वैज्ञानिकों ने एक ऐसी र‍िसर्च की है जो मानव मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों को समझने और उनका इलाज ढूंढने में क्रांति ला सकती है. अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने लैब में एक छोटा-सा मस्तिष्क बनाया है, जिसे ‘मिनी-ब्रेन’ कहा जा रहा है. ये मिनी-ब्रेन इंसानी दिमाग की तरह काम करता है और ऑटिज्म, डिप्रेशन, और अल्जाइमर जैसी बीमारियों को समझने में मदद कर सकता है. भारत के लिए यह खोज किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि यहां ये समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं.

मिनी-ब्रेन क्या है?

ये मिनी-ब्रेन लैब में बनाया गया एक ऐसा मॉडल है, जो इंसानी मस्तिष्क की तरह दिखता और काम करता है. वैज्ञानिकों ने इसे मल्टी-रिजन ब्रेन ऑर्गेनॉइड (MRBO) नाम दिया है. यह 40 दिन के मानव भ्रूण के दिमाग जैसा है, जिसमें दिमाग के सारे हिस्से और खून की छोटी-छोटी नलियां मौजूद हैं. खास बात यह है कि यह मिनी-ब्रेन बिजली के सिग्नल भेजता है, ठीक वैसे ही जैसे हमारा दिमाग करता है.

इंड‍िया के लिए क्यों खास?

भारत में ऑटिज्म और अल्जाइमर जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 1.5% बच्चे ऑटिज्म से प्रभावित हैं और 50 लाख से ज्यादा बुजुर्ग अल्जाइमर का शिकार हैं. इन बीमारियों का सटीक इलाज ढूंढना मुश्किल रहा है क्योंकि ज्यादातर दवाएं चूहों पर टेस्ट की जाती हैं, जो इंसानों पर अक्सर फेल हो जाती हैं. मिनी-ब्रेन इस समस्या का हल दे सकता है.

ये नई दवाओं को टेस्ट करने का आसान और सटीक तरीका है जिससे इलाज का सक्सेस रेट बढ़ सकता है. तमाम मांओं के लिए मिनी-ब्रेन की ये खोज उनके बच्चों के लिए नई उम्मीद ला सकती है. भारतीय वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक से भविष्य में हर मरीज के लिए खास दवाएं बनाई जा सकती हैं.

भारत में कैसे होगा फायदा?

IHBAS में प्रोफेसर और गेरियाट्रिक साइकियाट्रिस्ट डॉ. ओम प्रकाश कहते हैं कि मिनी-ब्रेन जैसे मॉडल्स हमें अल्जाइमर और ऑटिज्म जैसी जटिल बीमारियों को गहराई से समझने का मौका देंगे. भारत में जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है, ऐसी तकनीक मरीजों के लिए सटीक और किफायती इलाज लाने में मदद कर सकती है. इससे न सिर्फ मरीजों को फायदा होगा बल्कि भारत हेल्थकेयर रिसर्च में दुनिया में आगे निकल सकता है.

आगे कैसे होगा फायदेमंंद

ये मिनी-ब्रेन न सिर्फ दवाओं को टेस्ट करने में मदद करेगा बल्कि ये भी बता सकता है कि कौन-सी दवा किस मरीज के लिए सबसे अच्छी होगी. इतना ही नहीं, भविष्य में यह तकनीक ‘ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस’ की दिशा में ले जा सकती है, जहां मस्तिष्क जैसे मॉडल्स बायो-कंप्यूटिंग में इस्तेमाल हो सकते हैं. हालांकि, वैज्ञानिक इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि इस तकनीक के एथिकल पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है.

क्यों है खास?

ये खोज इसलिए भी खास है क्योंकि ये पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने लैब में पूरे मस्तिष्क का मॉडल बनाया है. यह न सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए नया रास्ता खोलता है, बल्कि उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जो इन बीमारियों से जूझ रहे हैं.

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