नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों ही इमरजेंसी की ही उपज हैं. दोनों ही छात्र राजनीति से चुनावी राजनीति में आये, और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के बावजूद बीच-बीच में एक-दूसरे के मददगार भी बने रहे हैं.

बीते तीन दशक से भी कुछ ज्यादा ही हो चुके हैं, बिहार की राजनीति दोनों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. चारा घोटाले के कारण लालू यादव की राजनीति राबड़ी देवी से होते हुए तेजस्वी यादव तक पहुंच चुकी है, लेकिन नीतीश कुमार अब भी अपनी जगह बने हुए हैं.

दिल्ली से पटना पहुंचकर जबसे नीतीश कुमार ने बिहार में डेरा डाला, तब से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जमे हुए हैं. और, अपनी कुर्सी कायम रखने के लिए वो बारी-बारी बीजेपी और लालू यादव का अपने हिसाब से इस्तेमाल भी करते रहे हैं.

जब महागठबंधन छोड़कर नीतीश कुमार एनडीए में लौट आये थे, तो लालू परिवार की ओर से कहा जाने लगा था कि उनके लिए वापसी के रास्ते बंद हो चुके हैं. ठीक वैसे ही जब 2022 में नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर फिर से लालू यादव के पास पहुंच गये, बीजेपी नेता अमित शाह ने बिहार की रैली में ही बोल दिया था, नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं.

लेकिन, नीतीश कुमार ने ऐसी परिस्थितियां बना डाली कि बीजेपी को लोकसभा चुनाव से पहले ही उनके लिए दरवाजे खोलने पड़े. अभी तो हालत ये है कि केंद्र की बीजेपी सरकार के लिए वो बैसाखी बने हुए हैं.
पहले तो तेजस्वी यादव भी नीतीश कुमार को लेकर संभल कर बोलते रहे, लेकिन कुछ दिनों से लहजा बदलता हुआ लग रहा है. बिहार चुनाव भी नजदीक आ रहा है.

जब कोई लेने को तैयार नहीं होता, तब नीतीश कुमार रास्ता बना लेते हैं

नीतीश कुमार और लालू यादव की दोस्ती-दुश्मनी का सिलसिला अलग अलग रूपों में देखने को मिलता रहा है. बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को घेरते हुए भी नीतीश कुमार उनको अपने भाई जैसे दोस्त का बेटा बताते हैं.

इसी साल एक इंटरव्यू में लालू यादव का कहना था, नीतीश के लिए हमारा दरवाजा तो खुला है, नीतीश को भी खोलकर रखना चाहिए… नीतीश आते हैं तो साथ काहे नहीं लेंगे? ले लेंगे साथ… नीतीश कुमार भाग जाते हैं, हम माफ कर देंगे.

लालू यादव के इस बयान से पहले भी तेजस्वी यादव कहा करते थे कि नीतीश कुमार के लिए आरजेडी के रास्ते बंद हो चुके हैं. और, तेजस्वी यादव ये बात फिर से दोहरा रहे हैं.

नीतीश कुमार की वापसी को लेकर हाल में एक इंटरव्यू में तेजस्वी यादव ने कहा है, कभी नहीं… मेरे पिता हैं, मैं जानता हूं… किसी की एक गलती के बाद उसे माफ कर देना ठीक है, लेकिन अब उन्होंने वही गलती दो बार की है… तो उनकी माफी बनती नहीं… अब नीतीश कुमार जहां भी जाएंगे, सिर्फ अतिरिक्त बोझ बनकर रह जाएंगे.

लालू यादव एक बार फिर आरजेडी के अध्यक्ष चुन लिये गये हैं. अंतिम फैसला तो वही लेंगे. और, जब सामने फायदा दिखे तो क्या तेजस्वी यादव मना कर पाएंगे – नीतीश कुमार इसी बात का तो फायदा उठाते हैं, हमेशा.

नीतीश कुमार राजनीति के जादूगर हैं

नीतीश कुमार जब से एनडीए में लौटे हैं, शायद ही ऐसा कोई मौका हो जब वो एक बात दोहराना भूल पाते हों, ‘अब कहीं नहीं जाएंगे… चले गये थे, गलती हो गई थी. अब गलती नहीं करेंगे.’

नीतीश कुमार के एक हुनर के आगे सियासत के सारे ही दांवपेच हल्के पड़ जाते हैं, और जब भी उनको जरूरत पड़ती है, पूरा फायदा उठा लेते हैं.

रामविलास पासवान अगर राजनीति के मौसम वैज्ञानिक थे, तो नीतीश कुमार राजनीति के जादूगर हैं. जब भी वो अपना जादू दिखाते हैं, सामने वाला सम्मोहित हो जाता है. फौरन झांसे में आ जाता है. ऐसा बीजेपी के साथ भी हुआ है, और आरजेडी के साथ भी. और सिर्फ एक बार नहीं, दो दो बार हुआ है – और ऐसा फिर नहीं होगा, कोई इस बात की गारंटी भी नहीं ले सकता.

जब लोगों को लगता है कि नीतीश कुमार पूरी तरह चूक गये हैं, तभी नीतीश कुमार किसी न किसी तरह जादू दिखा देते हैं.

तेजस्वी यादव को भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर इस्तीफा दिलाना चाहते थे, नहीं हुआ तो आरजेडी छोड़ दिये. फिर जाति जनगणना के नाम पर ऐसा माहौल बनाया कि लालू यादव फिर से झांसे में आ गये. धीरे धीरे कांग्रेस तक को पाले में कर लिये, और इंडिया ब्लॉक बना डाला – और जब देखा कि कोई बात नहीं सुन रहा है तो एक झटके में छोड़ कर अलग हो गये.

तब भी कहीं नहीं जाने की बात कर रहे थे, ऐसा भी कोई संकेत नहीं देते थे कि वो पाला बदलेंगे, लेकिन जब जरूरत महसूस हुई तो बदल भी लिये.

जैसे तेजस्वी यादव से रीकनेक्ट होने के लिए जाति जनगणना का जुगाड़ खोजा था, अब अपने ही साथी ललन सिंह पर तोहमत मढ़ डाली है. कहते हैं, ललन सिंह के ही कहने पर एनडीए छोड़कर महागठबंधन में गये, और ललन सिंह के ही कहने पर महागठबंधन छोड़कर एनडीए में लौट गये.

मतलब, लालू यादव को भी मैसेज दे चुके हैं कि वो तो ललन सिंह के कारण महागठबंधन छोड़े थे, फिर दरवाजा कैसे बंद किया जा सकता है?



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