13 अप्रैल 1970 को पृथ्वी से 200,000 मील दूर एक भीषण आपदा घटी. जब अपोलो- 13 का ऑक्सीजन टैंक नंबर 2 फट गया. यह तीसरा मानवयुक्त चंद्रयान मिशन था. अंतरिक्ष यात्री जेम्स ए. लवेल, जॉन एल. स्विगर्ट और फ्रेड डब्ल्यू. हैस दो दिन पहले पृथ्वी से चंद्रमा के फ्रा मौरो के लिए रवाना हुए थे, लेकिन बाद में उन्हें अपना पूरा ध्यान केवल जीवित घर लौटने पर देना पड़ा.

मिशन कमांडर लवेल ने पृथ्वी पर मिशन कंट्रोल को सूचना दी –  ह्यूस्टन, हमें यहां एक समस्या आ गई है. तब पता चला कि ऑक्सीजन, बिजली, लाइट और पानी की सप्लाई बाधित हो गई है. फिर लैंडिंग मिशन रद्द कर दिया गया और पृथ्वी पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों और नियंत्रकों ने आपातकालीन प्रक्रियाओं को तैयार करने के लिए तुरंत कदम उठाए. क्षतिग्रस्त अंतरिक्ष यान चंद्रमा की ओर बढ़ा, उसका चक्कर लगाया, और पृथ्वी पर वापस आने की एक लंबी यात्रा शुरू की.

अंतरिक्षयात्री और मिशन नियंत्रण दल को अंतरिक्ष यान और उसकी एयर सप्लाई को स्थिर करने तथा क्षतिग्रस्त ईंधन सेल को पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा सफल प्रवेश के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करने में भारी रसद संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा.

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साथ ही नेविगेशन भी एक बड़ी समस्या थी. अपोलो- 13 के मार्ग को नाटकीय तरीके से बार-बार ठीक किया गया. 17 अप्रैल को, जब पूरी दुनिया की उत्सुकता से इस घटना पर निगाह टिकी थी. तभी यह त्रासदी एक विजय में बदल गई. क्योंकि अपोलो -13 के अंतरिक्ष यात्री प्रशांत महासागर में सुरक्षित रूप से उतर गए.

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