बर्बाद करने के बाद अब ईरान को आबाद करेगा अमेरिका? ट्रंप से मुआवजे की रकम निकलवाना खामेनेई के लिए कितना मुश्किल – Iran says it will go to un for compensation from America after its nuclear sites are destroyed in us israel attack ntcprk


ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतिबजादेह ने कहा है कि उनका देश अपने परमाणु संयंत्रों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए संयुक्त राष्ट्र जाएगा. उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमले में ईरान के परमाणु संयंत्रों को भारी नुकसान हुआ है जिसके लिए अमेरिका को मुआवजा देना होगा और इसके लिए ईरान अंतरराष्ट्रीय संगठन का सहारा लेगा.
इससे पहले बुधवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से स्वीकार किया था कि अमेरिका के हमले में ईरान के तीन परमाणु संयंत्रों नतांज, फोर्डो और इस्फहान को भारी नुकसान पहुंचा है. ईरान अब चाहता है कि अमेरिका इस नुकसान की भरपाई करे. लेकिन क्या अमेरिका से मुआवजे का पैसा निकलवा पाना इतना आसान है और क्या कोई देश युद्ध के बाद दुश्मन देश से मुआवजे की मांग कर सकता है? आइए जानते हैं-

युद्ध के बाद दुश्मन देश से मुआवजे की मांग की जा सकती है?

अगर युद्ध की वजह से किसी देश को भारी नुकसान होता है और वो देश अगर यह साबित कर पाता है कि उस पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए हमला किया गया था तो वह देश दुश्मन देश से मुआवजे की मांग कर सकता है.

यह मांग अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधियों से जरिए से की जा सकती है. युद्ध के दौरान हुए नुकसान की जिम्मेदारी तय करने और मुआवजे की मांग करने में संयुक्त राष्ट्र चार्टर और जिनेवा कन्वेंशन जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून मदद करते हैं.

ईरान की बात करें तो, ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में साफ कहा है कि उसके परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले अवैध हैं और इससे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हुआ है.

अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार मुआवजे की मांग का कानूनी आधार क्या है?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2 (4) सभी देशों को एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करने का निर्देश देता है. लेकिन अगर कोई देश इस नियम का उल्लंघन करता है तो पीड़ित देश अवैध हमले के एवज में मुआवजे की मांग कर सकता है.

ईरान यूएन के सुरक्षा परिषद में मुआवजे की मांग के लिए शिकायत दर्ज कर सकता है. हालांकि, उसके लिए सुरक्षा परिषद में जाकर मुआवजा हासिल करना मुश्किल होने वाला है क्योंकि परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) को वीटो का अधिकार है और चीन रूस को छोड़कर बाकी तीनों देश ईरान के मुआवजे वाले किसी भी प्रस्ताव को पास नहीं होने देंगे.

इसके अलावा देश दुश्मन देश से मुआवजे की मांग के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court Of Justice) का रुख भी कर सकते हैं. इंटरनेशनल कोर्ट के पास मुआवजे से संबंधित मामलों में फैसले सुनाने का अधिकार है.

लेकिन यहां भी ईरान को दिक्कत होगी क्योंकि यहां मामला दायर करने के लिए दोनों पक्षों का सहमत होना जरूरी है. दूसरी बात ये कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता. ईरान अगर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट जाता है और उसके मामले को स्वीकार कर लिया जाता है तब भी उसे मुआवजे का पैसा मिलने में काफी दांव-पेंच झेलना पड़ सकता है.

पीड़ित देश जिनेवा कन्वेंशन और हेग कन्वेंशन के आधार पर भी मुआवजे की मांग कर सकते हैं. इन कन्वेंशन के तहत कोई भी देश गैरकानूनी हमले की वजह से नागरिकों और इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान के बदले में मुआवजे की मांग कर सकता है.

ईरान को मुआवजे की रकम पाने के लिए क्या साबित करना होगा?

इजरायल ने ईरान पर यह आरोप लगाकर हमला किया कि ईरान परमाणु बम बना रहा है जो उसके अस्तित्व के लिए खतरा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी यही दावा करते हुए ईरान के फोर्डो, नतांज और इस्फहान परमाणु संयंत्रों को निशाना बनाया था. ऐसे में ईरान के लिए यह साबित करना मुश्किल हो सकता है कि इजरायल और अमेरिका के हमले गैरकानूनी थे और इनसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हुआ है.

ईरान का परमाणु कार्यक्रम पहले से ही विवादित रहा है और ईरान के अलावा कोई भी गैर-परमाणु संपन्न देश ऐसा नहीं है जिसने अपना यूरेनियम संवर्धन 60% तक बढ़ा लिया हो. ऐसे में ईरान को इस मामले में अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलना भी मुश्किल हो सकता है.

किन देशों को मिला है युद्ध का मुआवजा

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने भारी तबाही मचाई. इस तबाही के लिए युद्ध के बाद जर्मनी को मित्र देशों जिसमें इजरायल, पोलैंड, ग्रीस और युगोस्लाविया जैसे देश शामिल थे, उन्हें मुआवजा देना पड़ा था. पोलैंड और जर्मनी के बीच अब भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए नुकसान को लेकर विवाद चल रहा है.

पोलैंड का कहना है कि जर्मनी ने उसे पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया. पिछले साल पोलैंड के विदेश मंत्री रेडोस्लाव सिकोर्स्की ने कहा था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी सेना ने उनके देश को जो नुकसान पहुंचाया था उसके बदले में जर्मनी को और अधिक वित्तीय मदद देनी चाहिए.

इराक कुवैत युद्ध (1990-91) के दौरान भी मुआवजे का उदारण देखने को मिलता है. इराक के कुवैत पर आक्रमण के बाद संयुक्त राष्ट्र ने यूएन मुआवजा आयोग (UNCC) बनाया था. इस आयोग के नियमों के तहत ईराक ने कुवैत और अन्य प्रभावित देशों को अरबों डॉलर का मुआवजा दिया था.



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