वो एक शब्द जिसके इर्द-गिर्द घूम रहा सबरीमाला विवाद, जानिए क्या है इसके मायने – sabarimala dispute supreme court hearing women entry naishtik brahmachari ntcpvp


सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच सबरीमाला विवाद को लेकर सुनवाई कर रही है. मामला 2018 में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले से जुड़ा हुआ. जब कोर्ट ने इस मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी. मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश नहीं हो सकता है. यह परंपरा भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ मानने की आस्था से जुड़ी हुई थी.

सबरीमाला विवाद पर सुनवाई के साथ ही ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ शब्द भी चर्चा में है. इस पूरे विवाद के संदर्भ में इस शब्द के अर्थ और इसकी परंपरा व मान्यता को समझने की भी जरूरत है. क्योंकि इसी आधार पर इस महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा के सम्मान की मांग की जा रही है और यही मान्यता महिलाओं के प्रवेश पर रोक का कारण भी बनती है.

‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ क्या है?

महिलाओं के प्रवेश पर रोक का सबसे मुख्य तर्क यही है कि, सबरीमाला के देवता भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं. यानी कि वह किसी भी तरह में महिलाओं के संपर्क में नहीं आते हैं. ये ‘किसी भी तरह’ वाली बात इतनी अहम है कि इसका मतलब है कि वह ‘आंख उठाकर’ इस ओर देखते भी नहीं हैं.

पुराणों में इस बात से जुड़ी कई कहानियां आती हैं. जैसे भगवान राम के भाई लक्ष्मण को भी वनवास के समय ब्रह्मचर्य के पालन के लिए जाना जाता है. ब्रह्मचर्य में उनकी निष्ठा ऐसी थी कि उन्होंने अपनी भाभी सीता का भी कभी चेहरा नहीं देखा था. इसलिए देवी सीता के गहने पहचानने की बात आई तो वह सिर्फ उनकी पायल ही पहचान सके थे. कान के झुमके, हाथ के कंगन और सिर के गहने नहीं पहचान सके थे.

भगवान हनुमान भी नैष्ठिक ब्रह्मचारी ही माने जाते हैं. इसलिए कई जगह उनके मंदिरों में लिखा होता है कि महिलाएं मू्र्ति को न छूएं.

नैष्ठिक ब्रह्मचारी महिलाओं को सिर्फ बेटी-बहन और मां के रूप में देखते हैं, ऐसा माना जाता है. इसीलिए भक्त परंपरा में 10-50 वर्ष की स्त्रियों-महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को लेकर रोक है.

सबरीमला मंदिर में भगवान अयप्पा की इसी स्वरूप की पूजा होती है, इसलिए श्रद्धालुओं द्वारा पूजा पद्धति में कोई भी बदलाव उस धार्मिक संप्रदाय की मूल पहचान के उल्लंघन के रूप में देखा जाता रहा है. 2018 में भी जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रहा था, तब भी यही सवाल उठा था कि क्या यह परंपरा ‘मौलिक धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) है या नहीं.

ब्रह्मचर्य और उसके प्रकार

हिंदू धर्मग्रंथों में ब्रह्मचर्य का विस्तार से जिक्र मिलता है. मनुस्मृति, वशिष्ठ स्मृति, जाबालि स्मृति और स्मृति चंद्रिका जैसे ग्रंथ इस विषय पर बात करते हैं. हालांकि ‘स्मृति मुक्तावली’ और ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ इस बहस के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं.

स्मृति मुक्तावली (मनु स्मृति पर ही एक टिप्पणी) के अनुसार ब्रह्मचर्य दो प्रकार का होता है:

1. उपकुर्वण ब्रह्मचारी – जो शिक्षा पूरी होने तक ब्रह्मचर्य का पालन करता है और बाद में विवाह कर गृहस्थ जीवन अपनाता है.
2. नैष्ठिक ब्रह्मचारी – जो जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन करने का संकल्प लेता है.

याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि नैष्ठिक ब्रह्मचारी को अपने गुरु के साथ ही रहना चाहिए और बहुत संयमित जीवन जीना चाहिए.

नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की शर्तें

याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिए दो प्रमुख शर्तें हैं:

1. शारीरिक कष्ट (तप)
नैष्ठिक ब्रह्मचारी को अपने शरीर को कठिन अनुशासन और तपस्या के अधीन रखना होता है. वशिष्ठ स्मृति में इसके कई उदाहरण दिए गए हैं, जैसे साधारण जीवन जीना, गुरु की आज्ञा का पालन करना, विलासिता से दूर रहना आदि.

2. इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण (इंद्रिय निग्रह)
नैष्ठिक ब्रह्मचारी को अपनी सभी इंद्रियों, आंख, कान, मन, वाणी आदि पर पूरा नियंत्रण रखना होता है. इसका अर्थ केवल कर्मों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि विचारों पर भी नियंत्रण है.

इसी कारण यह तर्क दिया जाता है कि ऐसे ब्रह्मचारी को उन महिलाओं से दूरी बनाई रखनी होती है, जो युवा आयु की हैं, ताकि मन और इंद्रियों में किसी तरह का बदलाव न आए.

देवता को मानव स्वरूप में मानने की परंपरा

आगम शास्त्रों के अनुसार मंदिर में स्थापित देवता को उसी तरह के नियमों का पालन करते हुए पूजा जाता है, जैसे उस स्वरूप में एक आदर्श मानव की ओर से किया जाता. इसलिए यदि किसी देवता की पूजा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ के रूप में होती है, तो उसके अनुसार पूजा-पद्धति में भी वही नियम लागू होते हैं. इसी आधार पर यह कहा जाता है कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश उस धार्मिक अनुशासन के उलट है.

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