सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला विवाद और धर्म बनाम कानून को लेकर बहस जारी है. बुधवार को सुनवाई का दूसरा दिन रहा. नौ जजों की बड़ी बेंच इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही है. दिनभर चली इस बहस में पक्ष-विपक्ष से तमाम दलीलें पेश की गईं और तर्क रखे गए. खास बात है कि यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई धार्मिक-सामाजिक मुद्दे भी जुड़े हुए हैं. सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इस मामले में पक्ष रख रहे हैं.

सबरीमाला मुद्दे के साथ कई मामलों के लिए हो रही यह बहस ‘धर्म बनाम कानून’ की बन चुकी है. नौ जजों की बेंच बनाने के लिए साथ सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के लिए सात सवाल भी तय किए हैं. बहस के दौरान इन सवालों के जवाब मिलने से न सिर्फ सबरीमाला का विवाद सुलझ जाएगा, बल्कि धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं से जुड़े कई विवाद भी सुलझेंगे.

क्या हैं वो सात सवाल जो संवैधानिक बेंच के सामने हैं-

पहला सवाल- भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और इसकी सीमा क्या है?

दूसरा सवाल- आर्टिकल 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और आर्टिकल 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच पारस्परिक संबंध क्या है?

तीसरा सवाल- क्या आर्टिकल 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अतिरिक्त संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन भी हैं?

चौथा सवाल- आर्टिकल 25 और 26 में शामिल ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और सीमा क्या है, और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता भी शामिल है?

पांचवां सवाल- आर्टिकल 25 में शामिल धार्मिक प्रथाओं के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और सीमा क्या है?

छठवां सवाल- आर्टिकल 25(2)(b) में शामिल “हिंदुओं के वर्ग” (Sections of Hindus) अभिव्यक्ति का क्या अर्थ है?

सातवां सवाल- क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से जुड़ा हुआ नहीं है, उस संप्रदाय या समूह की किसी प्रथा या परंपरा को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चुनौती दे सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में जारी बहस कई मामलों पर डालेगी असर
सबरीमाला केस में साल 2018 के फैसले के बाद ‘आस्था बनाम महिला अधिकार की जंग की बहस’ मुद्दा बनकर अब सुप्रीम कोर्ट पहुंची है. इस फैसले के बाद देशभर में बहस छिड़ गई और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं. इसके साथ ही अन्य धार्मिक प्रथाओं को भी चुनौती मिलने लगी.

इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ (महिला जननांग विकृति) की प्रथा को खत्म करने और पारसी महिलाओं को अगियारी (फायर टेंपल) में प्रवेश देने जैसे मुद्दे शामिल हैं. केंद्र सरकार ने भी सबरीमाला फैसले की समीक्षा की मांग का समर्थन किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई और बहस के लिए जो सात संवैधानिक सवाल तय किए हैं, उनके जवाब मिलने पर सबरीमाला के साथ-साथ चार और प्रमुख मामलों पर असर पड़ेगा.

पहला मामलाः सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश- साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया था. अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं. इस फैसले के खिलाफ मंदिर के पुजारी और कुछ संस्थाओं ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं.

दूसरा मामलाः दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना होता है. इस मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. कोर्ट यह तय करेगा कि यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं.

तीसरा मामलाः मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश का मुद्दा भी साल 2016 का चर्चित मुद्दा है. यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है, कोर्ट इस सवाल का जवाब तय करेगा.

चौथा मामलाः पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश का मामला साल 2012 में सामने आया था. पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है.

पांचवां मामलाः मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव को लेकर भी कोर्ट सुनवाई कर रही है. सवाल है कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है.

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