इजरायल की राजधानी तेल-अवीव में शनिवार का दिन, समंदर किनारे बीच पर छुट्टी के मूड में आए लोगों की भीड़. कोई स्विम सूट में रेत पर धूप सेंकता नजर आ रहा है तो कुछ युवा वॉलीबॉल या फुटबॉल खेलते दिखाई दे रहे हैं. अपने बच्चों के साथ खेलते लोग तो कुछ बस यूं ही समंदर की लहरों को निहार रहे हैं. यानी सबकुछ सामान्य दिखाई देने वाली.

ये सब देख मैं अभी सोच ही रहा था कि अगर किसी को बताया न जाए तो इस मंजर को देख वो मानेगा ही नहीं कि ये उस दौर की तस्वीर है जब दिन रात मिसाइल हमलों और धमाकों की आवाज गूंजती रहती है. लेकिन तभी युद्ध ने अपनी दस्तक दे दी.

पहले मोबाइल फोन पर अलर्ट बजा और फिर कुछ ही देर में सायरन की आवाज गूंजने लगी. देखते ही देखते मंजर बदल गया. लोग समंदर से निकलकर, बीच से उठकर, बच्चों और सामान को लेकर बंकर की तरफ दौड़े. चंद पल में चहल-पहल वाले इलाके में सन्नाटा पसर गया.

आसपास हो रहे घटनाक्रम को दर्ज करने, रिपोर्ट करने और खुद को सुरक्षित रखने की चुनौती हर वार जोन में पत्रकारों के सामने पेश आती है. मैं भी इस अफरा-तफरी के बीच सुरक्षित जगह अभी तलाश ही रहा था कि कानों में असर (शाम) की नमाज के लिए अजान की आवाज पड़ी. देखा तो तेल अवीव की ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच पीले पत्थर से बनी एक मस्जिद से ये आवाज आ रही थी.

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इजराइल की सारी लड़ाइयां मुस्लिम मुल्कों के साथ हुई हैं. इसकी ईरान की इस्लामिक सत्ता के साथ जंग चल रही है और इस पर गाजा से लेकर लेबनान और सीरिया में मुस्लिम आबादी के खिलाफ सैनिक अभियान चलाने और मानवाधिकार उल्लंघनों के गंभीर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे देश में इस्लामिक आबादी की इबादत के लिए इंतजाम को देखना रोचक होगा. इसलिए मैं बढ़ चला उस मस्जिद की ओर जिसे ‘अल-बहर मस्जिद’ कहते हैं.

समंदर किनारे बनी है मस्जिद

अरबी में अल-बहर का मतलब होता है ‘समंदर किनारे’ और ये सही भी है क्योंकि ये मस्जिद समंदर से बस चंद कदम के फासले पर है. ये लगभग वो जगह है जहां से नए तेल-अवीव की हदें खत्म होती हैं और ऐतिहासिक जाफा शहर की सीमा शुरू होती है. जाफा वो शहर है जिसका जिक्र बाइबल में भी मिलता है और जहां स्कॉटिश चर्च और सिनेगॉग से लेकर मस्जिद सबकुछ मिल जाता है. ज्यादातर आबादी मुस्लिम है, लेकिन यहां यहूदी और ईसाई भी रहते हैं.

इस बीच मैं उस पुरानी अल-बहर मस्जिद के करीब पहुंच चुका था जिसे करीब 350 साल पहले बनाया गया था और आज भी काफी सहेजकर और सुंदर बनाकर रखा गया है. मस्जिद के मुख्य दरवाजे से भीतर जाने पर नमाज के लिए इजरायली मुस्लिम मुझसे मेरी पहचान पूछते हैं. भारतीय और धार्मिक पहचान बताने पर बड़े अच्छे से भीतर बुलाते हैं.

मैंने नजदीक खड़े एक उम्रदराज शख्स से मस्जिद के बारे में पूछा तो उसने आंखें चमकाते हुए कहा, ‘ये मस्जिद 1675 में ऑटोमन साम्राज्य के दौर में बनी थी. खासतौर पर उन मछुआरों और नाविकों के लिए जो जाफा के बंदरगाह पर काम करते थे. ये इस जगह के इतिहास की पहचान है.’

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मेहराब पर पत्थर पर उकेरी गई जानकारी

मस्जिद के मेहराब और दरवाजे के पास पत्थर में जानकारी उकेरी गई है जो बताती है कि इसका निर्माण धनी अजा परिवार ने करवाया था. मस्जिद में एक ऊंची मीनार की मौजूदगी इसके ऑटोमन वास्तुशिल्प की भी गवाही देती है. एंट्री गेट पर ही महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग वजू करने की जगह बनाई गई है.

वहीं, साफ-सफाई के साथ ही रंग-बिरंगे गुलाब के पौधों से लेकर इबादत के विशाल हॉल में लगा सुंदर कालीन, ये बता रहा था कि इस पुरानी मस्जिद की साज-संभाल बखूबी हो रही है. नमाज पढ़कर लौट रहे 34 बरस के अदेल करीमी ने बताया कि मस्जिद का नवीनीकरण और पुनर्निर्माण 1995-1997 के बीच किया गया और तब से इसकी पूरी साज-संभाल की जाती है.

यहां रहते हैं इजरायल के करीब 18 प्रतिशत मुस्लिम

जाफा की ये अल-बहर मस्जिद, इस इलाके में मजबूत मुस्लिम आबादी की मौजूदगी की भी गवाही देती है. आज इजरायल की एक करोड़ की आबादी में करीब 18 प्रतिशत मुस्लिम हैं. इजरायल के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स के मुताबिक 2024 के आखिर तक देश में मुस्लिम आबादी 18 लाख 9 हजार के करीब थी. ज्यादातर मुस्लिम आबादी अरब मूल की ही है जो पीढ़ियों से इस इलाके में रह रही है.

हजारों साल के बसाहट के इतिहास वाले जाफा की जमीन पर समय की धारा के छोड़े वो निशान नजर आ जाते हैं जो धार्मिक और राजनीतिक बदलावों की कहानी बताते हैं.

अल-बहर मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर मैं सोचता रहा कि ईरान और इजरायल की इस लड़ाई को दुनिया में कई लोग धर्म के चश्मे से देख रहे हैं. इसे धार्मिक और राजनीतिक सत्ता की रस्साकशी मान रहे हैं. लेकिन ये भी तो सच है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सरकार का समर्थन करने वालों में इजरायल की यूनाइटेड अरब पार्टी के मंसूर अब्बास जैसे नेता भी हैं तो आईडीएफ में फौजी वर्दी पहनकर ऑपरेशंस पर दुनिया को बताने वाली लेफ्टिनेंट कर्नल एल्ला वावेया जैसी मुस्लिम महिला अधिकारी भी हैं.

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मिसाइल कफिर कासिम में गिरे या जाफा में, टूटने वाले घर मुसलमानों के भी हैं और यहूदियों के भी. सायरन की आवाज पर दौड़ लगाने वालों में और शेल्टर में हर मजहब का शख्स शामिल है और शेल्टर में रात गुजारने वालों में भी हर धर्म को मानने वाले बच्चे-बूढ़े और जवान नजर आ जाते हैं.

अल-बहर मस्जिद के आंगन से भू-मध्यसागर की विशाल जलराशि को देखते देखते अचानक मेरे मन में साहिर लुधियानवी का लिखा वो गाना गूंजने लगा- ‘आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम.. आजकल वो इस तरफ देखता है कम. आजकल किसी को वो टोकता नहीं, चाहे कुछ भी कीजिए रोकता नहीं. हो रही है लूट मार फट रहे हैं बम, आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम. आजकल वो इस तरफ देखता है कम.’

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