आशा ताई भी चली गईं. समझिए कि गीतों और सुरों की एक पूरी पीढ़ी का गोलोकगमन हो गया. लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मन्ना डे, मोहम्मद रफी, मुकेश, महेंद्र कपूर और आशा भोसले… बॉलीवुड के ये सात ऐसे सुर थे जो अपनी ही तरह के अनोखे थे. इनमें लता मंगेशकर और आशा भोसले तो एक ही परिवार में जन्मे एक ही आंगन में खेले-पढ़े, सीखे, सुरों को साधा और फिर देश ही नहीं दुनिया को अपने संगीत से झुमा दिया.
लेकिन क्या आप जानते हैं कानों में मिसरी घोलने वाले सुरों का ये पेड़ बचपन में ही कैसे रोपा गया था? इसका रहस्य मंगेशकर परिवार के बच्चों के खेलों में ही छिपा है. उनके बचपन का ये सुनहरा, सुंदर सा और निर्दोष-निश्छल दौर हर किसी की आंखों से ओझल ही रहता, अगर मशहूर एंकर और लेखक हरीश भिमानी ने ऐसे अनगिनत किस्सों को किताब की शक्ल में न ढाला होता.
यूं तो किताब लता मंगेशकर के जीवन के किस्सों पर लिखी गई है, नाम है ‘लता दीदी- अजीब दास्तां है ये…’ लेकिन क्या बड़ी बहन के किस्से छोटी बहन के बिना पूरे हो सकते हैं, तो पढ़िए लता जी की ही जुबानी बहनों के साथ उनके बचपन की कहानी…
असल में मंगेशकर परिवार में कला और गीत-संगीत का तो बड़ा सम्मान था, नाटकों की भी बहुत कद्र थी, लेकिन फिल्मों की मनाही थी और पिता दीनानाथ मंगेशकर इस मनाही के लिए बेहद सख्त भी थे.
लता बताती हैं, ‘…लेकिन थी तो हम आखिर नादान बच्चियां हीं. कभी-कभी बाबा से छिपकर उनकी गैर मौजूदगी में एकाध फिल्में देखने चली जातीं. फिल्म देखकर बहनें घर आतीं और फिर उसके डॉयलॉग आपस में दोहराए जाते थे. मीना और आशा हूबहू वैसे ही संवाद बोलतीं और उन्हीं अदाओं के साथ, जैसा कि फिल्म में होता. मैं इस दौरान हूबहू बैकग्राउंड म्यूजिक गुनगुनाती. बीच-बीच में जो गीत आते वह हम सब मिलकर गुनगुनाते थे.

एक बार हम लड़कियां संत तुकाराम (मराठी फिल्म) देखकर आए. इस फिल्म में एक गीत था, जिसमें बीज बोने, उनके अंकुरित होने और फिर फसल लहलहाने का सुंदर दृश्य था.
तो हम फिल्म देखकर घर आए. अब इस गीत की पटकथा नए सिरे से की गई. हरीश भिमानी लिखते हैं कि ‘लता गीत गाना शुरू करतीं, तब छोटी मीना और आशा बोए जाने वाले बीज बनकर फर्श पर लेटी रहती. फिर गीत आगे बढ़ता और इसके साथ बीजों के अंकुरण होते और पौधे बढ़ने की तरह की एक्टिंग करते हुए दोनों बहनें धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठतीं. फिर जब पौधे और बड़े हो जाते तो दोनों बहनें कोमल सहमे नरम पत्तों की फसलों की तरह सीधी तन कर बैठ जातीं और जब गीत में फसल लहलहाने लगती तो आशा और मीना खड़े होकर झूमने लगती थीं.
इस तरह हंसते-खिलखिलाते बचपन में ही कला और कला को गहराई से समझने की क्षमता विकसित हो रही थी. आशा भोसले और मीना तो और भी ज्यादा क्रिएटिव होती जा रही थी. उन्होंने खेल-खेल में ही संत तुकाराम फिल्म के और भी सीन घर में ही गढ़ लिए.
जैसे कि फिल्म में तुकाराम की मृत्यु दिखाई गई थी. तो हम श्मशान तो जा नहीं सकते थे तो मीना और आशा क्या करती थीं कि दौड़ते हुए जीना उतरकर शौचालय के दरवाजे तक चला जाते थे. हमारे बालमन में श्मशान और शौचालय एक जैसी बुरी जगहों जैसा था. अब समस्या आती स्वर्ग का सेट बनाने की क्योंकि फिल्म में तुकाराम सदेह स्वर्ग गए थे. तो आशा और बहनों के साथ कमरे में एक कोने में चार-पांच गद्दे रखकर उनके ऊपर तकिये पर तकिया रखकर ऊंची जगह बना लेती थीं.
फिर दीदी (लता) को सफेद कपड़े पहनाकर उनके ऊपर बैठा देते. बस तुकाराम स्वर्ग में पहुंच जाते. मीना ताई (लता मंगेशकर से छोटी बहन) बताती हैं कि दीदी तुकाराम बनकर स्वर्ग में और मैं आशा के साथ नीचे धरती पर आंसू बहाकर रोते. इस तरह इस कल्पना में हम यह जताते कि कैसे तुकाराम की मृत्यु पर सारा महाराष्ट्र रोया होगा. यही हमारे खेल थे.
ये यहीं तक सीमित नहीं होता, हम कई और नाटक भी ऐसे ही खेलते थे. नाटक में तो कई पात्र होते थे. पर उसमें काम करने वाली हम तीन बहनें और एक फुफेरा भाई पंढरीनाथ भी साथ होता था. हम तीनों में छोटी आशा बनती थी राजकुमारी, वो छोटी थी न इसलिए. फिर मीना बनती थीं दुष्ट रानी और लता उस प्यारी राजकुमारी को रानी के चंगुल से छुड़ाने वाली बहादुर लड़की बनतीं.

पंढरीनाथ दोहरी भूमिका में होते थे. उन्हें हीरो (राजा) और विलेन (दुश्मन राजा) दोनों का किरदार निभाना होता था. जब पंढरीनाथ बायीं तरफ बाल बनाए तो बुरा आदमी और दायीं तरफ सलीके से बाल बनाए तो अच्छा राजा.
इस नाटक में गीतों की भरमार होती थी. लता गीत गातीं, आशा-मीना उस दोहराती थीं. ऐसे नाटक पूरा होता था.
फिर कभी-कभी लता यूं ही कहतीं बच्चों ग्रामोफोन सुनना है? तो दोनों बहनें कहती हां, तब लता अपने एक कान में उंगली डालकर चाभी की तरह घुमाती और अपनी चोटी की नोक को सिर पर ऐसे टिकातीं कि जैसे सिर कोई रिकॉर्ड हो. फिर वो कोई गीत गाना शुरू करतीं. मीना और आशा खूब ताली बजाकर हंसतीं और साथ में गीत गुनगुनाने लगतीं. दिन बीतते गए, बचपन पंख लगाकर उड़ गया.
लता दीदी, आशा ताई से चार साल बड़ी थीं. वह चार साल पहले जा चुकी हैं. अब आशा ताई भी उनके पास पहुंच गईं हैं. दोनों बहनें अब रुहानी दुनिया में सुरों का ऐसा ही सुंदर खेल खेलेंगी.
—- समाप्त —-

