मजदूरों का पेट भरने के लिए अशोक वैद्य ने मजबूरी में बनाया था वड़ा पाव, ऐसा है 60 साल पुराना इतिहास – vada pav history mumbai street food origin story poor man’s lunch tvism


वड़ा पाव इतिहास: ब्रेकफास्ट या स्नैक्स में लोग कुछ ऐसा खाना चाहते हैं जिससे उनका पेट भी जल्दी भर जाए और उसे तैयार करने में अधिक मेहनत भी ना लगे. मुंबई की दौड़ती-भागती जिंदगी में लोग अक्सर स्नैक्स के तौर पर वड़ा पाव खाते हैं जो वहां पर हर गली-मोहल्ले और रेस्टोरेंट पर काफी सस्ते में मिल जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं 1960 के दशक से शुरू हुआ वड़ा पाव आज बड़े-बड़े रेस्टोरेंट्स और विदेशों तक पहुंच गया है. वड़ा पाव का जन्म किसी आलीशान किचन में नहीं, बल्कि सड़क किनारे एक छोटी सी रेहड़ी पर हुआ था. तो आइए समय के साथ कैसे ये ग्लोबल पहचान बना, इस हारे में जान लीजिए-

मजदूरों की भूख और वड़ा पाव

बीबीसी के मुताबिक, माना जाता है कि इस डिश का आविष्कार 1966 में मुंबई के अशोक वैद्य ने किया था. उन्होंने दादर रेलवे स्टेशन के सामने पहला वड़ा पाव का स्टॉल खोला था, जहां से होकर हर दिन लाखों मजदूर गुजरते थे और उन्हें अक्सर जल्दी और सस्ते नाश्ते की जरूरत होती थी.

ये मजदूर परेल और वर्ली जैसे उपनगरों में स्थित कपड़ा मिलों में काम करने जाते थे. तब उनकी भूख मिटाने के लिए एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प तलाशा गया. यही वो दौर था जब वड़ा पाव एक मजबूरी के तौर पर सामने आया और देखते ही देखते शहर की पहचान बन गया.

प्रयोग और मजबूरी

वड़ा पाव की कहानी साल 1966 के आसपास शुरू होती है. उस समय मुंबई के दादर रेलवे स्टेशन के बाहर अशोक वैद्य नाम के एक व्यक्ति ने बटाटा वड़ा (आलू वड़ा) बेचना शुरू किया था. ऐसे में अशोक वैद्य ने एक प्रयोग किया और वड़े को पाव के बीच में रखकर चटनी के साथ परोसना शुरू किया. यह प्रयोग काफी सफल रहा क्योंकि उस समय मिल मजदूरों की संख्या बहुत ज्यादा थी और उन्हें ऐसा खाना चाहिए था जिसे वे चलते-फिरते खा सकें और जो सस्ता भी हो.

राजनीति ने भी बढ़ाया आगे

मुंबई की फूड राइटर मेहर मिर्जा के मुताबिक, वड़ा पाव को फेमस करने में उस समय की स्थानीय राजनीति का भी बड़ा हाथ रहा क्योंकि शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 1960 के दशक में वहां के लोगों को दक्षिण भारतीय चीजों की बजाय महाराष्ट्रीयन व्यंजन के स्टॉल शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे यह सिर्फ मिल मजदूरों का खाना न रहकर हर आम आदमी की पसंद बन गया.

1970 और 80 के दशक में जब मुंबई की कपड़ा मिलें बंद होने लगीं, तो कई बेरोजगार मजदूरों ने खुद के वड़ा पाव स्टॉल खोल लिए जिससे इसकी पहुंच और बढ़ गई. आज वड़ा पाव सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं है. दुनिया के बेहतरीन सैंडविच की लिस्ट में वड़ा पाव भी पहचाना जाता है.

विदेशी चीजों से बना वड़ा पाव

फूड हिस्टोरिरियन केटी आचार्य ने अपनी रिसर्च में भारतीय खानपान के विकास पर अपनी बुक में लिखा है. उन्होंने अपनी बुक ‘ए हिस्टोरिकल डिक्सनरी ऑफ इंडियन फूड’ में बताया है, आलू और पाव (ब्रेड) दोनों ही भारत में विदेशी लाए थे. पुर्तगाली भारत में आलू और पाव लेकर आए, जबकि वड़ा बनाने की तकनीक पारंपरिक भारतीय थी. वड़ा पाव दरअसल विदेशी चीजों और भारतीय मसालों का एक बेहतरीन मेल है, जिसे मुंबई की जरूरत के हिसाब से ढाला गया.

—- समाप्त —-



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *