Book Review – युद्ध और हत्या का सांस्कृतिक विकल्प: यतीन्द्र मिश्र का संग्रह ‘बिना कलिंग विजय के’ – Book review of Yatindra Mishra’s latest collection of poems ‘Bina Kalinga Vijay Ke’ by Vinay Kumar


कलिंग विजय एक भयानक ऐतिहासिक स्मृति है – क्रूरता की पराकाष्ठा  और वीभत्सता की अति. इसका मानस-बिम्ब ढाई हज़ार साल पहले के हथियारों, बहते हुए रक्त, दंभ से भरे जयघोष और युद्धोत्तर आर्तनाद और अवसाद से बनता है. विजेता के मन में उपजा अवसाद इस युद्ध का सत्त है और अंतिम सत्य भी. यह सत्य उसे धम्म की शरण में ले जाता है. धम्म जो संस्कृति का एक अवयव है और अपने मौलिक और सहज स्वरूप में अन्य अवयवों का सहचर. नाटककार-कवि विनय कुमार ने इसी भावभूमि पर आधारित यतीन्द्र मिश्र के 12 वर्ष बाद प्रकाशित कविता संग्रह ‘बिना कलिंग विजय के’ पर अपनी राय दी है. कुमार संवेदनाओं के आवेग और मानव मन के इस स्पंदन को यतीन्द्र के संग्रह का प्रस्थान बिंदु मानते हैं. उनके अनुसार ‘बिना कलिंग विजय के’ पहली कविता की एक पंक्ति है जो कविता को शीर्षक, संग्रह को नाम और यह संकेत देती है कि आगे क्या है; और जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते हैं आप, यह स्पष्ट होता जाता है कि यह काव्य-पुस्तक काव्य क्षणों के उच्छ्वास का संकलन नहीं, बल्कि अवांछनीय कलिंग-विजय के  मानवीय और सांस्कृतिक विकल्प का विमर्श रच रही  है- बिना किसी प्रिटेंशनके, सिर्फ़ अपने इंटेंशन में.
संग्रह की दूसरी कविता ‘सरोवर कथा’ कथा और उसके नायक-नायिकाओं की केन्द्रीयता और परिवेश के उपेक्षित रह जाने की विडम्बना की ओर संकेत करते हुए कवि की दृष्टि के एक अहम कोण को सामने लाती है. जीवन हो या सभ्यता की कथा, जो दिखता है उसे अभिधा में कह देना विवरण है और उसकी महिमा का गान कीर्तन, कविता नहीं, कविता तो  विपर्ययों, विडम्बनाओं, व्यतिक्रमों और उनसे  मिले  व्रणों और वेदनाओं का लयात्मक विन्यास  है. वह प्रवृत्या वह श्लोक ही है जो क्रौंच के घाव से रिसा था. यतीन्द्र के कवि-कण्ठ में भी एक घायल  क्रौंच का वास है जो न सिर्फ़ निजी शोक के क्षणों में मुखर होता है बल्कि भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक  विस्तार की अंतरंग यात्रा  की समृति-लेखाओं में भी. संग्रह की सौ कविताओं से गुज़रते हुए क्रौंच के गले का गीला कम्पन बार-बार महसूस होता है और अंतिम अध्याय के पृष्ठ तो जैसे उसके विलाप की मर्मान्तक स्वर-लिपियाँ हों.
वैसे तो सौ कविताओं का यह संकलन चार अध्यायों में बँटा है और यह विभाजन मन: यात्रा में हासिल पानियों के उद्गम और आस्वाद के अनुसार है, मगर जब आप एक पाठक की तरह इनमें उतरते हैं तो आप अनुभव करते हैं कि ये कविताएँ एक भारतीय नागरिक की सांस्कृतिक जिज्ञासा से उद्भूत हुई हैं और मनोदशा के वैविध्य के बावजूद कवि की अर्जित चेतना और सृजन-स्वभाव की छवियाँ हैं. यतीन्द्र में संस्कृति को लेकर जो एक राग है या फिर  रागों की संस्कृति से जो गहरा लगाव है वह संग्रह के हर अध्याय में जगत और जीवन को समझने के दृष्टिकोण की तरह उपस्थित है.
अगर टूटने-छूटने की पीड़ा से प्राणित गहरी संवेदना न हो तो कोई भी रस, कैसा भी सौंदर्य कविता में आयत्तीकृत नहीं हो पाता. संस्कृति के अवयव दुःखों  के गर्भ से ही जन्म लेते रहे हैं. आदि मानव के मन में तड़प न होती  आवाज़ें संगीत में नहीं बदलतीं, कुछ छूटने का दर्द न होता तो वे पत्थरों पर कलात्मक लकीरें न खींचने जाते, और न ही ध्वनियों से शब्द गढ़े जाते और कविता सम्भव होती. दुःखों को समझने  की प्रक्रिया में सम्भव हुई संस्कृति दुःख, एकाकीपन और असहायता की घड़ी में एक आश्वस्ति-घर है. वह है तो मनुष्य मनस्तापों को झेल पाता है. इस संग्रह में संस्कृति के विभिन्न अवयवों का आत्मीय साक्षात्कार है. कोई बाहर से देखे तो निरा उत्सव लग सकता है मगर जब आप इनमें उतरते हैं तो महसूस होता है कि पंढरपुर, रघुराजपुर और चिदम्बरम स्थान होते हुए भी स्थूल से अधिक सूक्ष्म स्थान हैं जिन्हें देखते हुए आप स्थान से अधिक उस दर्शन को देखते हैं जो ज्ञान  के लोक और लोक के ज्ञान में ओझल रहता है. कवि अपनी स्थान-विषयक अधिकांश कविताओं में एक गहरी संलग्नता के साथ देखता दिखता है और जो है उसके उत्सव के बीच जो खो चुका उसका शोक कथा-शेष ‘तिलोदकी गंगा’ की तरह बहता है.
शौर्य गाथाओं का इतिहास
पड़ जाता धूमिल समय के दर्पण में
बचा रह जाता मात्र विस्मृत कथाओं का
एक छोटा सा झरोखा
जैसे कि गरुड़, जैसे कि हम्पी

जो हुआ और जो है कवि तक आते तो अवश्य हैं मगर कविता में बिल्कुल वैसे नहीं . ख्यात आलोचक नंदकिशोर नवल कहते थे  कि रचनाकार इतिहास को भी लिखता है तो ‘निज मन मुकुर सुधार’. इस  संग्रह की  रचनाओं में भी मिथक और इतिहास के प्रसंग बार-बार आते हैं किन्तु जो दिखते हैं वे कवि के मन-मुकुर से प्रक्षेपित प्रतिबिम्ब हैं. उदाहरण के लिए ‘मांडू’ शीर्षक कविता देखी जा सकती है जिसमें संगीत और उसकी शास्त्रीयता से सुपरिचित यतीन्द्र उसकी संगीत-रची आत्मा को शास्त्रीय शब्दावली में व्यक्त करते हैं —
विलासखानी तोड़ी के स्वर पर
बहती चली आती एक प्रेम कहानी
……
धड़कता रहा एक शहर बंदिशों के बनने
रागमालिका के व्याकरण चढ़ने में
……
आती रही प्रेम में डूबी पुकार
जैसे विलासखानी तोड़ी भूलकर
कोई गा रहा हो गोरख कल्याण.

संगीत संवेद्य होता है. उसे आप भाषा में नहीं कह सकते. शास्त्रीय राग तो और भी कठिन, मुझ जैसों के लिए तो मानो गूँगे का गुड़, मगर संग्रह  की कविता ‘गुर्जर तोड़ी’ पढ़ते हुए ये संकेत मिले कि  रागों का जो स्थायी महत्त्व है वह जितनी उनकी रंजकता की वजह से है उससे अधिक उनसे फूटनेवाली धूप और बारिश की वजह से. एक सूक्ष्म संसार की ऋतुएँ आपको जीवन और जगत के अवयवों से  से नये ढंग से जोड़ती हैं और आपके भीतर अच्छे भावों का परिवार बस जाता है.
यह राग हमें बताता है
कि हम अब भी विश्वास कर सकते हैं
रिश्तों की डोर से बँधी इस दुनिया पर.

गुर्जर तोड़ी के बारे में सोचते हुए जब आप आगे बढ़ते हैं तो संग्रह में आपकी मुलाक़ात उस फाग से होती है जो मतमज़दा निजामुद्दीन की मुलाक़ात वसंत के रंग और स्वर से करवाता है और सूफ़ी और लोक धाराओं को जोड़ते हुए सम्बन्ध और उम्मीद का एक विश्वसनीय विकल्प रचता है. कविता यूँ भी रचती है प्रतिरोध, बिना किसी शोर-शराबे के.
यह कवि की यात्रा है, सुरों की डगर पर चलते  कवि की जिसे ‘एक धुन की खातिर इतिहास के पास जाना रोमांचित करता है’ और दुःख से भर जाता है जब ‘टप्पा को खो जाने का इतिहास रचता देखता है.’ डूबती आवाज़ों और छीजती कशिश  से विह्वल कवि क्यों न पूछे – क्या सुर की कोई स्थायी वेदना होती है ? शास्त्रीय गायकी को लेकर काफ़ी कुछ है संग्रह में जिन्हें पढ़ते हुए ‘पान  से लगे ज़र्दे से भीगे हुए गले की ख़राश वाली आवाज़’  आपके भीतर उतरती है ‘कुछ तीखेपन’ के साथ. रागों के रसिया यतीन्द्र कई बार आवाज़ों में बसे रागों  को इतनी  आत्मीयता से आवाज़ देते हैं कि उनका न सिर्फ़ मानवीकरण होता है बल्कि एक पड़ोसीपन और आत्मीयता भी स्थापित होता है:
रात के अंतिम प्रहर एक राग
अपने साम्राज्य के वितर में डूबा देता आमंत्रण
जैसे कह रहा है – आओ पधारो
हम अपना जाजिम समेटें
भटियार रामकली और अहीर भैरव के आने का मुहूर्त चढ़ आया है

हम आरोह के शुद्ध गान्धार की सीढ़ियाँ चढ़ें
उतरते कोमल गान्धार का सहारा लेकर
धरती के बिछावन पर पसर जाएँ

विस्मय तब भी होता है जब कवि राग को रंग से पहचानता है. राग बसन्त पर लिखा यह अंश देखा जा सकता है  –
इस जोगिया रंग में कुछ और मिला है
खुसरो की पीली सरसों वाला
वारिसशाह के चुनाव का नीला  (चिनाब?????
बसंती में थोड़े हरे की आहट
बौर की डाली पर बिछलता भूरे का स्पर्श…

आगे बढ़ने पर सुर की वेदना से भीगे कवि को आप स्याही बनाने का नुस्खा समझते देख सकते हैं. कवि दावात में अंधेरी रात, जोगन के आँसुओं का बहता काजल और सोना, लाजवर्त, गोंद और कीकर जैसे प्राचीन मसिवर्धन चाहता है. वह न सिर्फ़ गुरुग्रंथ साहिब से नीर को अक्षर बनाने को नसीहत पाना चाहता है बल्कि मुहब्बत की दास्तान हो गए किरदारों की नीली उदासी भी. बेहद ख़ूबसूरत यह कविता तलाश की कोशिश और तड़प के साथ-साथ एक सूफ़ियाना निराशा पर ख़त्म होती है –
हज़ार तरीकों से गुज़रता है रोशनाई का रास्ता
स्याही बनाने का नुस्ख़ा फिर भी कहाँ हाथ आता!

आगे के पृष्ठ पर कवि की सूफ़ियाना उदासी साज़ों से बतकही करती दिखती है. वह हमें सरंगी की पीड़ा, बंजारों  की यातना सुनाता इकतारा और व्याकरण से बँधे तबले के दुःख से मिलवाते हुए हमारी  दैनिक दुनिया में पहुँचा देता है –
साज़ों से बतकही करते रहना चाहिए
इनमें से कौन कब विदा हो जाये
वसंत खेलने फाग रंगने के लिए
उनसे मिलना फिर सम्भव ही न हो !

यूँ तो यह संग्रह हमें संस्कृति की करुण अंतर्यात्रा और अंतस् की सांस्कृतिक यात्रा पर ले जाता दिखता है मगर ‘हमारा पंचतंत्र’ ‘एक दिन चोर आएगा’ और ‘मछली और काँटा ‘ जैसी कविताओं में समाज की निष्करुण चालाकियों से भी मिलवाता है. उचित भी है क्योंकि करुणा के पक्ष में खड़ा होना एक सतर्क और साहसिक चयन है. इस सतर्कता और साहस की जड़ में सभ्यता में व्याप्त संताप और वह शोक होता है जी जंगली नदी की तरह हमारे भीतर बहता-सूखता रहता है:
मैं लिखता हूँ कविता जंगली नदी की नमी पर
पर न जाने क्यों बात वहाँ से होती हुई
जीवन की कमी पर होती शुरू

या फिर
धीरे-धीरे स्मरण ही बचते हैं
आत्मीय दिन छूट जाया करते हैं

और इसी मूड में यतीन्द्र सहगल का स्मरण करते हैं, उनके हारमोनियम के बहाने. यह हारमोनियम कभी एक रहल है जिन पर द दुःख के गीत पढ़े गए तो कभी एक जीवित डायरी शहरों और उनके मौसमों को दर्ज करती हुई और कभी कला के सम्भव होने का एक रूपक :
वैसे तो यह एक हारमोनियम भर है
जिसे सारंगी की पेटी की
साधारण सी दुनिया से निकालकर
रेमिंग्टन कम्पनी का एक अदना सा कर्मचारी
कुंदनलाल सहगल के हाथों खेला जाने वाला बजा बना देता है

और जब हम संग्रह के अंतिम पड़ाव पर पहुंचते हैं तो कवि का क्रौंच स्वर बिलख उठता है. शोक एक कठोर अनिवार्य सत्य है. इसकी मर्मांतक चोट से कोई व्यक्ति बच नहीं सकता फिर भी इस घड़ी में द्रष्टा और भोक्ता का अंतर साफ दिखाई देता है. समानुभूति की भी एक सीमा होती है. हम समझ तो सकते हैं मगर उस पीड़ा को महसूस नहीं कर सकते. हम यह कैसे महसूस कर सकते हैं कि ‘शोक उदास बहती नदी में इत्र की शीशी-सा खुलकर बह-बिखर भी सकता है.’
यहाँ शोक का भोक्ता एक वयस्क पुत्र है, इसलिए  शोक की मर्मांतक उपस्थिति का अस्वीकार तो है मगर दु:ख क्रोध में प्रक्षेपित नहीं हो रहा.  लेकिन संवेदनशील कवि शोक मनोविज्ञान के तीसरे स्टेज बारगेनिंग से कैसे बच सकता था. इस स्टेज में व्यक्ति उच्चतर शक्ति से परिस्थिति को बदलने के लिए निगोशीएट करता है. यतीन्द्र यह काम कविता में करते हैं. उनका ईश्वर यहीं बसता है. अम्मा के लिए उनके प्रिय फल जामुन और अमरूद  लिए यहीं खड़ा रहा जा सकता था और सोने की बिछिया यहीं दमक सकती थी. लेकिन यह निगोशीएशन कब तक ? उदासी को उतरना ही था मन के पानी में. कोई कुछ भी कर ले, रुक ही नहीं सकती वह. घेर लेती है ‘गाढ़े नीले  समुद्र’ की तरह, बिखेर देती है ‘खुशियों की अधबनी माला के मनकों की तरह’.
हौले-हौले उदासी विवेक को जन्म देती है और विवेक हुए को स्वीकारने के साहस को. मोर्निंग की प्रक्रिया में  रुदन तो है ही, हो चुके को सच मानने की आत्म-समझाइश भी है और सुंदर स्मृतियों को आहूत करते हुए तड़प से तर्पण भी. यहाँ कवि ‘माँ के न होने के बीहड़ सच में स्वयं को ढूँढ’ भी रहा है, अपने भीतर के शिशु-भाव से माँ को पुकार भी रहा है और एक निर्गुण आलोक का साक्षात्कार भी कर रहा है –
चंद्रमा को लगा हुआ महावर
जैसे अपनी गुलाबी रोशनी से
मेरी नींद का दरवाज़ा हर रात खटखटाता हो

इन
और यह जो चाँदी जैसा रात भर चमकता है
उसमें कोई जादूगरनी अपनी तकली पर
मेरे आनंद का सूत कातती है लगातार

लेकिन यह शृंखला आत्म-निवेदन की जगह एक सब्लाइम जेनेरलाइजेशन पर पर खत्म होती है. इस खंड और इस संग्रह की अंतिम कविता में कवि दु:ख-जनित भाव ही नहीं मानव सभ्यता का स्वभाव बोल रहा है –
भीतर के दु:ख का घराना बनाओ
हो सके तो पीड़ा को ठुमरी में गाओ

….
हो सके तो बचाओ भीतर रिसते दुख को
भले ही उसे ठुमरी के नये चलन में गाओ

आख़िरी बात, ऐसा कम होता है कि किसी कवि को पढ़ते हुए आप उसका पता-ठिकाना बूझ लें. यतीन्द्र मिश्र का यह संग्रह अपनी अंतर्वस्तु से यह बताता है कि कवि उस अयोध्या का है जो रामकथा का मूल मंच है. यहाँ अयोध्या की कई अंतरंग छवियाँ और उनके निहितार्थ हैं. वह अपने पाठक को सरयू के बहाव से ही नहीं उस तिलोदकी गंगा से भी मिलवाता है जो न पृथ्वी पर है न आम लोगों के संज्ञान में.
संग्रह में प्रूफ की कुछ भूलें हैं. आशा है अगला संस्करण निर्दोष होगा. के जी सुब्रमण्यम की पेंटिंग से बना कवर सुंदर और अर्थपूर्ण है, मगर उभरा हुआ रजत-रंगी टाइटल संग्रह की गरिमा से मैच नहीं करता.
***
समीक्ष्य पुस्तक: बिना कलिंग विजय के
रचनाकार: यतीन्द्र मिश्र
भाषा: हिंदी
विधा: कविता
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: 168
कीमत: 399 रुपये
* समीक्षक विनय कुमार जाने-माने नाटककार, कवि, कलाविद और मनोचिकित्सक हैं.



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