Giridih News :प्रेमचंद का साहित्य मूल्यों से भटके लोगों को राह दिखाता है


अभिनव संस्था ने कथा सम्राट प्रेमचंद एवं तुलसीदास की जयंती मनायी, बोले वक्ताअभिनव साहित्यिक संस्था ने बरगंडा के सुमन वाटिका में शुक्रवार की रात कथा सम्राट प्रेमचंद व संत तुलसीदास की जयंती मनायी. इस दौरान विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता बद्री दास व संचालन जन संस्कृति मंच के शंकर पांडेय ने किया. शहर के वरिष्ठ साहित्यकार व कवि उदयशंकर उपाध्याय ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में समाज में व्याप्त बुराइयों का यथार्थ कारणों की खोज की है और इसके लिए व्यक्तियों पर दोषारोपण ना करके समाज-व्यवस्था को दोषी ठहराया है. संस्था के अध्यक्ष डॉ छोटू प्रसाद चंद्रप्रभ ने कहा कि प्रेमचंद की कृतियों की सार्थकता अभी भी है. गबन उनकी प्रमुख कृतियों में एक है, जिसमें रमानाथ, जालपा और जोहरा मुख्य पात्र हैं. रमानाथ जैसे भ्रष्ट सरकारी सेवक, जालपा जैसी आभूषणों की लोभी पत्नी और जोहरा जैसी सिद्धांतों को अनुकरण करने वाली अभी भी हमारे देश में दिखते हैं. प्रेमचंद का साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं बल्कि दीपक का काम करता है. मूल्यों से भटके लोगों को राह बताता है.

आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचंद के विचार

जसम के शंकर पांडेय ने भी कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में रंगभूमि एक श्रेष्ठ कलाकृति है. इसमें जिस सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में चित्रित है. वहीं, हमारे देश का समाज-चित्रण है. बद्री दास ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य वर्तमान समय में भी प्रासंगिक हैं. प्रभाकर ने कहा कि हमलोग विभूतियों की जयंती तो मनाते हैं, लेकिन जयंती की सार्थकता तभी है, जब हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अंगीकार करेंगे. सुनील मंथन शर्मा ने प्रेमचंद के संबंध में अलग जानकारी दी. कहा कि एक खबर के अनुसार प्रेमचंद 1934 में झारखंड के गुमला में प्रसिद्ध साहित्यकार राधाकृष्ण के बुलावे पर साहित्यिक समारोह में आने वाले थे, लेकिन नहीं वह नहीं आ सके. बाद में प्रेमचंद ने हंस पत्रिका का संचालन राधाकृष्ण जी सौंपा था. रीतेश सराक ने साहित्यिक यात्राओं की महत्ता पर प्रकाश डाला और नवंबर में साहित्यिक यात्रा के लिए सभी को प्रेरित किया. नवांकुर लेखक और कवि अनंत शक्ति ने कहा कि आम आदमी की पीड़ा को साहित्य में अभिव्यक्त करने और सामाजिक विषमताओं के कारणों को उद्घाटित करने में प्रेमचंद की रचनाओं का कोई सानी नहीं है. इस दौरान वक्ताओं ने तुलसीदास के विचारों को भी रखा.

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