कभी जमाना था जब एक दास्तानगो को महज किस्सागो नहीं, बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी होना पड़ता था, बोलने-तलवार चलाने में निपुण तो वक्त-जरूरत पर उसे कभी सैनिक तो कभी राजदूत तक बनना पड़ता है. खैर, दास्तानगो दूत तो आज भी है. वह समाज और उसकी संस्कृति का वाहक है. सच का आईना है और समाज सुधारक भी है जो बैठा तो मंच पर है, लेकिन सोसायटी को उसी तख्त पर बैठकर ये इल्म भी देता है कि समाज खुद समझ सके, कि क्या सही है और क्या गलत.

ऐसी ही एक दास्तान है, दास्तान-ए-मंटोइयत. जिसका गवाह बना, मंडी हाउस में मौजूद LTG ऑडिटोरियम. “दास्तान-ए-मंटो” या “मंटोइयत” उर्दू साहित्य के बीसवीं सदी के सबसे सशक्त और विवादास्पद लेखक सआदत हसन मंटो की ज़िंदगी पर आधारित एक ऐसी असरदार कहानी प्रस्तुति है जो न सिर्फ दास्तानगोई के जरिए मंटो की ज़िंदगी को जीवंत करती है, बल्कि उस दौर को भी फिर से जिंदा कर देती है, जब समाज, राजनीति, सिनेमा, बंटवारा, और सच्चाई के साथ टकराव अपने चरम पर था.

मंटो की दास्तान में क्या है खास?
मंटो,  एक ऐसा नाम जिसने लेखन में ईमानदारी और समाज को आईना दिखाने की हिम्मत के मायने बदल दिए. उनकी लेखनी जितनी तीखी और बेबाक थी, उतनी ही नाटकीय और जटिल उनकी खुद की जिंदगी भी रही. मंटो के जीवन का आरंभिक काल बंबई में बीता- जहां उन्होंने बतौर फिल्म पत्रकार, रेडियो नाटककार और स्क्रीन राइटर के रूप में अपनी पहचान बनाई. बंबई फिल्म इंडस्ट्री के दिल में रहते हुए, उन्होंने सिनेमा की चकाचौंध, उसके पीछे छिपे अंतर्विरोधों और मानवीय कमजोरियों को बहुत ही बारीकी और सच्चाई से कागज़ पर उतारा. उन्होंने ना सिर्फ परदे की कहानियां लिखीं, बल्कि परदे के पीछे की सच्चाइयों को भी बेनकाब किया.

परंतु, यह शोहरत सस्ती नहीं थी. मंटो की ज़िंदगी का अगला अध्याय लाहौर में शुरू हुआ, जहां उन्हें अश्लीलता के आरोपों में बार-बार अदालतों में घसीटा गया. आर्थिक परेशानियों ने उन्हें घेर लिया और धीरे-धीरे शराब की लत और जिगर की बीमारी ने उनके स्वास्थ्य को बर्बाद कर दिया. 1955 में मात्र 42 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

मंटो की वेदना, उनके विद्रोह और उनकी अडिग सच्चाई की कहानी
“दास्तान-ए-मंटो” के जरिए मंटो की कहानी सिर्फ सुनाई नहीं जाती, बल्कि उस समय को दोबारा जिया गया. वह दौर जब देश बंट रहा था, जब विचारधाराएं टकरा रही थीं, और जब एक लेखक अपनी कलम से समाज के सबसे काले हिस्सों को उजागर कर रहा था. यह प्रस्तुति मंटो की वेदना, उनका विद्रोह, और उनकी अडिग सच्चाई को दर्शकों के सामने रखती है.

मंटो ने समाज को जो आईना दिखाया, उसमें उन्हें खुद ही सबसे गहरे जख्म मिले, लेकिन उनकी लेखनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उनके जीवनकाल में थी. “दास्तान-ए-मंटो” उस लेखक की आवाज है जो बर्बाद तो हुआ, पर कभी झुका नहीं. यह प्रस्तुति न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो सच बोलने की ताकत को समझता है और उस दौर को महसूस करना चाहता है, जहां एक लेखक की कलम तलवार से भी तेज थी.

बीते दो दशकों में, हमने दास्तानगोई को दो लोगों के बीच की एक कला के रूप में देखा है. मंच पर मौजूद दो लोगों के जरिए जो रोजमर्रा की जिंदगी की बोली में कविता बोलते हैं, उसे रंगमंचीय मंच पर उतारते हैं. इस आधुनिक दास्तानगोई को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है अभिनेता, लेखक और निर्देशक महमूद फारूकी और उर्दू साहित्य के पुरोधा शम्सुर रहमान फारूकी को. इसकी शुरुआत 2005 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में हुए एक प्रदर्शन से हुई थी.

दर्शकों की पसंद बनी दास्तान-ए-मंटोइयत
महमूद फारूकी और उनकी 20-सदस्यीय टीम “दास्तानगोई कलेक्टिव” ने इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. उनकी प्रस्तुतियों में कहानियां कई बार जानी-पहचानी होती हैं, लेकिन उनका अंदाज हर बार नया होता है. ऐसा लगता है जैसे ये किस्से साहस, ज्ञान और कल्पना की एक रहस्यमयी दुनिया से खींच लाए गए हों.

हर बार जब मंच की बत्तियां बुझती हैं और केवल दो दास्तानगो गद्दे पर बैठते हैं, तो वे अकेले केंद्र बन जाते हैं. कभी नायक, कभी पौराणिक पात्र, कभी इतिहास, कभी मिथक को जीते हुए. विजयदान देथा की कहानियों को, और लेखक सआदत हसन मंटो पर आधारित दास्तान को बार-बार प्रस्तुत किया गया है. मंटो की दास्तान, दास्तान-ए-मंटोइयत को काफी पसंद किया जा रहा है.

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