‘आवारा कुत्तों को पालना? मैंने तो ये कदम सात साल पहले ही उठाया था, जब ब्राउनी को घर लाई’ – Stray Dogs as Pets can be a good step as supreme court order send them in shelter ntcpmm


सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली की सड़कों से आवारा कुत्तों को स्थायी रूप से हटाने का निर्देश दिया है. आदेश के बाद सोशल मीडिया पर एक वाक्य खूब चल रहा है ‘पसंद हैं तो घर ले जाओ.’ लेकिन मैंने यह सात साल पहले ही कर लिया था. यहां मैं अपनी आपबीती साझा कर रही हूं

साल 2018 में, पूर्वी दिल्ली के मेरे सोसाइटी परिसर में एक बेहद कमजोर, बीमार और कंकाल-सा दिखता एक कुत्ता आ गया. उसे देखते ही मैंने पानी और खाना देना शुरू किया. शुरुआती दिनों में पड़ोसियों की नाराज़ निगाहें नजरअंदाज कीं, लेकिन जल्द ही देखा कि उसके पानी के बर्तन उलट दिए जा रहे हैं और लोगों ने गार्ड को उसे डंडे से भगाने को कह दिया. मुझे समझ आ गया वो यहां ज़्यादा दिन सुरक्षित नहीं रहेगा.

मैंने उसे घर ले लिया. आज ब्राउनी मेरा परिवार है. हां, अकेले रहते हुए और अनिश्चित समय वाली नौकरी के साथ उसे पालना आसान नहीं था, लेकिन उसे सड़कों पर मरने के लिए छोड़ देना और कठिन था. इससे पहले भी कोलकाता में मैंने दो इंडी (देसी नस्ल के) कुत्ते अपनाए थे- एलेक्स और कालू. दोनों को भी परिस्थितियों ने मजबूर होकर घर लाना पड़ा, क्योंकि न NGO के पास जगह थी, न सरकारी शेल्टर में भरोसा.

देसी बनाम विदेशी नस्ल का भेदभाव

कुत्तों के प्रेमी होने का दावा करने वालों में भी अक्सर नस्ल को लेकर भेदभाव दिखता है. कई लोग सड़कों पर इंडी पिल्लों को प्यार करते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो डालते हैं, लेकिन घर में गोल्डन रिट्रीवर या लैब्राडोर चाहते हैं. लेकिन सच यह है कि इंडी भी उतने ही समझदार, साफ-सुथरे और ट्रेन होने योग्य होते हैं. ब्राउनी को मैंने सड़क से लाने के बाद कभी घर में गंदगी करते नहीं देखा. वह जल्दी घरेलू माहौल में ढल गया और आज वह एक अनुशासित, समझदार साथी है.

प्यार बनाम जमीनी हकीकत

क्या भारत में पालतू जानवर पालना आसान है? मेरा जवाब है- नहीं. ऐसे हालातों में कई प्रॉब्लम्स फेस करनी होती हैं. उनमें से कुछ यहां मैं बता रही हूं.

घर ढूंढना: कई मकानमालिक पालतू, खासकर इंडी, रखने वालों को किराए पर घर नहीं देते.

ट्रैफ़िक: पेट कैब महंगी हैं, और सामान्य टैक्सी ड्राइवर पालतू ले जाने से मना कर देते हैं.

लंबी दूरी की यात्रा: ट्रेन या फ्लाइट से पालतू के साथ सफर करने में कड़े नियम और ऊंचा खर्च है.

शेल्टर की स्थिति: ज्यादातर सरकारी या निजी शेल्टर सोशल मीडिया पर जितने अच्छे दिखते हैं, असलियत में वैसा नहीं होता. एक बार मैंने ब्राउनी को शेल्टर में छोड़ा और लौटने पर वह टिक फीवर से बीमार था.

सुप्रीम कोर्ट ने पब्लिक सेफ्टी को देखते हुए आदेश दिए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत और संसाधनों की कमी पर भी सवाल उठते हैं. इंडी कुत्तों को आप पसंद करें या न करें, लेकिन उनके लिए थोड़ी संवेदना रखना जरूरी है. एक दिन वे सड़कों से गायब हो गए, तो क्या आप उन्हें सिर्फ ‘रैबीज़ फैलाने वाले’ के तौर पर याद करेंगे? शायद नहीं. सोचकर देख‍िएगा.

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