अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये गये एक हालिया अध्ययन ने दुनियाभर के हिमनदों, यानी ग्लेशियरों से जुड़े चौंकाने वाले और गंभीर तथ्य सामने रखे हैं. अपने अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने दुनियाभर के करीब दो लाख ग्लेशियरों की स्थिति की पड़ताल की. इस अध्ययन में 10 देशों से ताल्लुक रखने वाले लगभग 15 से 21 वैज्ञानिकों ने भाग लिया. इन वैज्ञानिकों ने अब अपने अध्ययन की जानकारी दुनिया के सामने रखी है. इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह दुनियाभर के हिमनदों की स्थिति पर आधारित था और इसमें यह समझने की कोशिश की गयी कि जिस तरह वैश्विक तापमान में तेज वृद्धि दर्ज हो रही है, वह कहीं न कहीं आने वाले समय में हमारे जल और पेट पर गहरा असर डालेगी. यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो जब दुनिया का औसत तापमान 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा, तब वर्तमान की तुलना में मात्र 24 प्रतिशत ग्लेशियर ही बचे रहेंगे. और यदि हम तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने में सक्षम हो भी गये (जैसा कि पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट में तय किया गया है), तब भी हमारे पास केवल 54 प्रतिशत ग्लेशियर ही बचे रहेंगे. यह निष्कर्ष उपरोक्त अध्ययन के आधार पर सामने आया है और इसके तथ्य एकदम स्पष्ट हैं, क्योंकि हाल ही में नेपाल का एक विशाल ग्लेशियर पूरी तरह समाप्त हो चुका है. इतना ही नहीं, कुछ समय पहले ही स्विट्जरलैंड में भी एक बड़ा ग्लेशियर अपना अस्तित्व खो चुका है.

यदि वर्तमान हालात ऐसे ही बने रहे, तो दुनियाभर के सभी ग्लेशियर पिघलकर समुद्र में पहुंच जायेंगे, जिससे समुद्र का जलस्तर लगभग 113 मिलीमीटर तक बढ़ जायेगा. ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि यदि ऐसा हुआ, तो उन सभी देशों का और टापुओं पर जीवन संकट में पड़ जायेगा जो समुद्र तट पर स्थित हैं. इससे बड़ी त्रासदी शायद ही कोई और होगी. अध्ययन में यह भी पाया गया कि सबसे ज्यादा गंभीर स्थिति कनाडा, अमेरिका, यूरोप, स्कैंडिनेविया और भारत जैसे देशों की है. भारत, जो पहले से ही एक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है, इस बदलाव के सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभावों को झेलेगा. यदि तापमान वृद्धि दो डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो पूर्वी स्कैंडिनेविया का एक बड़ा हिस्सा अपने ग्लेशियरों को खो देगा और वहां कोई भी हिमखंड शेष नहीं बचेगा. यूरोप में भी केवल 10 से 15 प्रतिशत ग्लेशियर ही बचे रहेंगे. यह स्थिति अत्यंत गंभीर है, पर हम इसे समझने में विफल साबित हो रहे हैं. जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन को लेकर दुनियाभर में तमाम बैठकें और चर्चाएं हुई हैं. पर इन तमाम बैठकों और चर्चाओं के बावजूद हम अभी तक किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच पाये हैं और न ही इस बात को समझ पा रहे हैं कि तापमान में थोड़ा सा भी परिवर्तन धरती पर कितनी बड़ी आपदा को जन्म दे सकता है. वैज्ञानिक स्तर पर इस विषय पर बहस अवश्य होती रही है और इस विषय की गंभीरता को माना भी जाता रहा है. पर तापमान वृद्धि किसी एक देश की चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है. वर्तमान जीवनशैली ही इस बढ़ते तापमान की प्रमुख वजह है. हमें इस बात को समझना होगा कि तापमान में 0.01 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि का प्रभाव कई गुना अधिक होता है. ठीक वैसे ही जैसे भूकंप के रिक्टर स्केल में मामूली वृद्धि भी बड़े नुकसान का संकेत देती है. इसी प्रकार, ग्लोबल वार्मिंग का असर भी सीधा और बहुत बड़ा होता है.

हिमालय के ग्लेशियर विशेष रूप से खतरे में हैं, खासकर हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र के, जहां ग्लेशियरों का आकार घटता जा रहा है और वे झीलों में परिवर्तित हो रहे हैं. भारतीय और अन्य देशों के अध्ययनों के आधार पर भी यह पाया गया है कि हिमालय की ऊंचाइयों में अब ग्लेशियर झीलों का रूप ले रहे हैं और इससे भविष्य में विनाशकारी बाढ़ की आशंका भी बढ़ रही है. यदि तापमान वृद्धि की यही गति बनी रही, तो सदी के अंत तक हम केवल 20 से 25 प्रतिशत हिमालयी ग्लेशियर ही देख पायेंगे. यहां प्रश्न यह उठता है कि इन अध्ययनों के आधार पर अब हम कौन से बड़े निर्णय लेंगे? पिछले 30 वर्षों में हमने इन परिवर्तनों को देखा है और आइपीसीसी की रिपोर्टें भी लगातार आती रही हैं. जबकि सरकारें और नीति-निर्माता इन रिपोर्टों से परिचित हैं, फिर भी अब तक हम किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच पाये हैं. यह एक चिंताजनक स्थिति है. आइपीसीसी की रिपोर्टें हर वर्ष आती हैं, लेकिन वे कहीं न कहीं नजरअंदाज हो जाती हैं. इनमें चर्चा होती है कि परिवर्तन के मद्देनजर नियम बनाने चाहिए और सीमाएं तय करनी चाहिए. इन सब चर्चाओं के बीच एक महत्वपूर्ण पहलू पर भी बात करना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए दुनियाभर में स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रयोग किये गये हैं, जो जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, हिमालय में एचइएससीओ नामक संस्था ने एक अनूठा इकोसिस्टम रेस्टोरेशन प्रयोग किया, जिससे न केवल वनों की पुनः स्थापना हुई, बल्कि सूखी नदी में फिर से पानी भी आ गया, वन्य जीवन को पुनः स्थान मिला और पशु-पक्षियों की वापसी भी हुई. यह प्रयोग ग्लोबल वार्मिंग से निपटने का एक सफल उदाहरण है और यह सब स्थानीय लोगों की सहभागिता से संभव हो सका है. इस तरह के अनेक प्रयोग दुनिया में हुए हैं जिन्हें आज तक गंभीरता से नहीं लिया गया है.

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए अब एक नयी पहल की जा रही है. इस पहल के तहत एक संगठन- अलायंस फॉर ग्लोबल एनवायरनमेंट (एजीटी)- की स्थापना की जा रही है. इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन वैज्ञानिकों और संस्थाओं के प्रयोगों को एक मंच पर लाना है जिन्होंने स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ सफल प्रयास किये हैं. इस संगठन की पहली बैठक पांच जून को ओस्लो, नॉर्वे में आयोजित की जा रही है. आने वाले समय में जब एक ओर हम जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के प्रतिकूल प्रभावों से परिचित होंगे, वहीं दूसरी ओर हम यह भी बताने में सक्षम होंगे कि कौन से प्रयोग वर्तमान संकट को संभालने में सहायक हो सकते हैं. यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)



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