अमेरिका और वेटिकन सिटी (जहां पोप रहते हैं) के बीच इन दिनों तनाव देखने को मिल रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन ने पोप लियो XIV के दूत को बुलाकर साफ कह दिया कि कैथोलिक चर्च को अमेरिका का साथ देना होगा. वेटिकन के अधिकारियों ने इसे एक खुली धमकी की तरह माना. यह सब तब शुरू हुआ जब पोप ने शांति और बातचीत के पक्ष में भाषण दिया, जिसे ट्रंप सरकार ने अपने खिलाफ माना.

दरअसल, इसी साल 9 जनवरी को पोप लियो XIV (जो अमेरिका में जन्मे पहले पोप हैं) ने एक भाषण दिया था. उन्होंने कहा था कि आज की दुनिया में बातचीत की जगह ताकत और सेना का इस्तेमाल बढ़ रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि युद्ध फिर से फैशन में आ गया है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो नियम बना था कि कोई देश जबरदस्ती दूसरे देश की सीमा नहीं तोड़ेगा, वो नियम अब पूरी तरह खत्म हो चुका है.

ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों, खासकर पेंटागन के सीनियर अधिकारी एल्ब्रिज कोल्बी, को यह बात पसंद नहीं आई. उन्हें लगा कि पोप सीधे तौर पर अमेरिका की विदेश नीति और ट्रंप की नीतियों पर निशाना साध रहे हैं.

खबरों के मुताबिक, पेंटागन ने वेटिकन के राजदूत कार्डिनल क्रिस्टोफ पियरे को मीटिंग के लिए बुलाया. इस मीटिंग में वेटिकन के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें काफी खरी-खोटी सुनाई गई. अमेरिकी अधिकारियों ने कथित तौर पर कहा, ‘अमेरिका के पास इतनी सैन्य शक्ति है कि वह दुनिया में जो चाहे कर सकता है. बेहतर होगा कि कैथोलिक चर्च अमेरिका का साथ दे.’

इतना ही नहीं, अमेरिका ने 14वीं सदी की एक पुरानी घटना (एविग्नन पैपेसी) का जिक्र किया जब पोप को फ्रांस के राजा के दबाव में झुकना पड़ा था.

एविग्नॉन वाला जिक्र, जो सबसे बड़ी धमकी बना

रिपोर्ट्स के मुताबिक बैठक में एक अमेरिकी अधिकारी ने 14वीं सदी की एक पुरानी घटना का जिक्र किया जिसे एविग्नन पैपेसी कहते हैं. यह वो दौर था जब 1309 से 1377 के बीच सात पोपों को फ्रांस के एविग्नॉन शहर में रहने पर मजबूर किया गया था, क्योंकि फ्रांस के राजा का उन पर दबाव था. उससे पहले पोप बोनिफेस आठवें को फ्रांस के राजा के लोगों ने गिरफ्तार किया था और उनके साथ बुरा बर्ताव किया था. उनकी मौत कुछ महीनों बाद ही हो गई थी. इसके बाद भी फ्रांस के राजा ने अगले पोप के चुनाव में दखल दिया और एक फ्रांसीसी को पोप बनवाया.

वेटिकन के अधिकारियों ने इस पुराने किस्से के जिक्र को बहुत गंभीरता से लिया. उन्होंने इसे एक छुपी हुई धमकी माना कि जैसे फ्रांस ने कभी पोप को अपने इशारे पर नचाया था, वैसे ही अमेरिका भी वेटिकन पर दबाव बना सकता है.

वेटिकन ने क्या जवाब दिया?

इस घटना से नाराज होकर पोप लियो XIV ने अमेरिका के साथ होने वाले कई कार्यक्रमों से दूरी बना ली है. उन्होंने अमेरिका की आजादी की 250वीं सालगिरह (4 जुलाई) के जश्न में शामिल होने का उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का न्योता ठुकरा दिया है. उन्होंने अपना अमेरिका दौरा रद्द कर दिया है. इसकी जगह, पोप इटली के लैम्पेडुसा द्वीप जाएंगे, जो उन प्रवासियों के लिए जाना जाता है जो जान जोखिम में डालकर यूरोप पहुंचते हैं.

यह एक बड़ा प्रतीकात्मक कदम था, क्योंकि इससे पोप ने यह दिखाया कि वो उन्हीं लोगों के साथ हैं जिनके बारे में ट्रंप सरकार सख्त रवैया अपनाए हुए है.

अमेरिका ने क्या कहा?

व्हाइट हाउस ने किसी भी तरह की धमकी से इनकार किया. रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि अखबार की रिपोर्ट में जो लिखा गया वो बहुत बढ़ा चढ़ाकर और तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है. उन्होंने कहा कि बैठक सम्मानजनक और उचित थी और अमेरिका वेटिकन की सबसे ज्यादा इज्जत करता है. वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हंगरी यात्रा के दौरान कहा कि वो इस मामले की जांच करना चाहते हैं. उन्होंने कार्डिनल पियरे से और अपने अधिकारियों से बात करके जानना चाहा कि असल में क्या हुआ. उन्होंने यह भी कहा कि बिना पुष्टि के किसी खबर पर राय देना सही नहीं होगा.

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