फ्रांस समेत ताकतवर देश भी रूस से खाते हैं खौफ, क्या यूक्रेन जंग के नतीजों से तय होगा यूरोप का अगला युद्ध? – anti russian sentiment in europe russophobia history and impact of ukraine war ntcpmj


कभी दुनिया की सबसे बड़ी और विकसित ताकतों में से एक यूरोप आजकल खुद को खतरे में पा रहा है. हाल में फ्रांस के लीडर इमैनुअल मैक्रों ने एलान किया कि बढ़ते जोखिम को देखते हुए देश आने वाले दो साल में सेना पर दोगुनी रकम खर्च करेगा. मैक्रों और कई यूरोपियन नेताओं के इस डर की वजह है- रूस. इसे रूसोफोबिया कहा जा रहा, यानी रूस-विरोधी भावनाएं. क्या ये डर खुद को राजनीति में बनाए रखने की जुगत है, या फिर वाकई सच्चा है?

रूस लंबे समय से अलग-थलग पड़ा हुआ है. ज्यादातर देश उसका खुलकर साथ देने से बचते हैं. जो साथी हैं, वे भी कमजोर हो चुके. सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि मॉस्को के खिलाफ सीधे वॉशिंगटन है. बीते कई सालों से यूक्रेन के साथ जंग की वजह से बची-खुची कसर भी पूरी हो गई. वो ग्लोबल बिरादरी से लगभग आउट हो गया. इसके बाद भी उसमें कुछ ऐसा है, जो बाकी देशों को डराता है. यूरोप के कई देश, अपना सैन्य बजट बढ़ा रहे हैं. इसमें से एक फ्रांस भी है.

हाल में फ्रेंच राष्ट्रपति मैक्रों ने अगले दो सालों के लिए डिफेंस खर्च लगभग दोगुना कर दिया. उन्हें डर है कि देश ने खुद को मजबूती नहीं दी तो रूस उसे कब्जे में ले लेगा. यूक्रेन युद्ध के बाद से मैक्रों ही नहीं, तमाम यूरोप यही कह रहा है. यहां तक कि जिन देशों ने अमेरिका की लाख झिकझिक के बाद भी नाटो के लिए बजट नहीं बढ़ाया था, वे यूक्रेन की स्थिति देखते हुए तुरंत राजी हो गए. नाटो में अतिरिक्त पैसे देने के अलावा देश निजी सैन्य ताकत भी बढ़ा रहे हैं.

फ्रांस के अध्यक्ष इमैनुएल मैक्रॉन (फोटो- एएफपी)
फ्रांस के लीडर इमैनुअल मैक्रों ने रूसी खतरे के हवाले से सैन्य बजट बढ़ा दिया. (Photo- AFP)

इस सबके पीछे रूसोफोबिया है. किसी भी फोबिया की तरह ये भी एक डर है, लेकिन किसी चीज या कल्पना से नहीं, बल्कि एक देश से. रूस से. रूसोफोबिया कोई नया टर्म नहीं, इसकी जड़ें 18वीं सदी से जुड़ी हैं, जब रूसी साम्राज्य यूरोप में एक उभरती ताकत था. ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों को लगता था कि रूस विस्तारवादी है और उनके हितों के लिए खतरा है. दिलचस्प बात ये है कि ये सारे देश खुद भी साम्राज्यवादी रहे और यहां-वहां कब्जा करते रहे. लेकिन चोर जैसे चोर की नस पहचानता है, वैसे ही इन यूरोपियन देशों को भी अंदाजा था कि रूस क्या कर सकता है.

20वीं सदी में रूस में राजशाही के खिलाफ भारी असंतोष था. इस दौरान व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया और रूस एक कम्युनिस्ट देश बन गया. इसके तुरंत बाद ही उसने कई पड़ोसी इलाकों, जैसे बेलारूस, यूक्रेन, जॉर्जिया और अर्मेनिया जैसे देशों को अपने साथ जोड़ लिया. इन सबको मिलाकर यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स यानी सोवियत संघ बना. ये बहुत बड़ी ताकत था.

यूरोप अब भी पूंजीवादी था, जबकि रूस का कम्युनिज्म तेजी से फैल रहा था. वैचारिक खतरा मौका मिलते ही सैन्य खतरा भी हो सकता था. दूसरे वर्ल्ड वॉर तक चीजें तब भी दबी रहीं लेकिन इसके बाद रूस और अमेरिका बिदककर दो कोनों में जा बैठे. दोनों के बीच जबरदस्त अविश्वास था. सोवियत संघ के टूटने के साथ ही शीत युद्ध भी खत्म हुआ और रूस कमजोर हो चुके राजा की तरह देखा जाने लगा.

रूसी सैन्य (फोटो- एपी)
रूसी सेना साल 2022 से यूक्रेन से जंग कर रही है. (Photo- AP)

यूरोप रूस को भूला बैठा था. यहां तक कि वो नाटो यानी सैन्य गठबंधन पर पैसे खर्च करने से भी बचता था. उसके लिए रूस अग्निशामक यंत्र की तरह था, जिसकी जरूरत शायद ही पड़े. लेकिन तभी साल 2022 में मॉस्को ने यूक्रेन में हमला बोल दिया. रूसोफोबिया दोबारा जागने लगा. यूरोप के साथ-साथ अमेरिका ने यूक्रेन को जिताने में सारा दम लगा दिया. लेकिन रूस अब भी टिका हुआ है.

यूरोप डरा हुआ है कि यूक्रेन से जंग जीतने के बाद रूस की आक्रामकता और बढ़ जाएगी. इसके बाद वो उन सारे देशों की तरफ बढ़ेगा, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके थे, जैसे पोलैंड, लिथुआनिया और एस्टोनिया. यूरोप के पूर्वी हिस्से में रूसी बोलने वाले लोग रहते हैं. यूरोप को डर है कि पुतिन इस भाषाई सेंटिमेंट का इस्तेमाल भी विस्तार के लिए कर सकते हैं. यही वजह है कि फ्रांस समेत यूरोप के ज्यादातर बड़े देश डरे हुए हैं.

फ्रेंच लीडर मैक्रों ने न केवल डिफेंस बजट बढ़ाया, बल्कि हाल में हुई नाटो बैठक में सभी ने तय किया कि वे जीडीपी का लगभग पांच फीसदी नाटो पर लगाएंगे. इसमें सैन्य ट्रेनिंग और हथियार खरीदी से लेकर साइबर सिक्योरिटी जैसे खतरों पर काम भी किया जाएगा. साथ ही अमेरिका से अलग भी यूरोप लगातार बातचीत में है कि वे एक अलग सैन्य स्ट्रक्चर भी बना सकें, ताकि अमेरिका के पीछे हटने की स्थिति में भी वे भरभरा न जाएं.

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