दिल्ली की एक सोसायटी में रहने वाले 65 वर्षीय सुरेश चावला (बदला हुआ नाम) बैंक से सेवानिवृत हैं. अपनी पत्नी को फिजियोथिरेपी कराने वो हर दिन करीब 7 किलोमीटर दूर अस्पताल जाते हैं. अपने रिटायरमेंट से 4 साल पहले उन्होंने डीजल वाली डिजायर खरीदी थी. फिलहाल अब उनके सामने मुश्किल है कि हर दिन वो कैब का खर्च वहन करें. क्योंकि उनकी कार कभी भी दिल्ली सरकार जब्त करके स्क्रैप यानी कबाड़ के लिए भेज सकती है.

चावला जी की कार अभी तक केवल 7000 किलोमीटर चली है. उसमें से भी ज्‍यादातर पत्‍नी के बीमार होने के बाद. बच्चे विदेश में सैटल हैं. ऐसे में उनके सामने मुश्किल यह है कि बैंक उन्हें अब कार लोन देगी नहीं और सरकार उन्हें उनकी कार को उसकी 10 साल की उम्र पार करने के बाद चलने नहीं देगी. ऐसी दशा में अब वो पंगु हो गए हैं. चावला साहब कहते हैं कि कार के बिना दिल्ली में अब अपने को बेकार समझता हूं. यह दिल्ली एनसीआर में रहने वाले लाखों लोगों की कहानी है.

बहुत से लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे? तो बहुत से छोटे काम करने वाले लोग जो पुरानी इको जैसी गाड़ियां रखे हुए हैं जिसका इस्तेमाल वो कई तरह से करते रहे हैं उनके सामने तुरंत नई गाड़ी खरीदने का दबाव हो गया है. दरअसल कोर्ट और एनजीटी ने तो बहुत पहले 2015 में ही आदेश दे दिया था कि दिल्ली एनसीआर में 10 साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल के वाहन नहीं चलेंगे. पर कड़ाई न होने के चलते लाखों गाड़ियां अभी भी चल रही थीं.

जाहिर है कि जब से दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार ने ऐसे गाड़ियों को सड़क से हटाने का प्लान बनाया है तब से तमाम बीजेपी समर्थकों ने ही सरकार का विरोध शुरू कर दिया है. सोशल मीडिया साइट एक्स पर तमाम ऐसे बीजेपी समर्थक हैंडल्स हैं जिन्होंने रेखा सरकार के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है.

भारतीय जनता पार्टी की कट्टर समर्थक कल्पना श्रीवास्तव अपने वॉल पर लिखती हैं, कि दिल्ली सरकार का यह फैसला 10 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों और 15 साल पुरानी डीजल गाड़ियों को पेट्रोल पंप पर तेल देने से मना करना सिर्फ एक जल्दबाजी का कदम नहीं, बल्कि आम आदमी के साथ अन्याय है भी है. उनका कहना है कि अगर 62 लाख गाड़ियों की ‘आयु’ समाप्त हो गई है, तो सरकार उन्हें एक साथ सीज क्यों नहीं कर रही? जवाब साफ है सरकार के पास न तो संसाधन हैं और न ही योजना!

दिल्ली ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट की 2022 की नोटिस कहती है कि पुरानी गाड़ियां प्रदूषण बढ़ाती हैं, लेकिन क्या कोई ठोस डेटा है कि 10 साल की आयु ही प्रदूषण का पैमाना होनी चाहिए? यूरोपियन अध्ययनों (जैसे ScienceDirect, 2023) का हवाला देते हुए वो कहती हैं कि वाहन की माइलेज और रखरखाव प्रदूषण का असली कारण है, न कि उम्र. मेरी गाड़ी 2020 की है, 15,000 किमी ही चली है क्या उसे स्क्रैप कर देना चाहिए?

कल्पना श्रीवास्तव पूछती हैं कि  सीएनजी किट या इलेक्ट्रिक कन्वर्जन जैसे विकल्प क्यों नहीं दिए जा रहे हैं? IOAGPL की रिपोर्ट (2024) कहती है कि 10 साल से नई गाड़ियों में सीएनजी किट लगाने की लागत 50,000-70,000 रुपये है, जो मध्यम वर्ग के लिए किफायती है. सरकार सब्सिडी दे तो लाखों लोग अपनाएं, प्रदूषण भी कम हो, और गाड़ी भी बचे.

श्रीवास्तव लिखती हैं कि स्क्रैप डीलर्स और सेकंड हैंड मार्केट को फायदा पहुंचाने की साजिश साफ दिखती है. Cero Recycling जैसे संगठन 2030 तक 300 मिलियन टन स्टील रिसाइकिल करना चाहते हैं क्या यह पॉलिसी उनके लिए ट्रायल बॉलून है? मध्यम वर्ग की गाढ़ी कमाई पर डाका डालना कहां का इंसाफ है?

कल्पना कहती हैं कि 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन याद करें लोग सड़कों पर आए और सरकार को झुकना पड़ा. अगर 62 लाख गाड़ी मालिक एकजुट हो जाएं, तो यह पॉलिसी हफ्ते भर में वापस हो सकती है. दिल्ली के मिडिल क्लास को अब जागना होगा!श्रीवास्तव सवाल पूछती हैं कि दोस्तों, हमारी मेहनत से खरीदी गाड़ी को सिर्फ ‘उम्र’ के नाम पर मारना कहां का न्याय है? क्या हमारी आवाज दबा दी जाएगी? नहीं!  सवाल यह है कि क्या दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अनदेखा कर सकती है? क्या सरकार कोई अन्य उपाय नहीं कर सकती है?

भारत में ऑटोमोबाइल उद्योग अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो जीडीपी में 7.1% का योगदान देता है और 3.7 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है. हाल के वर्षों में ऑटोमोबाइल सेक्टर इतना मजबूत हुआ है कि वह सरकार से अपनी मांगों को पूरी करवाने और अपने फायदे के लिए नीतियां बनवा सकता है.

यही कारण है कि सरकार की नीतियों और ऑटो लॉबी (जैसे सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स, SIAM) के बीच संबंधों पर सवाल उठ रहे हैं. विशेष रूप से पर्यावरण नियमों, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) नीतियों, और पुराने वाहनों पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर. कुछ लोग दावा करते हैं कि सरकार ऑटो लॉबी के दबाव में काम कर रही है. दरअसल आंकड़े बताते हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर की सेल लगातार घट रही है. इसलिए लोगों को लगता है कि कहीं सरकार का यह कदम कार कंपनियों के दबाव में तो नहीं है.

ऑटो लॉबी, विशेष रूप से SIAM, भारत में ऑटोमोबाइल उद्योग का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, महिंद्रा, और हुंडई जैसी कंपनियां शामिल हैं. ये कंपनियां नीतियों को प्रभावित करने के लिए सरकार के साथ नियमित चर्चा करती हैं. उदाहरण के लिए, 2025 में सरकार ने कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE) नियमों के तहत 2027 तक कार्बन उत्सर्जन को 33% कम करने का प्रस्ताव रखा, जिसे SIAM ने अति आक्रामक बताकर 15% कटौती का सुझाव दिया. इसलिए एक्स पर एक हैंडल ने लिखा कि आज सरकार गाड़ियों की आयु तय कर रही है — नाम पर्यावरण का, खेल सिर्फ़ ऑटो माफिया का है. इसी तरह एक  हैंडल ने लिखा कि सरकार को ऑटोमोबाइल लॉबी और ऐप-बेस्ड टैक्सी लॉबी ने खरीद लिया है.

भारत में आज भी कार को विकसित देशों में कार को विकसित देशों की तरह उपयोगिता के रूप में नहीं देखा जाता है.यहां अभी भी काफी हद तक लक्जरी और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी हुई है. यही कारण है कि छोटी कारें यहां सक्सेस नहीं हुई. टाटा नैनो के फ्लॉप होने का यही कारण रहा. 2025 में, भारत में प्रति 1,000 लोगों पर केवल 26 कारें थीं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 800 से अधिक है. मारुति सुजुकी की बिक्री और टाटा मोटर्स की इलेक्ट्रिक वाहन (EV) रणनीति दर्शाती हैं कि कारें मध्यम वर्ग के लिए उपलब्ध हो रही हैं, लेकिन अधिकांश भारतीयों के लिए यह अभी भी लक्जरी है.

10-15 साल पुरानी गाड़ी को बैन करना मध्यम वर्ग की जेब पर हमला है. कार खरीदने के लिए लोग अक्सर कर्ज लेते हैं, और यह उनके जीवन की सबसे बड़ी निवेशों में से एक होती है.हमारी संस्कृति में पुरानी चीजों को सहेजने की आदत है, फिर चाहे वह गाड़ी हो या कपड़े.
पुरानी गाड़ियों पर प्रतिबंध मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग को नई गाड़ियां खरीदने के लिए मजबूर करता है, जो महंगाई (2024 में 5-6%) और कर्ज के बोझ में और इजाफा करता है.

एक और हिंदुत्व समर्थक हैंडल लिखते हैं कि एक तरफ सरकार मानती है कि भारत इतना भूखा नंगा देश है कि यहां 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज नहीं दोगे तो पूरा नहीं पड़ेगा.वहीं दूसरी तरफ वो यहां के लोगों को इतना अमीर भी मानती है कि ये लोग हर दस साल में एक नई गाड़ी ले सकते हैं.

मोदी सरकार के कट्टर समर्थक एक हैंडल ने लिखा है कि आज सरकार गाड़ियों की आयु तय कर रही है, कल आपके घर में फ्रिज, एसी और कंप्यूटर की आयु तय करेगी. …विज्ञान और शोध का हवाला दे कर, गाड़ी का प्रदूषण चेक कर के कार्य करने की जगह कार की आयु तय कर रहे हैं. हैंडल आगे लिखता है कि सड़क और पुल की आयु चेक नहीं करते? जो बनते ही छेद हो जा रही है? बिजली दस बार कटेगी दिन में, ताकि इन्वर्टर और बैटरी वालों का उद्योग बढ़ता रहे.

यही हैंडल अपने एक अन्य ट्वीट में लिखता है कि यमुना साफ नहीं हुई, बारिशों में सड़कों पर पानी भर जाता है, नाले साफ नहीं होते, कूड़े के पहाड़ लगे हुए हैं, घरों में गंदा पानी आता है, स्कूलों में टीचर्स नहीं आते और इन सब समस्याओं का उपाय है कि आप पुरानी गाड़ी न चलाएं.

जाहिर है कि सरकार के खिलाफ जब अपने ही लोग लिखने लगें तो समझिए कि कहीं न कहीं सरकार से कुछ गलती हो रही है. बात भी सही है आखिर 50 से 60 साल पुराने फाइटर प्लेन चल सकते हैं, 30 साल पुराने यात्री विमान चल सकते है पर तो फिर किस आधार पर दस साल पुरानी कारों को सड़क से हटाया जा सकता है? अगर विमानों को फिटनेस सर्टिफिकेट मिल सकता है तो कारों को क्यों नहीं.



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