Ground Report: बदरंग होती पान की खेती! सपोर्ट की कमी और क्लाइमेट चेंज ने बढ़ाई दुश्वारियां – pratapgarh Betel Leaf farmers crisis market income mandi export climate change paan mdsb ntc


‘जा’ को जोड़ बने जापान, बड़े बड़ों के मुह की शान… मुल्कों, सरहदों और विविधताओं से परे सदियों से ‘पान’ रॉयल कल्चर और स्टेटस सिंबल का मानक रहा है, राजघरानों में शान और रिवाज से जुड़ा रहा है. कहीं अदब, तहज़ीब और मेहमाननवाज़ी का प्रतीक, कहीं शादी-ब्याह और त्योहारों में ख़ास अहमियत, तो कहीं हज़ारों-हज़ार साल पुरानी सामाजिक पहचान का हिस्सा. हिंदुस्तान के अलग-अलग सूबों में पान की अपनी ख़ास अहमियत है.

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(Photo: Sakib Mazeed)

उत्तर प्रदेश के बनारस का पान पूरी दुनिया में मशहूर है. लखनऊ में पान नवाबी तहज़ीब का हिस्सा है. यूपी का पूर्वांचल और बुंदेलखंड बेल्ट पानी की खेती के लिए जाना जाता है, इसमें एक ज़िला प्रतापगढ़ भी है, जहां पर ठीक-ठाक मात्रा में पान की खेती होती है. लेकिन आज ज़िले के पान किसानों के सामने कई तरह की दुश्वारियां आन पड़ी हैं.

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(Photo: Sakib Mazeed)

प्रतापगढ़ ज़िले के पट्टी इलाक़े में पान की खेती लंबे वक़्त से लोगों की आजीविका का बड़ा ज़रिया रही है. इस इलाक़े में क़रीब तीस हज़ार पान किसान रहते हैं. ज़िले में सबसे ज़्यादा पान की खेती इसी इलाक़े में होती है, लेकिन अब यह काम कई तरह की चुनौतियों से भरा हुआ है.

साकिब मजीद द्वारा पान किसानों की ग्राउंड रिपोर्ट
(Photo: Sakib Mazeed)

किसानों से बात करने पर मालूम पड़ता है कि जो पान की खेती उन्हें कुछ साल पहले मुनाफ़ा देती था, आज उसी काम में उन्हें निराशा हाथ लग रही है. हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि ज़िले में पान की खेती से जुड़े किसानों की तादाद लगातार घट रही है.

पान किसानों के सामने कैसी चुनौतियां?

प्रतापगढ़ में पान किसानों की चुनौतियों जायज़ा लेने हम ज़िले की पट्टी तहसील के राम बेला गांव और दुबौली परसन पहुंचे, जहां पर बड़ी तादाद में देसी पान की खेती की जाती है. पान की खेती से जुड़े लोगों ने दावा किया कि तमाम तरह की परेशानियों की वजह से अपना परंपरागत कारोबार छोड़कर बेल्हा के पान किसान देश के अन्य इलाक़ों में रोज़ी-रोटी की तलाश के लिए पलायन करने को मजबूर हैं. प्रतापगढ़ में सबसे ज़्यादा पान की खेती चौरसिया समाज के लोग करते हैं. ज़िले में संबंधित जाति की कुल तादाद क़रीब सवा लाख है. इसमें पान की खेती करने वाले किसानों की संख्या 55 हज़ार के आस-पास है.

paan pratapgarh ground report
(Photo: Sakib Mazeed)

नारंगपुर ग्राम सभा के दुबौली परसन गांव में 15 बिस्वा खेत में पांच किसानों ने मिलकर पान की खेती करने के लिए भीटा (छायादार ढांचे) बनाया है. इसे बरेजा भी कहा जाता है. बांस, पैरा और सरई के सहारे बरेजा का निर्माण होता है, जो क़रीब दो साल तक चलता है. हर साल पान की नई फ़सल की बुआई होती है.

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खेती वाली ज़मीन भी पांचों किसानों ने लीज़ पर ली है, जिसका किराया देना पड़ता है. पान की बुआई, खेती, तोड़ाई और फिर ढोली (जिसमें भरकर पान मंडी जाता है) बनाने में पूरा परिवार लगता है, तब मंडी में जाने लायक पान तैयार होता है. एक ढोली में 200 पान रखे जाते हैं.

पान के पत्ते की खेती की ग्राउंड रिपोर्ट
पान की खेती के लिए छायादार ढांचे बनाए जाते हैं, जिसको भीटा या बरेजा कहा जाता है. (Photo: Sakib Mazeed)

पान किसान सुरेश कुमार चौरसिया aajtak.in के साथ बातचीत में कहते हैं, “पान की खेती हम लोगों का मुख्य व्यवसाय है, लेकिन दिन प्रतिदिन इस कारोबार की स्थिति ख़राब होती जा रही है. पान की खेती में बहुत ज़्यादा पूंजी लगने लगी है. खेती के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली सारी चीज़ें हम ख़रीदकर लाते हैं. एक बांस भी ढाई से तीन सौ रुपए में मिलता है.”

पान किसान ग्राउंड रिपोर्ट
(Photo: Sakib Mazeed)

पान को कृषि का दर्जा देने की मांग

पान की खेती उद्यान विभाग अंतर्गत आती है लेकिन किसानों मांग है कि इसको कृषि का दर्जा दिया जाए. वे कहते हैं कि जिस तरह के सपोर्ट की जरूरत हमें होती है, वह उद्यान विभाग से नहीं मिल पाती. पट्टी में सबसे ज़्यादा पान की खेती करने वाले चौरसिया समाज के ज़िला अध्यक्ष शिव चौरसिया कहते हैं, “पान को कृषि का दर्जा न मिल पाना बड़ी मुश्किलें खड़ी करता है. कोई भी बैंक पान किसानों को बागवानी लगाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की तरह लोन नहीं देता है. दूसरी समस्या है कि अगर पान किसान बागवानी लगता है, तो इसका इंश्योरेंस कोई भी कंपनी बीमा नहीं करती है. ऐसी स्थिति में जब पान की फसल बर्बाद हो जाती है, तो किसानों के पास उसकी भरपाई का कोई ज़रिया नहीं होता है. सरकार की तरफ़ से भी किसी तरह का मुआवजा नहीं मिलता.”

वे आगे कहते हैं कि पान किसानों को तकनीकी जानकारी का अभाव रहता है. कृषि विभाग द्वारा बहुत सारी जानकारियां अन्या किसानों को दी जाती हैं, लेकिन पान किसानों को उद्यान विभाग की तरफ से एडवांस फार्मिंग के करने के लिए कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती है.

पान की खेती का मैदान

प्रतापगढ़ के जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा कहते हैं, “सरकार की तरफ़ से 2025-26 में अनुदान के लिए जो लक्ष्य आया, वो पहले के मुक़ाबले में कम आया. दो किसानों को बरेजा बनाने और 50 पान किसानों को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य आया था. हर साल अलग-अलग किसान प्रशिक्षण के लिए जाते हैं. ऐसे में जो किसान पहले रजिस्ट्रेशन करवा देते हैं, उन्हें ही लाभ मिल पाता है क्योंकि लक्ष्य बहुत कम आता है. एक बार जिस किसान को लाभ मिल जाता है, वह अगले पांच साल तक रजिस्ट्रेशन करने के लिए एलिजिबल नहीं रहता है.

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पान की खेती को कृषि विभाग में शामिल करने की मांग पर जिला उद्यान अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का नोडल अधिकारी कृषि विभाग का ही होता है. कृषि विभाग उद्यान विभाव को बजट और टार्गेट देता है. अगर उद्यान विभाग को बड़ा टार्गेट मिले, तो हम लोग क्यों किसानों फायदा नहीं देंगे.

‘सरकार से नहीं मिलता मुआवजा…’

किसानों का कहना है कि फ़सल ख़राब होने पर हमें सरकार की तरफ से किसी तरह का कोई मुआवजा नहीं मिलता है. राज्य सरकार से किसानों की मांग है कि इस फ़सल को बीमा योजना में भी शामिल करने के क़दम उठाए जाएं. सुरेश कुमार चौरसिया कहते हैं कि हम चाहते हैं कि जिस तरह से गेहूं और धान की फसलों के नष्ट हो जाने से मुआवजा दिया जाता है, हम सरकार से मांग करते हैं कि हमें भी उसी तरह उचित कंपनसेशन मिले.

कृष्णकांत चौरसिया कहते हैं कि अगर पान कृषि विभाग में शामिल कर दिया जाता है, तो हमें मुआवजा वग़ैरह मिलने में आसानी हो जाएगी. अभी तक हमें कभी भी फ़सल बर्बाद होने के बाद मुआवजा नहीं दिया गया.

वहीं, पान की खेती करने वाले सुरेश कुमार चौरसिया कहते हैं कि पिछले चार-पांच साल से सरकार पान किसानों को खेती करने के लिए अनुदान दे रही है लेकिन सब्सिडी सबको नहीं मिल पाती है. जिन लोगों का सोर्स होता है, जो दबंग क़िस्म के लोग हैं, वे कमीशन देकर अनुदान ले लेते हैं. दबा-कुचला किसान अनुदान हासिल करने में फेल हो जाता है.

वे आगे बताते हैं कि उद्यान विभाग ने पिछले साल प्रतापगढ़ के हादीहाल में पान के किसानों की मीटिंग करवाई थी, जिसमें डीएम भी मौजूद थे. वहां पर हम लोगों ने अपनी मांगें रखी. हमें आश्वासन तो दिया गया था लेकिन अभी तक कोई एक्शन नहीं हुआ है.

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शिव चौरसिया कहते हैं कि पिछले 15 साल से उद्यान विभाग कुछ किसानों को पान की बागवानी लगाने के लिए अनुदान के रूप में फंड मिल रहा था. लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 के लिए शासन द्वारा एक भी रुपए का आवंटन पान किसानों के लिए नहीं किया गया.

जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा कहते हैं, “महोबा स्थित राष्ट्रीय पान शोध में ज़िले के पान किसानों को ट्रेनिंग दी जाती है. वहां पर वैज्ञानिकों द्वारा खेती के बारे में जानकारी दी जाती है. अब यह तो किसान की ज़िम्मेदारी बनती है कि वैज्ञानिक जो बातें बता रहे हैं, आप उनके मुताबिक ही चलिए. अगर पिछले पचास साल की परंपरागत पद्धति का उपयोग किया जाएगा, तो नुक़सान होगा ही. ये लोग प्रशिक्षण में जाते हैं, तो सिर्फ आनंद लेकर वापस आ जाते हैं. सरकार अगर प्रशिक्षण में पैसा ख़र्च करती है, तो किसानों सीखना चाहिए, तभी लाभ उठाया जा सकता है.”

सुनील कुमार शर्मा बताते हैं कि ज़िले में जो भी फ़सलें अधिसूचित हैं, उनके इंश्योरेंस की व्यवस्था है. उसके लिए प्रावधान है, इंश्योरेंस की धनराशि जमा करनी होती है. इंश्योरेंस करवाने के बाद अगर किसानों को नुक़सान होता है, तो मुआवजा मिलेगा. ऐसे में जो लोग एक्टिव हैं, उन्हें लाभ मिलता है.

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क्लाइमेट चेंज बड़ी परेशानी

पान की खेती करने वाले किसानों ने बताया कि अचानक मौसम में बदलाव, सामान्य से ज़्यादा बारिश, ठंड और गर्मी पान की फसल को पूरी तरफ बर्बाद कर देती है. गर्मियों में तापमान बढ़ने के बाद एक दिन में तीन से चार बार पौधों की सिंचाई करनी पड़ती है. कंधे पर घड़ा रखकर पान की सिंचाई करना पड़ता है.

हरि राम चौरसिया कहते हैं कि ज़्यादा ठंड पड़ने की वजह से पानों की हरियाली पूरी तरह ख़त्म हो जाती है. इस बार की सर्दी में भी पान की फ़सल को नुक़सान पहुंचा था.

पान के पत्ते की ग्राउंड रिपोर्ट
(Photo: Sakib Mazeed)

सुरेश कुमार चौरसिया बताते हैं कि अगर बुआई करने के एक दिन बाद बारिश हो जाती है, तो पूरी पान की फ़सल बर्बाद हो जाती है. अचानकर बारिश हो जाने से कई बार हमारी फ़सल को नुक़सान हुआ है. पिछले साल बुआई की तैयारी कर रहे, तभी अचानक बारिश हो गई. अगर बुआई के 10 दिन पहले भी बारिश हो जाती है, तो फ़सल सड़ने लगती है.

पान के पत्ते की खेती
(Photo: Sakib Mazeed)

लोकल मंडी की ज़रूरत

पान किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए सूबे के अलग-अलग ज़िलों में जाने को मजबूर होना पड़ता है क्योंकि ज़िले में पान की कोई व्यवस्थित मंडी नहीं है. रवि कुमार चौरसिया कहते हैं कि प्रतापगढ़ में पान की मंडी न होने की वजह से हमें बनारस, जौनपुर, सुल्तानपुर जैसे शहरों में सौदा करने जाना पड़ता है. सरकार से हमारी मांग है कि हम लोग को अगर ज़िले में मंडी की सुविधा मिल जाए, तो बहुत अच्छा हो जाएगा. हम किराया-भाड़ा देकर पान बेचने अलग-अलग शहरों में जाने को मजबूर हैं. एक पिकअप ट्रक पर 20 से 30 लोग लदकर पान बेचने जाते हैं.

सुरेश कुमार चौरसिया कहते हैं कि बनारस में पान के व्यापारी हमसे पचास रुपए ढोली के रेट से पान खरीदकर उसको मोडिफाई करके 500 रुपए ढोली में बेचते हैं.

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जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा ने बताया, “हमने विभाग से डिमांड की है कि ज़िले में पान की प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाए. हमने उद्यान विभाग के प्रमुख सचिव के सामने मीटिंग में ये बात रखी थी कि अगर प्रोसेसिंग यूनिट दे दी जाए, तो हमारे किसान पान की प्रोसेसिंग करके अच्छे रेट में बेच सकते हैं.”

विदेश भी जाता है भारतीय पान

भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के पोर्टल Farmer Connect की रिपोर्ट के मुताबिक़, वित्त वर्ष 2022–23 में भारत से पान का कुल निर्यात क़रीब 3,440 मीट्रिक टन रहा. इस निर्यात की कुल वैल्यू लगभग 6.21 मिलियन अमेरिकी डॉलर दर्ज की गई. यह डेटा दिखाता है कि उस साल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पान की अच्छी मांग बनी हुई थी और निर्यात का स्तर मजबूत था.

वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में पान और संबंधित कैटेगरी (Betel Leaves & Nuts) का कुल निर्यात घटकर 1,594.24 मीट्रिक टन हो गया, जिसकी वैल्यू क़रीब 5.79 मिलियन डॉलर रही. इससे साफ है कि पिछले कुछ साल में पान के निर्यात में काफी गिरावट आई है और सेक्टर को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

पान के पत्ते की खेती की ग्राउंड रिपोर्ट
(Photo: Sakib Mazeed)

‘पाकिस्तान से रिश्ते ख़राब होने से हुआ नुक़सान…’

सुरेश कुमार चौरसिया कहते हैं, “हमारा पान पाकिस्तान भी निर्यात होता था लेकिन पिछले दिनों दोनों देशों के बीच रिश्ते ख़राब होने से बंद हो गया. जब भारत पान का निर्यात पाकिस्तान को करता था, तो हमारी बिक्री बहुत अच्छी थी और हमें रेट भी अच्छा मिलता था.”

वे आगे हते हैं कि पहले हमारा पान 200 रूपए प्रति ढोली (200 पान) बिकता था, लेकिन आज हमारा वही पान 30 से 40 रुपए ढोली बिक रहा है. पाकिस्तान पान के मामले में सबसे ज़्यादा भारत से ही आयात करता था. जब से बंद हुआ, हमें पान की क़ीमत अच्छी नहीं मिलती है.

भारतीय वाणिज्य और उद्याोग मंत्रालय के मुताबिक़, साल 2024-25 में भारत से ब्रिटेन, यूएई, मलेशिया, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों को पान निर्यात हुआ.

पान के पत्ते की खेती
(Photo: Sakib Mazeed)

भारत में बड़े स्तर पर होती है पान की खेती

भारत में करीब 100,000 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन पर पान की खेती की जाती है. इसमें असम सबसे आगे है, जहां करीब 65 हज़ार एकड़ ज़मीन पर यह फसल उगाई जाती है. असम के बाद, पान की खेती में पश्चिम बंगाल और कर्नाटक का नंबर आता है, जहां 11,500 हेक्टेयर और 8,000 एकड़ ज़मीन पर पान की खेती होती है.

पान की खेती आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल, गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान और झारखंड में भी काफ़ी लोकप्रिय है. यूपी में उन्नाव, रायबरेली, बाराबंकी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, बलिया, गाज़ीपुर, ललितपुर, महोबा, बांदा, आज़मगढ़, हरदोई, लखनऊ, कानपुर, अमेठी, इलाहाबाद, सीतापुर, वाराणसी, मिर्ज़ापुर और सोनभद्र ज़िलों में पान की खेती लोगों की आमदनी का ज़रिया है.

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