क्या पाक में सेफ है अमेरिकी-ईरानी डेलिगेशन? इस्लामाबाद से वॉशिंगटन तक यही है चिंता – questions raised about security of American Iranian delegation in Pakistan

ByCrank10

April 10, 2026 , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,


पाकिस्तान में आतंकवाद की समस्या कई दशकों से चली आ रही है. यहां कभी श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला होता है. कभी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों पर, तो कभी विदेशी डिप्लोमेट्स को निशाना बनाया जाता है. ऐसे में जब कोई अमेरिकी डेलिगेशन पाकिस्तान आता है, तो उसकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.

अमेरिका और ईरान के बीच मीटिंग कराने की पाकिस्तान जो कोशिश कर रहा है उसमें सुरक्षा का सवाल सबसे बड़ा है. यह सिर्फ संयोग नहीं है, बल्कि पुरानी घटनाओं का नतीजा है.

पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन जैसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और अन्य समूह बार-बार सुरक्षा बलों और विदेशी नागरिकों या संस्थानों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं. इन हमलों ने न सिर्फ पाकिस्तान को अंदरूनी रूप से कमजोर किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं.

2009 का श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला

2009 में पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी सामने आई जब श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर लाहौर में हमला हुआ. 3 मार्च 2009 को गद्दाफी स्टेडियम के पास आतंकवादियों ने टीम की बस पर गोलीबारी की. इस हमले में 6 पाकिस्तानी पुलिसकर्मी और 2 आम नागरिक मारे गए, जबकि 6 श्रीलंकाई खिलाड़ी घायल हो गए.

पाकिस्तान आतंकवाद
स्टेडियम में उतरा सेना का हेलिकॉप्टर और बस में श्रीलंका क्रिकेट टीम के खिलाड़ी. (फाइल फोटो: आईटीजी)

हमलावरों ने एक मिनीवैन ड्राइवर को भी मार डाला. इस घटना के बाद पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कई सालों तक बंद रहा. खिलाड़ियों में महेला जयवर्धने, कुमार संगकारा, अजंता मेंडिस, थिलन समरवीरा और थरंगा परनाविताना घायल हुए. यह हमला टीटीपी और लश्कर-ए-झंगवी जैसे संगठनों से जुड़ा माना गया. इस घटना ने साबित कर दिया कि पाकिस्तान में बड़े आयोजनों की सुरक्षा भी पक्की नहीं है.

पाकिस्तान की सेना पर बड़े आतंकी हमले

पाकिस्तान की सेना पर भी कई बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं. इनमें सेना के ठिकानों, कैंपों और काफिलों को निशाना बनाया गया है. उदाहरण के लिए, 2009 में रावलपिंडी में आर्मी जनरल हेडक्वार्टर्स पर हमला हुआ जिसमें 9 सैनिक मारे गए. टीटीपी ने कई बार सेना के ट्रेनिंग सेंटरों पर हमले किए हैं.

2011 में मर्दान में एक ट्रेनिंग सेंटर पर हमले में 27 सैनिक मारे गए. 2010 में लाहौर में सेना के काफिले पर दो आत्मघाती हमलों में 40 से ज्यादा लोग मारे गए और 100 घायल हुए. इन हमलों में हजारों सैनिक मारे गए हैं. 2007 से 2009 के बीच पाकिस्तान में आतंकवाद चरम पर था, जिसमें सुरक्षा बलों के सैकड़ों जवान मारे गए.

2014 में पेशावर आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला सबसे भयानक था, जिसमें 149 लोग मारे गए जिनमें ज्यादातर स्कूली बच्चे थे. हाल के सालों में भी टीटीपी ने सेना के ठिकानों पर हमले जारी रखे हैं. 2025 में पाकिस्तान में आतंकवाद से जुड़ी मौतों में बढ़ोतरी हुई, जिसमें सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या शामिल है. इन हमलों से साफ है कि पाकिस्तान की सेना खुद को आतंकियों से बचाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है.

पाकिस्तान आतंकवाद
पेशावर आर्मी पब्लिक स्कूल में हुए हमले में कई बच्चों की मौत हुई थी. (फाइल फोटो: एपी)

डिप्लोमेट्स और विदेशी संस्थानों पर हुए हमले

पाकिस्तान में विदेशी डिप्लोमेट्स पर भी कई हमले हो चुके हैं. 1995 में कराची में दो अमेरिकी डिप्लोमेट्स की हत्या कर दी गई. 2002 में इस्लामाबाद में एक चर्च पर हमला हुआ जिसमें दो अमेरिकी नागरिक मारे गए. विदेशी दूतावासों और डिप्लोमेटिक कंपाउंड्स को निशाना बनाया गया है. 2008 में काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला हुआ जिसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर आरोप लगे.

इसी तरह, कई बार विदेशी नागरिकों और डिप्लोमेट्स को अपहरण या हमलों का शिकार बनाया गया. इन घटनाओं ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर दिया. जब कोई विदेशी डेलिगेशन पाकिस्तान आता है, तो सुरक्षा एजेंसियां भारी तैनाती करती हैं, लेकिन पुरानी घटनाएं लोगों के मन में डर पैदा करती हैं.

अमेरिकी डेलिगेशन की सुरक्षा पर उठते सवाल

अभी हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के लिए इस्लामाबाद में अमेरिकी डेलिगेशन आने वाला है. इसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस, विशेष दूत स्टीव विटकोफ और जैरेड कुश्नर जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं. पाकिस्तान सरकार ने फुलप्रूफ सुरक्षा का वादा किया है. आर्मी को तैनात किया गया है. लेकिन श्रीलंकाई टीम, सेना और डिप्लोमेट्स पर हुए पुराने हमलों को देखते हुए सवाल उठ रहे हैं.

पाकिस्तान में आतंकवाद अब भी सक्रिय है. 2025 में ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में पाकिस्तान पहले नंबर पर पहुंच गया, जहां 1139 मौतें आतंकवाद से जुड़ी दर्ज हुईं. टीटीपी जैसे संगठन अभी भी हमले कर रहे हैं. ऐसे में अमेरिकी डेलिगेशन जैसी हाई-प्रोफाइल विजिट में कोई चूक न हो, यह चिंता का विषय है.

पाकिस्तान की सरकार कह रही है कि सुरक्षा पक्की है, लेकिन इतिहास बार-बार याद दिलाता है कि आतंकी हमलों का खतरा बना रहता है. पाकिस्तान को आतंकवाद की जड़ें खत्म करने के लिए सुरक्षा बलों की क्षमता बढ़ानी होगी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना होगा. तब तक श्रीलंकाई टीम, सेना, डिप्लोमेट्स और अब अमेरिकी डेलिगेशन जैसी घटनाएं सुरक्षा पर सवाल उठाती रहेंगी.

—- समाप्त —-



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *