ट्रेड वॉर का हथियार बन गया है ट्रंप का ‘मेक इन अमेरिका’ प्रोजेक्ट… क्या भारत के बिना अकेले चल पाएगा US? – make in America and make in India India US tariff war Donald trump pm Narendra modi developed India ntcppl


‘मेक इन इंडिया’और ‘मेक इन अमेरिका’ दोनों ही महात्वाकांक्षी पहल हैं. जो अपने-अपने देशों में विनिर्माण को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए शुरू की गई हैं. इन दोनों योजनाओं का कमोबेश लक्ष्य घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता कम करना और नौकरियां पैदा करना है. यहां तक तो दिक्कत की कोई बात नहीं लगती है. लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अति महात्वाकांक्षा ने ‘मेक इन अमेरिका’ को यूनाइटेड स्टेट्स का व्यापार युद्ध बना दिया है. वे ‘मेक इन अमेरिका’ के उद्देश्य को टैरिफ वॉर के जरिये हासिल करना चाहते हैं.

‘मेक इन अमेरिका‘ अगर अमेरिका का महज व्यापारिक एजेंडा रहता तो कोई बात नहीं थी लेकिन ट्रंप ने इस जिओ स्ट्रैटेजिक एजेंडे में बदल दिया है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे दुनिया के देशों की विदेश नीति को अपने माफिक चलाना चाहते हैं. भारत का रूस से कच्चे तेल की खरीद को दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश की जरूरतों के चश्मे से देखने के बजाय इसे यूक्रेन जंग के चश्मे से देखना, ट्रंप की इसी नीति का हिस्सा है.

ट्रंप को लगता है कि अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में अपने व्यापारिक साझीदारों को गैर जरूरी रियायतें दे दी है. इसके लिए वे पूर्व राष्ट्रपति और डेमोक्रेटिक नेता जो बाइडेन की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे इसे हर हाल में रिवर्स करना चाहते हैं.

चिप्स से लेकर जहाज तक सब अमेरिका में…

यूं तो ट्रंप ने ‘मेक इन अमेरिका’ नीति की शुरुआत अपने पहले कार्यकाल के दौरान 2017 में ही की थी. लेकिन 2025 में दूसरी पारी के साथ ट्रंप इस नीति को लेकर आक्रामक और जिद्दी हो गए.

इस पॉलिसी का लक्ष्य है “चिप्स से लेकर जहाजों तक” सब कुछ अमेरिका में बनाना.  21 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और $41,071 की प्रति व्यक्ति आय के साथ उन्नत तकनीक, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा और नवाचार अमेरिका की ताकत है. ये ताकत अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय संधियों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और प्रचलित व्यापारिक मान्यताओं का न मानने की दादागीरी करने का भी अधिकार दे देती है.

यही वजह है कि ट्रंप ने भारत पर 25 फीसदी का टैरिफ लगा दिया. इसके अलावा उन्होंने भारत पर रूस से तेल की खरीद पर जुर्माना भी लगाने की बात कही. ताकि भारत से अमेरिका आयात होने प्रोडक्ट महंगे हो जाएं और कंपनियों को स्थानीय उत्पादन पर मजबूर होना पड़े.

ट्रंप की नीतियां हास्यास्पद तब हो जाती हैं जब वे भारत के व्यापार करने के अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश करते हैं. 4 अगस्त की रात को ट्रंप ने भारत को लेकर कहा कि वे भारत पर और ज्यादा टैरिफ लगाएंगे. इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है और उसे खुले बाजार में बेचकर मुनाफा कमा रहा है. ट्रंप ने आरोप लगाया कि भारत को यूक्रेन में मारे जा रहे लोगों की परवाह नहीं है.

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राष्ट्रपति ट्रंप के अनर्गल बयान पर भारत ने जवाब देने में तनिक भी देर नहीं की. भारत ने कहा कि यूक्रेन जंग के शुरुआत में अमेरिका खुद भारत को ऐसे आयात के लिए प्रोत्साहित कर रहा था ताकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कीमतें स्थिर रह सकें.

भारत ने कहा कि रूस से हमारा कच्चे तेल का आयात का उद्देश्य भारतीय उपभोक्ताओं को उनके सामर्थ्य के अनुसार ईंधन खरीदने की सुविधा देना है. ये एक जरूरी आवश्यकता है जो वैश्विक परिस्थितियों से पैदा हुई है. भारत ने कहा कि जो देश इस मामले में भारत की आलोचना कर रहे हैं वे स्वयं रूस से व्यापार कर रहे हैं.

विदेश और व्यापार नीति का घालमेल

विदेश नीति को व्यापार नीति से जोडकर ट्रंप अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी धाक जमाना चाहते हैं तो ‘मेक इन अमेरिका’ के जरिये वे घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूती देना चाह रहे हैं.

‘मेक इन अमेरिका’ का आह्वान करते हुए ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका का उद्देश्य है अपनी उत्पादन क्षमता वापस देश में लाना, विदेशी निर्भरता कम करना और अमेरिकी श्रमिकों को सुरक्षित रखना. उन्होंने विदेशी व्यापार घाटे और “अनुचित वैश्विक व्यापार” को राष्ट्रीय आपातकाल बताया और सभी देशों पर न्यूनतम 10% टैरिफ लागू करने का आदेश दिया.

ट्रंप के अनुसार ‘मेड इन अमेरिका’ सिर्फ स्लोगन नहीं है, बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता है. उनका मानना है कि इन टैरिफ और नीतियों में बदलाव से कार, उपकरण और अन्य सामान अमेरिका में ही बनेंगे जिससे अमेरिकियों को अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियां मिलेंगी और अमेरिका का औद्योगिक आधार मजबूत होगा.

ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यह कदम अमेरिका की प्रतिस्पर्धा, स्वायत्तता और सुरक्षा के लिए ज़रूरी है.

सेमीकंडक्टर, विमानन और चिकित्सा उपकरणों में अमेरिका की वैश्विक बढ़त बनी हुई है. 2017-2020 में ट्रम्प की नीतियों ने स्टील और ऑटोमोटिव क्षेत्र में नौकरियां बढ़ाईं. टैरिफ और कर राहत ने कंपनियों को अमेरिका में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया.

क्या भारत के बिना चल पाएगा अमेरिका?

लेकिन ‘मेक इन अमेरिका’ का डंका बजाते बजाते ट्रंप यह भूल जाते हैं कि इस अभियान की अपनी कुछ सीमाएं हैं.

इंडियन टैलेंट, सस्ता श्रम भारत की ताकत है. भारत से अमेरिका में मजदूरी 3 से 5 गुना अधिक है. कुशल श्रम अमेरिका के लिए चुनौती है.  सॉफ्टवेयर, मैनेजमेट, आईटी के क्षेत्र में भारतीयों का सिक्का पूरी दुनिया में चलता है.

अमेरिकी सप्लाई की वजह से ग्लोबल ट्रेड का सप्लाई चेन बाधित हुआ है. इस वजह से कई कंपनियों ने भारत की ओर रुख किया है. भारत ने सस्ते श्रमिक एवं कम उत्पादन लागत के दम पर वैश्विक सप्लाई चेन में खुद को स्थापित किया है, खासतौर से ऑटो, टेक्सटाइल, फूड प्रोसेसिंग, मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में. PLI (Production Linked Incentive) जैसी योजनाएं मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही हैं.

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एप्पल जैसी कंपनियां अपने प्रोडक्ट का उत्पादन अब भारत में करने पर जोर दे रही हैं. Apple का भारत में उत्पादन 2024 में $14 बिलियन तक पहुंच गया, जो भारत की क्षमता दिखाता है.

अमेरिका के श्रम लागत के साथ ये संभव नहीं था. मेक इन इंडिया बनाम मेक इन अमेरिका पर पूर्व भारतीय वाणिज्य सचिव अनुप वधावन का महत्वपूर्ण बयान है. उन्होंने कहा है कि, “अमेरिका की नई टैरिफ नीति से ‘मेक इन इंडिया’ को कोई बड़ा खतरा नहीं है, क्योंकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था बड़ी मैन्युफैक्चरिंग के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल नहीं है. वहां लागत और मजदूरी बहुत ज़्यादा है- उदाहरण के लिए, अगर कोई iPhone अमेरिका में बने तो इसकी कीमत $3,000–$4,000 तक हो सकती है.”

अमेरिका भले ही तकनीक आधारित उत्पादों जैसे सेमीकंडक्टर और एआई में भारत से आगे हैं लेकिन सस्ते सामान के उत्पादन में वह भारत या चीन से मुकाबला नहीं कर सकता. वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति मजबूत है. रूस, जापान और ASEAN के साथ साझेदारी इसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जोड़ती है.

ट्रंप और अमेरिकी नीति निर्माताओं का ये कदम अव्यावहारिक है. ये मुक्त व्यापार की नीति पर चोट करता है. बहुत हास्यास्पद है कि अमेरिका कभी इस नीति का पैरोकार हुआ करता था.

अमेरिका को सेमीकंडक्टर के लिए ताइवान का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा. रेयर अर्थ मैटेरियल के लिए चीन से बिजनेस करनी पड़ेगी और सस्ते उपभोक्ता सामान के लिए भारत जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा.

अगर अमेरिका सिर्फ ‘मेक इन अमेरिका’ की ही रट लगाए रहता है तो अमेरिकी उपभोक्ताओं को दोहरे मार का सामना करना पड़ सकता है. एक तो उच्च उत्पादन लागत से वहां सामान महंगे हो जाएंगे दूसरी ओर हाई टैरिफ से भी अमेरिका में विदेशी वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाएंगी.
जिससे मुद्रास्फीति का जोखिम है.

अगर टैरिफ का खेल लंबा चला तो प्रतिक्रिया में चीन, भारत और यूरोप जैसे देश भी अमेरिकी सामान पर जवाबी टैरिफ लगा सकते हैं. इससे अमेरिका का विदेशी व्यापार प्रभावित हो सकता है. इससे अमेरिकी निर्यात को नुकसान हो सकता है. भारत नए बाजारों की तलाश में है, जबकि अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियां इसे अलग-थलग कर सकती हैं.

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