साधनों का उपयोग करने के लिए अधिकृत करती है. इसकी अग्रिम सूचना सुरक्षा परिषद को देनी होगी. इसका मकसद आवाजाही वाले समुद्री मार्ग को सुरक्षित करना और होर्मुज के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय नौवहन को बंद करने, बाधित करने या रूकावट करने के प्रयासों को रोका जाना है.

दरअसल, 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इज़राइल के साथ युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद ईरान ने इस रणनीतिक मार्ग को बंद कर दिया था. यहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और गैस को ले जाया जाता है. इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है और तेल, शिपिंग तथा बीमा की लागत बढ़ गई है.

इस नाकेबंदी से वैश्विक ऊर्जा बाजार चरमरा गया है. कतर जैसे देशों को अपना उत्पादन पूरी तरह बंद करना पड़ा है, जिससे उन्हें 20 अरब डॉलर के सालाना राजस्व का नुकसान हो रहा है. ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों और बुनियादी ढांचों पर हजारों जवाबी हमले किए हैं, जिसमें कम से कम 18 नागरिकों की जान गई है.

ईरान पर भड़का बहरीन

बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल ज़यानी ने गुरुवार को सुरक्षा परिषद की बैठक में कहा कि अपने अरब पड़ोसियों के प्रति ‘ईरान की आक्रामक मंशा’ ‘धोखेबाजी’ और ‘पूर्व नियोजित’ थी और यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि ईरान ने हवाई अड्डों, जल संयंत्रों, समुद्री बंदरगाहों और होटलों जैसी नागरिक संरचनाओं को निशाना बनाया.

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ईरान ने गुरुवार को संकेत दिया कि जंग के बावजूद उसकी मंशा होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही पर निगरानी रखने की है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सैन्य विकल्प को “अवास्तविक” करार दिया है. उनका तर्क है कि इससे तट पर तैनात ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और उनकी बैलिस्टिक मिसाइलों का खतरा और बढ़ जाएगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध ने ईरान और उसके पड़ोसी देशों (जैसे सऊदी अरब और कतर) के बीच सालों से सुधर रहे रिश्तों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है अब मध्यस्थता की कमान ओमान और कतर के बजाय पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के हाथों में है. सऊदी अरब स्थित थिंक टैंक गल्फ रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष अब्दुलअजीज सागर ने कहा कि किसी भी युद्धविराम समझौते में ईरान की खाड़ी देशों पर हमला करने और होर्मुज  के समुद्री यातायात को नियंत्रित करने की क्षमता को भी शामिल किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्होंने हमारे साथ जो किया, हम उसे नहीं भूलेंगे.

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